Saturday, June 15, 2024
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Mother’s Day पर हम अपनी उजड़ती ,बंजर होती धरती माँ पर भी तो सोचें !

Mother’s day पर आपने कभी पृथ्वी पर कोई लेख आलेख नहीं पढ़ा, सुना या देखा होगा। ऐसे हर साल 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस मनाया जाता है। स्वाभाविक रूप से पृथ्वी दिवस पर्यावरण को केंद्र में रख कर ही मनाया जाता है।लेकिन Mothers day पर पृथ्वी पर बात करना भारतीय मान्यताओं के अनुसार कभी बेतुका नहीं लगता।

कम से कम मुझे तो बिलकुल नहीं।
बीते कल मैंनें आनेवाले कल 8 मई को Mothers day को ध्यान में रखकर एक आलेख लिखा था । मेरी एक पाठक बहन ने मुझे धरती माता पर भी लिखने को कहा।
उस बहना के मत के अनुसार धरती भी माँ है, और हमारी करतूतें इस माँ को बंजर बनानेवाली हैं।
बात मुझे घर कर गई, इस बात से मुझे सबसे पहले आज से तकरीबन 8 वर्ष पहले मेरी बेटी वेदिका जो उस समय 6 वर्ष की रही होगी, ने अहसास कराया था।
पाठक (मेरा आलेख पड़नेवाली) बहन की बात सुन मुझे 8 वर्ष पुरानी वो दुपहरिया याद आ गई। मैं सुबह का निकला दोपहर में घर आया था। मेरी 6-7 वर्ष की बेटी वेदिका बरामदे की जमीन पर बैठ कर पेंसिल से कुछ उकेर रही थी। मैंनें पूछा क्या हो रहा है बेटा ?  उसने अपनी उकेरी हुई तश्वीर का वो पन्ना मेरे सामने रख दिया।
उसने मुझसे कहा कि आज मदर्स डे है बाबा इसलिए मैं धरती माँ की चित्र बना रही हूँ।
उस समय मुझे ये इल्म हुआ कि सचमुच आज मदर्स डे है और धरती को हम भारतीय माँ ही तो मानते हैं। मैंनें वेदिका से पूछा तुम्हारे उकेरे चित्र में ये पृथ्वी रोती सी दिख रही है।
वेदिका ने मुझे कहा कि जंगल कट रहे हैं , हमारे आसपास पहाड़ों को लोग खाये जा रहे हैं। उसने मुझसे बड़े निर्दोष से अंदाज़ में शिक़ायत करते हुए कहा , बाबा आप ही तो ख़बरों में लिखते हो, हम सभी को बताते हो। टी भी पर भी तो बाबा दिखाया जाता है, आप भी तो दिखाते हो।
ज्यादा गर्मी , ज्यादा ठंड और बारिश के दिनों में कम बारिश होने पर आप ही तो पर्यावरण असंतुलन की बातें समझाते हो।
वेदिका ने उस मदर्स डे पर रोती हुई पृथ्वी का चित्र दिखाकर जो तर्क दिए , उसने मुझे चिंतन को मजबूर कर दिया। नन्ही वेदिका ने मुझे वेद के ज्ञान का आभास कराया। उसे भी ये ज्ञान वेद की तरह श्रुति से ही प्राप्त हुआ था। कुछ मुझसे कुछ टी भी समाचारों से उजड़ती पृथ्वी और पर्यावरण के बदलाव का ज्ञान नन्ही वेदिका को आया था।
वेदिका अपने प्राप्य श्रुति ज्ञान से रोती हुई पृथ्वी का चित्र बना कर एक संदेश देने में सफ़ल तो दिख रही थी, लेकिन हमलोग तथाकथित सभ्य समाज क्या ऐसा करने में सफल हो रहे हैं।
सेमिनारों और सम्मेलनों में हम माइक की गर्दन पकड़ कर बहुत कुछ बोल-कह जाते हैं। एक शोर मचा जाते हैं , अपने ज्ञान और जानकारियों का लोहा मनवाकर श्रोताओं की तालियाँ बटोर लाते हैं, लेकिन क्या हम कभी कोई ऐसा शंदेश छोड़ पाते हैं, कि उसकी ख़ामोशी से भी एक ऐसी चित्कार निकले , जो छोड़ जाए अमिट छाप।
वेदिका , हाँ नन्हीं वेदिका के रोती पृथ्वी की उस ख़ामोश चित्र की चित्कार ने मुझपर ऐसा छाप छोड़ा है, कि मेरे ब्लॉग के पाठक बहन ने जब धरती माँ पर कुछ लिखने को कहा, तो वेदिका का वेद मुझे बरबस याद आ गया।
सचमुच धरती हमारी माँ है , हम पृथ्वी दिवस जरूर मनाएं, लेकिन मदर्स डे पर हम धरती माँ के आँचल को हरा-भरा रखने की कसम उठाएं।

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