Saturday, June 15, 2024
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पाकुड़ जिले के कोल माइंस, रोज़गार के साधन या प्रताड़ना का अभिशाप , निर्णय करना मुश्किल

पाकुड़ जिला के पचुवाड़ा नॉर्थ ब्लॉक में WBPDCL/BGR कंपनी और दलालों का कला सच, उल्टे रैयतों के उपर ही केस करवा डाला।
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  • लेखक सन्थाल साहित्य और समाज के जानकार के साथ समाजसेवी तथा शिक्षाविद हैं । लेलेखक निर्मल मुर्मू मेरे छोटे भाई भी है। कई अख़बारों में पढ़ा कोल माइंस में बंदी से बड़ा नुकसान हुआ है।सरकार और कम्पनी को हुए नुकसान तो पढ़ लिया, जान लिया।
  1. निर्मल जी के अलग नजरिये को भी जानना ज़रूरी है, और सवाल भी बनता है, कि क्या अपने अधिकार के लिए बहरी सरकार और कम्पनी को नुकसान की चोट पर जगाना गुनाह है ? आगे निर्मल जी को पढ़ें—–

ही में पाकुड़ जिला के आमड़ापाड़ा थाना में बिशुनपुर गांव के तकरीबन 13 महिला/पुरुषों के उपर एक मामला दर्ज किया गया है जिसका कांड संख्या- 20/22 और भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत धारा- 143,149,341,353, एवं 427 लगाया गया है। आप जानते हैं क्यों?
क्योंकि इन लोगों ने अपने गांव में अपनी जल, जंगल,जमीन और भाषा और संस्कृति की रक्षा के लिए अपने ही जमीन पर चोड़का गढ़ा है। प्रशासन और दलालों को इसी बात का रास नहीं आया और केस कर डाला। अरे हम अपनी जमीन पर चोढ़का नहीं गढ़ेंगे तो तुम्हारा बाप का जमीन पर चोड़का गाढ़ेंगे?
मैं बात कर रहा हूं रूर प्रदेश कहे जाने वाले झारखण्ड के सबसे पिछड़े जिला के रूप में सुमार पाकुड़ का। पाकुड़ जिला का आमड़ापाड़ा प्रखंड कोयला के लिए बिख्यात है। यहां पर प्रचुर मात्रा में अच्छे किस्म का कोयला पाये जाते हैैं।इसका उत्खनन का काम बहुत पहले से ही चला आ रहा है। बीच में थोड़ा दिन बंद भी हुआ था क्योंकि कोल माफियाओं ने खादी की सहायता से खुब बड़ा घोटाला का आंजम दिया था। तत्कालीन कंपनियों ने अपना झोला तो खूब भरा, जाते जाते यहां के जान माल के साथ साथ सरकार को भी राजस्व का चूना लगा के गया। वर्तमान समय में यह काम पश्चिम बंगाल पॉवर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (WBPDCL)/ बीजीआर कंपनी कर रही है। यह क्षेत्र शहर से दूर है और शिक्षा के जगत में तो बहुत ही पिछड़ा है। इसी का फायदा उठाकर कंपनी वहां के लोकल नेता, प्रशासन और दलालों की सहायता से रैयतों का जमीन ओने पौने भावों सौदा कर लेती है और कोयला उत्खनन का काम शुरू करती है और फिर शुरू होता है वहां के लोगों की शोषण की कहानी। क्योंकि माफिया और दलालों ने वहां के लोगों के बीच इतना दहशत और खौफ पैदा करके रखा है कि वहां के लोग कंपनी के विरोध में चुं शब्द भी बोलने का हिम्मत नहीं जुटा सकते। उनके जमीन से रोज करोड़ों का कारोबार हो रहा है, लेकिन उनका हालत देखकर आपको रोना आएगा। रोजगार के नाम पर तो ज़ोरदार तमाचा है। हाथ से जमीनें निकल चुकी है, मुआवजा की राशि भी ठीक से नहीं मिली है, विस्थापन के लाभ से भी कोसों दूर है। घर से भी बेदखल हो चुके हैं उनके नाम पर कॉलोनी तो बना है पर वह भी रहिसों के पान गुंठी के बराबर है।
सप्ताह दिन पहले वहां के क्षेत्रीय सांसद श्री विजय हांसदा और क्षेत्र विधायक श्री दिनेश मरांडी और जिला प्रशासन ने वहां के लोगों को गृह प्रवेश कराया लेकिन उनके लिए पशु शेड, धार्मिक स्थल, संस्कृतिक स्थल, खेल मैदान, अच्छा हॉस्पिटल और स्कूल का ख्याल नहीं आया? बस इसी के विरोध में वहां रैयतों ने बिगत 16 मार्च से आंदोलन शुरू कर दिया है और कोयला ढुलाई को ठप पड़ गई है। कोयला ढुलाई ठप होते ही माफिया और दलालों की किरकिरी शुरू हो गई। आंदोलन को एड़ी चोटी लगाकर दबाने की कोशिश किया जा रहा है। पहले प्रशासन और कुछ लोगों ने मिलकर वहां के लोगों को खूब समझाया बुझाया, लेकिन वहां के लोग सामने वालों की चाल और चरित्र को अच्छी तरह से समझ चुके थे इसलिए एक भी ना माने तो उन लोगों ने उल्टे रैयतों के ऊपर ही केस करवा दिया है। और धमकी दिया जा रहा है कि तुम लोग साले जेल में साड़ोगे। कभी खुले आसमान की चांद और सूरज को नहीं देख पाओगे। जिसका उल्लेख मैं ऊपर ही कर चुका हूं।
इन लोगों के ऊपर जबरन कोयला खदानों में खुदाई और ढुलाई बंद करने, सरकारी काम में बाधा पहुंचाने और राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाने सहित कई आरोप लगाया गया है। मैं सरकार से पूछना चाहता हूं इन कि इन लोगों ने क्या गलती किया है? क्या विस्थापन का लाभ मांगना कोई गुनाह है? क्या अपनी जमीन की रक्षा करना गुनाह है? क्या अपनी धार्मिक आस्था प्रकट करना गुनाह है? क्या जल, जंगल और जमीन की रक्षा करना गुनाह है? क्या वह अपनी जमीन पर भी हक नहीं जता सकते? ऐसे भी यह क्षेत्र पांचवी अनुसूची के अंतर्गत आता है और यहां एसपीटी एक्ट जैसा कड़ा कानून पहले से लागू है। इन लोगों ने आदिवासियों का जमीन किस तरह से अधिग्रहण किया? जबकि यहां का जमीन लीज में नहीं दिया जा सकता, दान पत्र में नहीं दिया जा सकता, किसी भी प्रकार से हस्तांतरण करना अवैध होगा, तो फिर इन लोगों से जमीन किस रूप में लिया गया? अगर लिया भी गया तो इन लोगों को पार्टनरशिप में क्यों नहीं रखा गया? इसलिए कि इन लोगों को फटे हाल में रखकर अपना जमीन का टुकड़ा चांद में सुरक्षित किया जा सके।
आज भी कंपनी में बहुत सारे लोग काम कर रहे हैं जो बाहर से आए हैं। क्या उनकी जमीन यहां पर है? क्या उनके बाप दादाओं ने यहां पर जमीनें तैयार किया था? क्या संताल परगना अलग करने के लिए उनके पूर्वजों ने बलिदानी दी थी? फिर उनके लोग यहां पर किस रूप में काम करने आ गए? क्या यहां के लोगों में योग्यता की कमी है? यहां के लोगों के साथ इस तरह का जुल्म क्यों किया जा रहा है?
मैं दाद देना चाहता हूं सोम हेम्ब्रम, सुशांति मराण्डी, दानियाल मुर्मू, रानी हांसदा,मकलू मुर्मू, मोनिका हांसदा,ठाकरान मुर्मू, मालती हेम्ब्रम,सुवल हेम्ब्रम,बोयला टुडू, पानी टुडू,लिलू किस्कू एवं जुनास मरांडी को, जिनके ऊपर में एफआईआर दर्ज किया गया है। आप लोग संघर्ष करिए मातृभूमि की रक्षा के लिए।खुन से सनी इस धरती का इतिहास ही तो बलिदान और संघर्ष का है।हम अपने घर में नहीं लड़ेंगे तो कहां लड़ेंगे? आप पंजाब में तो चोड़का गाड़ने नहीं ना जा रहे हैं, आप हरियाणा में तो चोड़का गाड़ने नहीं ना जा रहे हैं, आप पश्चिम बंगाल में तो चोड़का गाड़ने नहीं ना जा रहे हैं, आप विधायक जी का घर डुमरिया में तो चोड़का गाड़ने नहीं ना जा रहे हैं, आप सांसद महोदय का घर बरहरवा और बिहार में तो चोड़का गाड़ने नहीं ना जा रहे हैं, आप हेमंत जी का घर में भी चोड़का गाड़ने नहीं ना जा रहे हैं, आप बाबूलाल जी के घर में भी चोड़का गाड़ने नहीं जा रहे हैं, तो फिर डर किस बात का? हम अपनी जमीन पर चोड़का नहीं गाड़ेंगे तो कहां गाड़ेंगे? तुम्हारा बाप का जमीन में?
यहां के जनप्रतिनिधि पर भी धिक्कार है जो आधे अधूरे घर का चाबी थमाने तो जाते हैं लेकिन उनकी मूलभूत समास्याएं और आधारभूत संरचना का ख्याल नहीं रखते। दूसरी ओर उसके नाम पर सीएम साहब के यहां फोटो खिंचवाने चले जाते हैं। उसे भी हस्यसपद तो इस बात का मुझे लगता है जो अपने भाषण में कंपनी से वहां के लोगों को मांदर दिलाने की बात करते हैं। नेताजी उन लोगों को भाषा और संस्कृति का पाठ मत पढ़ाइए। उन्हें मालूम है अपनी भाषा और संस्कृति की रक्षा कैसे की जाती है? बात करना है तो अधिकार और रोजगार बात करिए। यह कैसे संभव है कि जख्म भी आप ही दीजिएगा और मरहम भी आप ही लगाएगा।
मैंने उन लोगों से बात किया तो पता चला कि वे लोग बहुत दहशत में है। बहुत सारे लोग चैन से सोते भी नहीं है। डर के साये में जिंदगी जीने को मजबूर हैं। उन लोगों को डर है कहीं नक्सली के नाम पर जिंदा सूट न करवा दे। कहीं अनाप-शनाप केस में फंसाकर जेल में न सड़वा दें। चिंता नहीं करना है मित्रों, डरना भी नहीं है। डटकर सामना करना है। भले ही दुनिया की आंखें बंद हो सकती है,लेकिन जिभ हमेशा खुली रहेगी।
और मैं क्या लिखूं इस पर यह आबोवाक् राज की सरकार है, वरना सरकार बदनाम हो जाएगी। बस आप लोग आगे देखते जाइए किसका हाथ घी में होगा और किसका हाथ की खिचड़ी में होगा। लेकिन अंदर ही अंदर बड़े आंदोलन की आग सुलग रही है कहीं यह आंदोलन सरकार और प्रशासन को राख में ना तब्दील कर दें।

✍️निर्मल मुर्मू।

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