Friday, June 14, 2024
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ग़ज़ब का जलवा है भैया हमारे शहर में माफियाओं का ! जिंदा को मृत बनाना तो बाएं हाथ का है खेल , और छापने में तो पूछिए मत।

एक अख़बार प्रभात मंत्र जिसका मैं नियमित पाठक हूँ ,में अचानक एक ख़बर ने ध्यान खींचा। पूरी ख़बर पढ़ डाली । पता चला कि एक जीवित व्यक्ति को मृत बता कर उसकी जमीन बेच डाली गई।
पत्रकार क़ासिम जी ने पूरी रिपोर्ट लिखने में काफ़ी खोज , शोध और मेहनत की , तथा स्वाभाविक रूप से उठते सवालों के साथ रिपोर्ट लिख डाली थी। अखबार प्रभात मंत्र ने भी प्राथमिकता के साथ इसे प्रकाशित किया था।
हँलांकि एक पत्रकार की ईमानदार मेहनत से ये मामला तो सामने आ गया , लेकिन ऐसे कितने ही मामले फाइलों में यहाँ दब जाते हैं , जो कभी निकल नहीं पाते।
मुझे अचानक इस ख़बर से वर्षों पुरानी बात याद आ गई। बात सन 2012 की है। स्थानीय कोषागार में एक जाँच वरीय अधिकारियों के आदेश पर चल रही थी , जिसमें ये बात खुलकर आ रही थी कि स्टाम्प पेपर के घोटाले की कोई बड़ी कहानी , स्टाम्प बेचने वालों के रजिश्टरों में दर्ज है।
स्टम्प भण्डारियों के रजिस्टर जैसे जैसे कोषागार में जाँच के लिए आ रहे थे , एक ही नम्बर के कई स्टम्प निर्गत पाए जा रहे थे।
जबकि कोषागार से तो स्टम्प बेचने वालों को एक नम्बर के एक ही स्टम्प दिये जाते होंगे , तो फिर ऐसा हो कैसे रहा था !
इस सवाल का उस समय जवाब ढूँढना मुश्किल था , लेकिन अभी तो यहाँ के गाँव गाँव में छपते जाली लॉटरी को देख सब समझ में आ रहा है। हँलांकि नकली रुपये जब छप कर आया करते थे, तो स्टम्प पेपर का उसी तर्ज पर छप कर आना कोई बड़ी बात नहीं थीं।
आख़िर हर्षद मेहता भैया ऐसे ही थोड़े नाम और पैसे कमा गये।

खैर ये जाँच चल ही रहा था कि अचानक एक दिन पूरा मामला ठप्प पड़ गया। ऐसी ख़ामोशी इस मामले पर पड़ गई कि लाख प्रयासों के बाद भी ग़ज़ब का ठहराव आ गया और फिर कालांतर में मामला पूरी तरह दब गया।
खो गई एक और घपले की कहानी , फाइलों की धूल भरी जुबानों के बीच कहीं , जो आज तक अनकही रह गई।
ठीक उसी तरह जीवित को मृत बताकर जमीन बेच देने की ये कहानी भी अनकही रह जाती अगर पत्रकार क़ासिम जी तह तक नहीं पहुँचते।
पत्रकार और अख़बार प्रभात मंत्र को बहुत बहुत धन्यवाद।

जिस राज्य के शीर्ष नेता जमीन आदि के जाँच क्रम में जेल भेज दिए जाँय, वहाँ अंचलों में होते हैं बड़े बड़े खेल

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन चुनाव के पहले से जेल में हैं। ईडी ने उन्हें जमीन की तथाकथित (सवित होने के पहले तक) हेरा-फेरी के मामले में कई सम्मन भेजने और पूछताछ के बाद गिरफ्तार किया था। अब तक उन्हें न्यायालय से भी लाख प्रयासों के बाद राहत नहीं मिली है।
खैर झारखंड में तमाम विशेष कानूनों के बाद भी जमीन की हेराफेरी अब आम बात हो गई है।
संथालपरगना के पाकुड़ जिले में सदर अंचल पाकुड़ और जिले में धान का कटोरा कहे जाने वाले महेशपुर अंचल में सेलेबुल जमीन बहुत ज्यादा है। अनुसूचित ननसेलेबुल जमीन में तो अनगिनत गड़बड़झाला है , लेकिन सेलेबुल सामान्य जमीन में भी गड़बड़झाले की कहानी अनगिनत है।

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उदाहरण के तौर पर कई दशकों पहले जानकारों ने अपनी पीढ़ियों को बताया था, कि खतियानी रैयत कालिदास गुप्त , तारापद गुप्त और पँचनन्द गुप्त के नाम पर जमीन थी।
जमीन तो काफी था , लेकिन कुछ जमीन पर उनलोगों ने राधाकृष्ण की एक मंदिर बना रखा था। उस समय पाकुड़ नगर स्वयं वीरान बियावान जंगली इलाका था। भक्ति रस में डूबे गुप्त परिवार ने शायद अपना परिवार नहीं बढ़ाया होगा।
खैर जो भी हुआ हो जमीन पिपासुओं की नज़र अंचल कार्यालय कर्मी के सहयोग से कालांतर में उस टूटे-फूटे खपड़ैल के तथाकथित मंदिर पर पड़ी , और फिर उसे गटकने की जुगाड़ भी लग गया। और भगवान कृष्ण को भी चुना लगा गये ये जमीन पिपासु ।
सबसे पहले उस जमीन को मंदिर की जमीन नहीं है , ये सवित करने के लिए जो जो सम्भव था , किया गया और फिर सदर प्रखंड के ही इलामी और पितम्बरा गाँव के मौजा पर अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा मोटेशन के लिए दिये गए आवेदन पर ही दूसरे के सेलडिड को संलग्न कर अन्य दूसरे के नाम पर मोटेशन कर जमीन जबर्दस्ती प्रशासन के सहयोग से कब्ज़ा कर लिया गया।
जबकि जमीन जिन आवेदनों पर मोटेशन किया गया , वो आवेदन अन्य जमीन के लिए था , लेकिन आवेदन संख्या सहित अन्य कई कागज़ी गवाह सवाल उठा रहे हैं।
जिस राज्य के मुख्यमंत्री जमीन मामले में जेल जाने और इस्तीफा देने को मजबूर हो जाएं , उसी राज्य में आँचलों में किस तरह अनियमितता होतीं हैं , इसका प्रमाण तो मैंनें इसी पेज पर महेशपुर में हुए एक जमीन घपले की कहानी कह दिया था।
आश्चर्य है कि माखनचोर नन्दकिशोर श्री कृष्ण की जमीन तक चुराने से लोग नहीं हिचकते , ऐसे में ये जमीन माफ़िया इनडायरेक्ट में हम जैसे लोगों को जान मारने तक की धमकी भी दे ही डालते हैं ।
अगर मुझे या मेरे परिवार को किसी तरह की हानि होतीं, या पहुँचाई जाती हैं, तो उसके डिजिटल सबूत और नाम जाँच के दौरान जाँच एजेंसियों को मिल ही जायेंगे , लेकिन पाकुड़ में पिछले लगभग एक दशक में इतना जमीन घोटाला हो चुका है, कि झारखंड के कोई भी घोटाला पानी माँगता नज़र आएगा।
लेकिन ऐसे मामले प्रकाश में लाने का मतलब हमेशा जाँच के नाम पर स्थानीय तौर पर सिर्फ 😀😀😀 हाँ हाँ पाठक समझ ही रहे हैं😊

बंगाल में चुनाव के बाद और चुनाव के पहले तक होती है बहुत ख़ामोश हिंसा। सन्देशखाली याद है आपको ? पीड़ा देने और सहने की ख़ामोशी की पराकाष्ठा है सन्देशखाली। मैं भी देख आया कई ख़ामोश चुनावी हिंसा।

पिछले दो महीने से मैं थोड़ा बीमार चल रहा था। पहले हूँ तो मामूली सा गरीब आदमी, लेकिन बीमारी रहिशों वाले पाल रखा है।सुगर , प्रेशर और दिल की बीमारी से दोस्ताना बना रखा है । इसलिए इलाज के लिए कई बार कोलकाता जाना पड़ा।
खैर इन बातों को बताना उद्देश्य नहीं है । उद्देश्य बंगाल चुनाव के विषय में अपने अनुभव साझा करना है।
जाति से पत्रकार रहा हूँ , इसलिए बीमारी के बाद भी , चुनावी माहौल सूंघने निकलना मजबूरी बन जाती है।
कई जगह बंगाल में गया और चुनावी माहौल को टटोला ।
ऐसे मैं बंगाल से काफ़ी करीब से जुड़ा हूँ। मैं यहाँ एक बात स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि इस मामले में मैं शहर और किसी व्यक्ति या परिवार विशेष की बात का पीड़ितों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर उल्लेख नहीं करूँगा।
पिछले 13 मई को बंगाल में भी कुछ जगहों पर मतदान था। मैं एक नामी शहर से लगे एक मुहल्ले में ठहरा हुआ था। अचानक रात में कुछ महिलाओं की सिसकने और फुसफुसाहट वाली आवाज से मेरी नींद खुल गई। मैं कमरे से बाहर निकला तो पता चला कि तकरीबन दो बजे रात में 30-40 व्यक्ति मुहल्ले के लोगों को धमका कर गया है , और एक परिवार विशेष के पुरुषों की हत्या की बात भी कह गया है। ये भी उस परिवार के सदस्यों को चेतावनी दी गई कि मतदान के दिन उस परिवार का कोई सदस्य बूथ पर मतदान करने पहुँचा तो घर तक वापस नहीं आ सकेगा। ये 12 – 13 मई की रात की बात मैं बता रहा हूँ।
मुझे वापस आना था, लेकिन इसके बाद मैं वहाँ ठहर गया।
मतदान के दिन मैंनें मतदान कर वापस आते उस मुहल्ले के लगभग लोगों से बात की। उनमें से दर्जनों लोगों ने कई चुनाव के बाद मतदान किया था , यहाँ तक कि जिस परिवार के यहाँ मैं रुका था , उन्होंने भी पिछले कई चुनाव के बाद मतदान किया था , लेकिन मतदान कर लौटते समय उनसे भी गुंडों ने बूथ से बहुत दूर ये जरूर पूछ लिया कि सही जगह मत दिया कि नहीं। हाँ जिस परिवार को रात में लोग मतदान न करने की धमकी दे गये थे , उस परिवार के लोग उसदिन घर के अंदर ही बंद रहे।
मैं वहाँ से वापस अपने शहर लौट आया , लेकिन सैकड़ों सवाल मेरे मन , मस्तिष्क और दिल को कुरेद रहा है।
चुनावी हिंसा के लिए कई राज्य बदनाम रहे हैं लेकिन जो मैं देख आया ये क्या था !
बूथों पर पुलिस , केंद्रीय बल सब थे , लेकिन 12 मई की रात उस महल्ले में तो धमकी देने वाले और गरीब मजदूरों का सिर्फ परिवार था, और कुछ था तो धमकियाँ , आतंक , आँसू और सिसकियाँ।
ये बंगाल में मैंनें पहली बार ही नहीं देखा , इससे पहले और , और पहले भी ऐसा ही देखा है। जब दूसरी सरकार थीं और जब तीसरी सरकार है।
मतलब बंगाल में चुनावी हिंसा की पुरानी परम्परा रही है , लेकिन बहुत ख़ामोश।
आपको अभी अभी सन्देशखाली याद है ? बहुत ख़ामोशी से सबकुछ होता रहा, और बहुत ख़ामोशी से सबकुछ सहा भी जाता रहा।
ये तो संयोग था , कि ED पर हमला हो गया और बहुत कुछ खुल गया।
चुनावी हिंसा बंगाल में सिर्फ चुनावी मौसम में नहीं, बल्कि चुनाव के बाद और अगले चुनाव के पहले तक होता ही रहता है ।
ग़ज़ब का पैटर्न है वहाँ । सिर्फ़ बंगाल में ही नहीं बल्कि पूरे देश में चुनाव राष्ट्रपति शासन में ही होना चाहिए । लेकिन क्या ये व्यवहारिक और संवेधानिक है ? मुझे पता नहीं। लेकिन ये पूरा मामला मुझे अवाक और निशब्द कर गया।
एक बात सकारात्मक ये दिखा कि कई चुनाव के बाद कुछ लोगों ने इसबार मतदान भी किया।
मैं जहाँ रुका था , वो गरीब मजदूरों का मुहल्ला था। मैंनें फोन पर पता किया कि उस भयभीत परिवार के पुरूष सदस्य जो दिहाड़ी मजदूर हैं , अभी तक घर में ही बंद हैं , काम पर भय से नहीं जा रहे। घर की महिलाएं सिसक रहीं हैं , बच्चे भूख से बिलख रहे हैं , उन्हें तो जीते जी ही मार दिया गया है। जिस पुरूष के सामने माँ बहन और पत्नी आँसुओं में डूबी हुई हों , और बच्चे भूख से बिलख रहे हों , तो क्या वो पुरुष स्वयं को जिंदा समझ रहा होगा ?
सवाल सिर्फ़ राजनीति या नेताओं से नहीं इस सभ्य समाज और पूरे देश से है।

नशे के सौदागरों की बदलती रणनीति , सौंदर्य की आँचलों में छुप बाज़ार की सैर करती सुरक्षित पुड़िया और सरसों के ही भूतों से गच्चा खाती पुलिस

आपने मेरा ड्रग्स पर लिखा आलेख पढ़ा होगा, पूरे आलेख से ये बात तो समझ में आ गई होगी कि पाकुड़ के युवा कल के वर्तमान, आज का भविष्य किस क़दर नशे की आग़ोश में हाँफ रहा है। कुछ लोगों की समृद्धि की भूख हमारे भविष्य से किस क़दर खेल रहा है।
इधर पुलिस की सक्रियता से कुछ लोग गिरफ्तारी की जद में आये। पुलिस की इस सफलता को लोगों ने सर आँखों पर लिया , लेकिन जितना जल्दी सफलता सर आँखों पर चढ़ा , उतनी ही जल्दी उतर भी गया।
कारण बना ड्रग्स व्यवसायियों की रणनीति में बदलाव। अब ये नशे की पुड़िया हाउस वाइफ के ग्रुपों के हाथों थमा दिया गया। बेरोजगार युवाओं और कम कमाई वाले जरूरतमंद युवकों की पत्नियों को पुड़िया बाजार में खपाने की जिम्मेदारी दे दी गई। इससे दो फायदे इन तस्करों को हो रहा , पहला तो मुँहमाँगी कीमत , और दूसरी कि आसानी से पुलिस की गिरफ्त से बचाव। ये विषकन्याएँ ऐसी हैं कि उनपर शक करना भी आसान नहीं।
एक सवाल पुलिस से लाज़मी बनता है कि थाना के सामने के विभिन्न नामों से जाने वाले बाजारों में आसानी से इन ज़हर के पूड़ियों का मिल जाना , और दूसरा सवाल ये कि बाहर से आनेवाले , तथा आसपास के इलाकों से आनेवाले रेगुलर तथा शौकिया नशेड़ियों को आसानी से पुड़िया मिलने के जगहों का पता रहना , आश्चर्यजनक है , जबकि पुलिस थानों के नाक के नीचे इस रँगीन नशे की पूड़ियों का गंध तक न मिलना !
क्या ये सवाल बेमानी है ? बंगला में एक कहावत है कि ” सोरसा तेय भूत तो नेय ” । मतलब सरसों से ही भूत झाड़ने की विधि के दौरान , कहीं सरसों में ही तो भूत बैठा नहीं है। मतलब कि …….
खैर इस नशे के चँगुल में फँसे नवजवानों का और उनके परिजनों का भविष्य तो अंधकार में है ही , लेकिन नशे के तस्करों के चँगुल में फँसे डेलिभरी हाउस वाईफों का क्या होगा ?
अभी चुनाव में प्रशासन और पुलिस व्यस्त है लेकिन उसके बाद ? और हमेशा सरसों में भूत नहीं हुआ करता भाई।

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आलेख के अंत मे लिखा था कि समाज के ऐसे कोढों से निपटने के लिए पुलिस को उत्तरप्रदेश की नीति अपनानी चाहिए। अगर कहें सही तो हाँ ऐसा ही करना चाहिए, क्योंकि परिवार, समाज, प्रदेश और देश के लिए तैयार होती इस निकम्मी फसल को संवारने के लिए थोड़ी अंगुलियों को टेढ़ी तो करना पड़ेगा।

पुलिस को अपने ख़ुफ़िया सूचना तंत्र से ये पता लगाना होगा कि समाज के कौन कौन से युवा ऐसे नशें की गिरफ़्त में है, उन्हें उठाकर आवश्यक हो तो थर्ड डिग्री इस्तेमाल कर ड्रग्स की गंगोत्री का पता लगाना होगा। जब ऐसे स्थानीय गंगोत्री का पता चल जाय, तो फिर इन गंगोत्रीयों को जन्म देने वाले जहरीले ग्लेशियर का पता लगाना आसान हो जाएगा।

पुलिस को सूचना तंत्र को मजबूत कर ऐसे कदम उठाने होंगे, और हमारे जैसे पत्रकारों को अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन कर कंस्ट्रक्टिव जनर्लिज्म, और समाज को सकारात्मक भाव से पुलिस को मदद कर इस जहरीले रैकेट पर विराम लगाना होगा। यहाँ समाज के सभी वर्गों को सकारात्मक रवैया अख्तियार करना होगा।

वरना सोचें कि हमारी अगली पीढ़ी नशें की गिरफ़्त में कैसे एक स्वस्थ समाज का निर्माण कर सकता है? एक कैसा भविष्य हम समाज, प्रदेश और देश को परोस जाएँगे। जिस पीढ़ी के कदम लड़खड़ाते रहेंगे, पलकें बोझिल और दिमाग सुप्त रहेगा, वो कैसा भविष्य होगा !

पाकुड़ “अमड़ापाड़ा ” की सृष्टि प्रिया को महाराष्ट्र में मिला सम्मान , पाकुड़ भी हुआ गौरवान्वित।

झारखंड के पाकुड़ जिला अमड़ापाड़ा प्रखंड पोखरिया रोड निवासी संजय कुमार की पुत्री सृष्टि प्रिया ने महेशपुर के नवोदय विद्यालय से बारवीं पास कर दुमका के एस पी कॉलेज से बैचलर डिग्री ली। विद्याध्ययन के इस सफ़र ने रुख़ किया अंतरराष्ट्रीय महात्मा गांधी हिन्दी विश्वविद्यालय का, और फिर अपनी मेहनत से रच दिया प्रखंड और जिला को गौरवान्वित करने वाला परीक्षा परिणाम का। आमड़ापाड़ा की सृष्टि प्रिया को महाराष्ट्र में किया गया सम्मानित , जिससे पूरा जिला सम्मानित महसूस कर रहा है।

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के हिंदी साहित्य विद्यापीठ के साहित्य विभाग में पढ़ने वाली सृष्टि प्रिया को बैंक ऑफ बड़ौदा के क्षेत्रीय कार्यालय, अमरावती की ओर से मेधावी विद्यार्थी सम्मान योजना से सम्मानित किया गया। इस योजना के तहत क्षेत्रीय प्रबंधक रुचि शिवलिहा एवं उप क्षेत्रीय प्रबंधक पंकज इंगले द्वारा हिंदी विषय के परास्नातक पाठ्यक्रम में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने वाली सृष्टि प्रिया को प्रशस्ति पत्र एवं नकद पुरस्कार देकर सम्मानित किया। सृष्टि प्रिया ने हिंदी विश्वविद्यालय के हिंदी साहित्य विभाग के एम. ए. हिंदी साहित्य में सर्वाधिक अंक प्राप्त किया है। सृष्टि प्रिया ने कहा कि यह हम जैसे विद्यार्थियों के लिए बहुत ही सम्मान की बात है कि झारखंड से आने वाले विद्यार्थियों को महाराष्ट्र में समानित किया जा रहा है। यह सम्मान हिंदी के भविष्य को उज्जवल करेगा। साथ ही बैंक की राजभाषा अधिकारी नंदिनी साव ने बताया कि सन 2006 से बैंक की ओर से हिंदी को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इस सम्मान योजना की शुरुआत की गई। यह सम्मान हिंदी में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को प्रत्येक वर्ष दिया जाता है। सृष्टि प्रिया की इस उपलब्धि पर विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. धरवेश कठेरिया,हिंदी विभाग के अधिष्ठाता अवधेश कुमार शुक्ल एवं कुलपति कृष्ण कुमार सिंह ने विश्वविद्यालय का प्रतीक चिन्ह, सूत माला और अंग वस्त्र पहनाकर भविष्य के लिए शुभकामनाएं दी।
शिक्षा के इस सम्मानजनक सफऱ में पाकुड़वासी की ओर से भी सृष्टि प्रिया को अशेष बधाई और जीवन में उच्चतम सफलता की शुभकामनाएं।

क्या झामुमो राजमहल में विवाद घर में ही निपटा कर नहीं लड़ सकते चुनाव ?

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झारखंड में 14 लोकसभा सीटें हैं। इनमें संथालपरगना में तीन सीटों में एक मात्र सीट पर इंडी गठबंधन के झामुमो के युवा सांसद बिजय हांसदा लगातार दो बार से सांसद हैं। इसबार भी विजय हांसदा को उम्मीदवार बनाया गया है।
विजय हांसदा कोंग्रेस के स्वर्गीय दिग्गज थॉमस हांसदा के पुत्र हैं।
विजय हांसदा का पारिवारिक पृष्ठभूमि राजनैतिक रहा है। थॉमस हांसदा की बीमारी के कारण असामयिक मृत्यु ने जहाँ क्षेत्र में एक राजनैतिक शून्यता पैदा कर दी , वहीं विजय हांसदा कम उम्र में पिता का साया सर से उठ जाने के कारण राजनैतिक दाव सीखने से बाँकी रह गये।
स्वाभाविक है विजय हांसदा के अंदर कुछ कमियाँ रह गई हो। लेकिन 2014 के मोदी लहर में कोंग्रेस से झामुमो में आ कर , झारखंड में एकमात्र राजमहल सीट को झामुमो की झोली में डालना कोई नकारने लायक छोटी उपलब्धि नहीं है, और फिर 2019 में उसे बरकरार रखना भी सराहनीय है।
और फिर संथालपरगना में झामुमो के दिग्गजों के रहते अगर विजय हांसदा में कोई राजनैतिक समझ की कमी रह गई हो , तो इसमें क्या सिर्फ विजय हांसदा दोषी हैं, क्या झामुमो के दिग्गजों का कोई दोष नहीं बनता ?
विजय हांसदा के उम्मीदवार घोषित होने से पहले से ही विरोध के स्वर फूटने लगे थे , तो क्या पार्टी प्लेटफार्म पर घर में ही बैठ कर इसे सुलझाया नहीं जा सकता था ?
अब जब विरोध सार्वजनिक रूप से मैदान में हो ही गया है , तो दोनों ओर से अनर्गल बयानबाज़ी ने मतदाताओं के बीच एक ऊहापोह की स्थिति बना रखी है।
दुमका में जैसे सीता सोरेन और नलिन सोरेन के बीच एक स्वस्थ और आदर सूचक बयानों से विरोध हो रहा है , उससे राजनैतिक और सामाजिक मर्यादा बनी हुई है। जबकि वहाँ तो दोनों अलग अलग पार्टी से हैं। ऐसे भी संथाल और आदिवासी समाज में छोटे बड़े का और बड़े छोटे का जिस तरह सम्मान करते हैं वो देश के हर समाज उसकी सराहना करते हैं।
यहाँ भी अगर वोटकटवा आदि जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं होता तो एक स्वस्थ मतभेद का माहौल भर रहता।
इधर लोबिन साहब कहते हैं, कि मैं निर्दलीय जीत कर झामुमो को सुधारने का काम करूँगा , तो फिर विजय तो आपके बच्चे जैसा है , उसे अपना आशीर्वाद दे कर सुधारिये , अगर वे गलत हैं तो। अपने घर के अंदर बच्चे को डांट डपट कर सुधारा जा सकता है, इसके लिए घर की दीवार तोड़ना तर्कसंगत नहीं।
प्रजातंत्र की खूबसूरती को दोनों बचाये रखें तो ……
मैं किसी पार्टी की बात नहीं कह रहा , सिर्फ़ विरोध के भी स्वस्थ बनाने की बात कह रहा। आदिवासी समाज की मान मर्यादा बहुत खूबसूरत है , इसे बनाये रखने की बात कह रहा।

विजय भैया लोबिन चाचा से मिल कर एक बार आप आशीर्वाद जरूर लीजिए, वे वैद्य भी हैं , कड़वी दवाई उन्होंने बहुत दे दिया , शायद अब मीठा आशीर्वाद भी दे ही देंगे।

लुत्फुल हक़ की महक से एक बार फिर महका पाकुड़, मुंबई में पुनः हुए सम्मानित।

एक बार फिर समाजसेवी “लुत्फुल हक”को वर्ष का सबसे प्रेरणादायक सामाजिक कार्यकर्त्ता का अवार्ड

पाकुड़ नगर के मशहूर समाजसेवी लुत्फुल हक को वर्ष का सबसे प्रेरणादायक सामाजिक कार्यकर्ता (मोस्ट इंस्पायरिंग सोशल वर्कर ऑफ द ईयर) इंटरनेशनल एक्सीलेंस अवार्ड से नवाजा गया है। रविवार की देर शाम मुंबई के पांच सितारा होटल में आयोजित इंटरनेशनल एक्सीलेंस अवार्ड कार्यकर्म में बॉलीवुड की मशहूर अदाकारा कियारा आडवाणी ने अपने हाथों से लुत्फुल हक को अवार्ड और सर्टिफिकेट देकर नावाजा है।
कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों में बेहतर कार्य करने वालों को अवार्ड से नावाजा गया।
बताना लाजमी होगा कि लुत्फुल हक पाकुड़, साहेबगंज जिले के अलावा बंगाल के फरक्का, धुलियान आदि क्षेत्र में भी समाजसेवा का काम कर रहे है।
पाकुड़ रेलवे स्टेशन पर प्रतिदिन ढाई सौ से तीन सौ गरीब लोगों को निःशुल्क भोजन उपलब्ध कराते है। वर्तमान में फर्श से अर्श तक पहुंचने की राह में कई परेशानियों को झेला है। श्री हक अवार्ड प्राप्त करने के बाद कहते है कि फर्श से अर्श तक जाने का मकसद केवल ऊंचाइयों को छूना ही नहीं, बल्कि हरेक परेशानियों को निगलते हुए उस अर्श को छू लेने से है, जो कि फर्श से कोसों दूर है। मुश्किलें परेशानियां दुःख और तकलीफ तो हर मंज़िल की खूबसूरती होती हैं।
उन्होंने कहा कि ईमानदार मेहनत ही आदमी को जमीन से उठाकर आसमान तक ले जाता है। ज़रूरत है आसमान की ऊँचाइयों से जमीन को याद रखना, और उस जमीन पर अपने अतीत को देखना तथा सेवा भाव से गरीब और जरूरतमंदों के साथ खड़ा रहना।
सवालों पर चुटकी लेते हुए उन्होंने कहा कि हम हमेशा ये याद रखते हैं कि ” परिंदों को पता है कि आसमान में कोई ठिकाना नहीं होता, आशियाना जमीं पर ही बनाया जाता है”।
उन्होंने कहा हम सेवा पुरस्कारों के लिए नहीं करते , ये तो लोगों और संस्थाओं का बड़प्पन है, कि वे मुझे सम्मान देते हैं। लुत्फुल जी ने हँसते हुए कहा कि ये पुरस्कार और एवार्ड मुझमें सेवा भाव को और मजबूत करता है।
ये बताना लाज़मी होगा कि लुत्फुल हक़ जी को देश-विदेशों में भी दर्जन भर पुरस्कार तथा सम्मान मिल चुका है। इतने के बाद भी उनकी सादगी किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को प्रभावित किये बिना नहीं रह सकता।
इधर बधाइयों का तांता लगा पड़ा , लेकिन लुत्फुल नामक फूल की महक से पूरा पाकुड़ गौरवान्वित है।

फर्जी कम्पनियों के नाम पर गटक गये करोड़ों , ग़ज़ब का बुना गया जाल , झारखंड के देवघर से कोलकाता तक के गड़बड़ सफ़र में दिल्ली , हैदराबाद तक के लोग हैं शामिल।

पिछले दिनों मैं बीमार पड़ा। इलाज़ के लिए कोलकाता गया। एक अस्पताल में इलाज हुआ। अभी ठीक हूँ।
लेकिन वहाँ इलाज के दौरान एक भद्र (सभ्य ) व्यक्ति से मुलाकात हुई। उन्होंने मुझे पहचान लिया कि मैं झारखंड से हूँ, और पत्रकार हूँ ।
मेरे साथ चाय पीने के दौरान उन्होंने बातचीत में मेरा विश्वास जीता और उन्हें भी मुझ पर विश्वास आया। वापस आने के बाद मेरा इलाज के लिए वहाँ कई बार आना जाना हुआ। फोन पर भी हमारी बातें होतीं रहीं।
पिछली बार जब मैं वहाँ गया तो , मुझे उस भद्र मानुस ने सबूतों के साथ एक बात साझा की जो चौकाने वाली थीं।
वे सभी कागज़ात जिसकी फ़ोटो कॉपी मुझे सौंपी गई , सभी प्राइवेट बैंकों के स्टेटमेंट टाइप के थे। जो काफ़ी संदेहास्पद कहानी बयां कर रहे थे।
उन्होंने बताया कि एक बिल्डर ने जिनका होटल झारखंड के देवघर , पश्चिम बंगाल के तारापीठ और दीघा जैसे धार्मिक टूरिस्ट जगहों पर है , ने 2009 में दक्षिण कोलकाता 700025 में एक तीन तल्ला पुराना मकान खरीदा। हँलांकि वहाँ 2013 तक कुछ बनाया नहीं, पर गुल खिलाने के लिए उस पते पर 20 से 30 फर्जी कम्पनियाँ बना लीं। ( पूरा पता अगले आलेख में डालूँगा ) क्योंकि ये बंगाल के मुखिया के नाक के नीचे स्थित है।
हँलांकि भगवान विष्णु के एक अवतार के पालनकर्ता माता श्री के नाम पर 16 गणेशचन्द्र एवेन्यू के 7 वें फ्लोर , कोलकाता 13 में एक लिमिटेड कंपनी है , उसके कर्ता धर्ता आभास अग्रवाल (काल्पनिक नाम) के द्वारा ही इन सब कारनामों को अंजाम दिया गया है कि प्राइवेट बैंकों से करोड़ों के ऋण (लोन) लेकर फर्जी कम्पनियों को ट्रांसफर कर दिया गया। ये ट्रांसफर के समयों , चेकों के नम्बर आदि को गहराई से देखा जाय तो कई संदेह पैदा करते हैं।
फर्जी कम्पनियों को बाद में तथाकथित दिवालिया घोषित कर दिया गया, और बैंकों के पैसों का राम नाम सत्य है कर दिया गया।
आपको आश्चर्य होगा कि सभी फर्जी कम्पनियों के डायरेक्टर मंडल में मालिक के नोकर , ड्राइवर और ऐसे कर्मचारियों को रखा गया था, जिनसे उनके वेतन के झाँसे में कहीं भी हस्ताक्षर लिया जा सके। बेचारे उन कर्मचारियों को तो यह भी पता नहीं होता कि वे किसी फर्जी ही सही , बड़ी कम्पनी के डायरेक्टर हैं।
एक जानकारी के अनुसार किसी अन्य मामले में शायद ED इस पूरी कहानी की पटकथा लिखने और गबन के डायरेक्टर को रडार में रखे हुए है, लेकिन फर्जी कम्पनियों और बैंकों के लोन को गटकने के मामले तक अभी तक जाँच एजेंसियों से अनछुए हैं।
कुछ बैंकों के 2009 से 2013-14 तक के कागज़ात को खंगाला जाय तो , चौकाने वाले मामलों का खुलासा होगा। सूत्र के सूचनानुसार दिल्ली, और हैदराबाद की कम्पनी भी इससे संलिप्त हैं। इसमें वहाँ के भी कई लोकल लोग शामिल हैं । सबका नाम आहिस्ते से सामने आएगा।
भाई जहाँ केंद्रीय सुरक्षा घेरे में माफियाओं द्वारा ED और CBI तक सुरक्षित नहीं रह पाता , वहाँ हम जैसों को तो बहुत सोचना होगा और चाहिए भी।
अभी कागज़ात का अध्ययन ऑन वे है। कम्पनियों के नाम, फर्जी कम्पनियों के नाम , तारीखों के साथ लेन देन और ट्रांफर के डिटेल्स इसी पेज पर परोसने का काम करूँगा। भाई एकाउंट और व्यवसायिक इकोनॉमिक्स के डिग्रीधारी की छत्रछाया में तकरीबन एक हजार करोड़ के गबन का जो मामला है।
ऐसे जालों के बुनावट के धागों को खोलने में हम शब्दों के बुनकर को वक़्त तो लगेगा😊

राजमहल लोकसभा सीट पर इंडी गठबंधन और झामुमो प्रत्याशी सांसद बिजय हांसदा के खिलाफ उनके अपने मतदाता व्यक्त कर रहे असन्तोष, जीत पर ही उठ रहे सवाल, दूसरे प्रत्याशी की मांग।

*इंडिया गठबंधन राजमहल से प्रत्याशी बदलें नही तो तीसरे मोर्चे की तलाश की होगी मजबूरी*

राजमहल लोकसभा क्षेत्र के झामुमो प्रत्याशी विजय हांसदा के प्रत्याशी घोषणा के पहले से ही पार्टी के अंदर से विरोध के स्वर फूटने लगे थे। झामुमो के ही विधायक और कद्दावर नेता लोबिन हेम्ब्रम ने खुले आम सार्वजनिक रूप से लगातार दो बार सांसद रहे विजय हांसदा का विरोध शुरू कर दिया था। घोषणा होने के बाद तो बकायदा प्रेस वार्ता कर विधायक लोबिन जी ने राजमहल से निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी।
इधर जहाँ लोबिन जी क्षेत्र में घूमकर लोगों की अपने पक्ष में नब्ज़ टटोल रहे हैं, वहीं लगातार दो बार से सांसद रहे विजय हांसदा से नाराज युवा मतदाता विभिन्न मुद्दों को ले बैठकें कर रहे हैं।
खासकर अल्पसंख्यक समुदाय के बेरोजगार युवा उनसे खासे नाराज लग रहे हैं।
इसी क्रम में रविवार को हिरणपुर प्रखंड में इकरामुल अंसारी के नेतृत्व में लिट्टीपाड़ा विधानसभा के युवाओं ने एक बैठक कर लोकसभा चुनाव के संदर्भ में चर्चा किया गया। जिसमे सभी युवाओं ने वर्तमान सांसद सह प्रत्यासी के पिछले 10 वर्षो के कार्यों पर चर्चा करते हुए कहा की सांसद ने 10 वर्षो में क्षेत्र में कोई काम नही किया है केवल टेंडर लेने का काम किया है। साथ ही मुस्लिम समाज का वोट लेने के बाद भी उन्होंने मुस्लिम समाज की हमेसा अपेक्षा ही किया है। क्षेत्र के जनता सांसद से काफी नाराज है। एवं मुस्लिम समाज अपने को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। जिसमे लिट्टीपाड़ा विधानसभा के युवाओं ने इंडिया गठबंधन से मांग करते हुए कहा कि राजमहल लोकसभा से प्रत्यासी को बदलते हुए अन्य कोई कार्यकर्ता को टिकट दे या फिर लोबिन हेंब्रम को टिकट दें। तभी जीत निश्चित हो पाएगा। वरना राजमहल सीट का नुकसान पार्टी को होगा जो लोबिन हेंब्रम जी नही चाहता है की झारखंड मैं एक सीट लोकसभा मैं मिला है वो जो अब वो भी नही बचेगा।आज सांसद ने पूरे लोकसभा में मुस्लिमो से वोट तो लिया लेकिन मुस्लिमों के मुद्दो पर कभी बात करना उचित नहीं समझा। आज चुनाव है तो मुस्लिमों की याद आ रही है। युवाओं ने कहा कि सांसद के कोई कार्य से संतुष्ट नहीं है सांसद ने मुस्लिमो के किसी भी मुद्दे पर कभी भी लोकसभा आवाज उठाने का काम नही किया है , चाहे मोबलिंचिंग हो, उर्दू स्कूल का मामला हो, स्थानीय युवाओं को पैनम में रोजगार का मामला हो, किसी भी मुद्दे पर बात उठाना उचित नही समझा केवल निजी स्वार्थ ओर ठीकेदारी करने का काम किया है।लेकिन लोबिन हेंब्रम जी शुरू से सरकार को आईना दिखाने का काम किया साथ ही साथ उर्दू स्कूल बंद जो पड़ा है उसको लेकर पत्र भी लिखा था सरकार को।इस बैठक में समाजसेवी नजरूल इस्लाम, इकरामुल अंसारी, अबू नसर, वसीम अंसारी, मुजामिल अंसारी, मोफिज अंसारी,सेंटू सहित दर्जनों लोग उपस्थित थे।
हँलांकि संथालपरगना के तीनों सीट पर अंतिम चरण में एक जून को मतदान होना है। इस बीच प्रत्याशी, पार्टी और पूरे इंडी गठबंधन को काफी मेहनत से इन असंतोष की आवाज़ को अपने पक्ष में करना होगा।

आँखें तरेरती चिलचिलाती धूप कह रही है , जिंदगी की तलाश में मौत के कितने करीब आ गये तुम !

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ये जो चित्र में आँकड़े और एक तरह की चेतावनी नज़र आ रही है, उसपर सोचिए।
चिंतन कीजिए ।
कल ही पाकुड़ में वन विभाग और पुलिस ने संयुक्त रूप से एक घर में छापेमारी कर लाखों के कटे पेड़ों से बने पटरों को जप्त किया। कहीं सेकड़ों पेंड कटे होंगे जरूर।
कोई ऐसा महीना नहीं जब वन विभाग कटे पेड़ों को जप्त न करता हो।
कभी सतपुड़ा के घने जंगलों से जुड़ता झारखंड के जंगल अब दूर दूर तक ठूंठ में बदल गये हैं। संथालपरगना में तो पहाड़ों तक को जंगलों से नँगा कर पत्थर माफिया खा गये।
नङ्गे और पूरी तरह खा चुके पहाड़ों की दुर्दशा देखनी हो तो आँसू पोछने के लिए रूमालों के साथ साहेबगंज और पाकुड़ में आपका स्वागत है। अगर आप संवेदनशील हैं, तो शायद रुमाल कम पड़ जाए।
अभी बढ़ते तापमान पर रोती मानवता की खबरों से अखबारों के पन्ने भरे पड़े हैं।
दो चरणों के मतदान में भी इसका प्रभाव साफ़ दिखता है। लेकिन दुखती मानवता के बीच अमानवीय ढंग से उजड़ते जंगलों की ओर किसी की मानवीय नज़र नहीं पड़ती।
आश्चर्य का विषय है कि अट्टालिकाओं में अपनी ही कब्र खोदती मानवता बड़ी इतराती हुई लकड़ी के फर्नीचरों पर बेशर्म मुस्कुराहट परोसती नहीं थकती।
मकान बनाने की मनाही नहीं है, लेकिन मकान के चारों तरफ़ पेंड भी तो लगाया जा सकता है। अगर ऐसा नहीं कर सकते तो लकड़ियों के फर्नीचरों से ही तौबा कर लो।
जंगलों को बचाओ , वरना ये असन्तुलित होता वातावरण तुम्हें भी नहीं जीने देगा।
हर आदमी दो-दो पेंड़ भी लगाए ……
खैर जंगलों को बचाओ भाई , पेड़ों से वीरान जंगल मानवीय जीवन को लील जाएगी।
अब बहुत दूर नहीं है क़यामत के दिन अगर न चेते ।
ये तपिश लील जाएगी सबकुछ , सबकुछ , हाँ पूरी मानवीय जीवन भी। मत खेलो पेड़ों के जीवन से , इसी की ओट में छुपा है तुम्हारा भी जीवन।
लहलहाते दरख्तों के सौंदर्य और जंगलों की ऊंघती छाँव में मुस्कुराते अपने जीवन को साँसें लेने दो, लेने दो न !