Saturday, June 15, 2024
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Mother’s Day खो गयी आँचल की ठंडी छाँव, सुरक्षा का अहसास और सौंधी सुगन्ध

खो गई है Mothers day की एकदिनी आयोजन में इसकी महिमा। माँ (mother) शब्द मात्र नही, एक जीवन पद्धति की पूरी शोधपत्र है। अब माशूका की ज़ुल्फों में वो महक़ कहाँ ? जो सौंधी सुगंध माँ की आँचल से मिलती थी “बच्चन”।

भौतिकता की अंधी दौड़ में माँ के आँचल से बिछड़ने की सज़ा पाता है,
अब तो बच्चे शहरों में हर चीज के तपिश भरी लाइन में ही नज़र आता है

Mathers day 8 मई को है। लेकिन बिना माँ के जीवन (life) की कल्पना ही बेमानी है। एक भी दिन बिना माँ के ? इसके जेहन में आने मात्र से पूरा शरीर, रोम रोम सिहर सा उठता है। इन्सान ही नही सभी जीवों की सबसे अच्छी दोस्त उसकी माँ होती है, जिससे वो अपने दिल की बात करता या कहता है। इंसान (human) या कोई भी जीव जब ज़ुबान से कुछ नहीं बोल पाता तो उसके मौन एक्सप्रेशन को भी सिर्फ़ माँ ही समझ सकती है। माँ शब्द ही अपने आप में एक पूरी थेसिष है, एक ऐसी कहानी है, जिसे कही नहीं बल्कि महसूस की जा सकती है।

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माँ पर कुछ लिखना कहना हमेशा नाकाफ़ी रहेगा। शब्द (word) और तमाम अभिव्यक्तियों के माध्यम माँ शब्द के सामने बौने सावित हो जाते हैं। हलाँकि पत्रकारिता (journalism) के जीवन को जी कर कुछ ऐसे मामलों से भी रूबरू हुआ हूँ, जहाँ इस शब्द को दाग़दार होते भी देखा है। लेकिन कुछ उदाहरण इस शब्द की महत्ता पर भारी नही पड़ सकते, पर चिंता और चिंतन की आवश्यकता पर जरूर जोर देने को मजबूर करता है।

मुझे पता है, इन बातों के कारण लोग इस मामले पर इत्तेफ़ाक़ नहीं रखेंगे। लेकिन मेरी पत्रकारिता ने मुझे हमेशा सत्य के लिए विद्रोही स्वभाव का बनाए रखा। मेरी कलम और लेखन भी मेरे विद्रोही स्वभाव से प्रभावित रहा है। लेकिन माँ की महत्ता को मेरा विद्रोही होना भी नकार नही सकता। आप कितने भी बड़े हो जांय, बादलों सी ज़ुल्फों की छाँव आपको जितनी भी शीतलता दे। प्रेमिका की बाहों की जकड़न आपको किसी तरह महसूस हो, पर माँ की गोद मे उसके आँचल की छाँव जो सकून और सुरक्षा का अहसास कराता है, वो किसी गोद और छाँव से अतुलनीय है। ये और बात है, कि भौतिकता की दौड़ ने साड़ियों को वनवास दे दिया और अब तो आँचल कहीं खो सा गया। कुछ सलवार जंफर की ओढ़नियों में भी आँचल की सुगंध मिलती है, पर भौतिकता और नए फ़ैशन ने उन ओढ़नियों को भी लगभग आधुनिक माँओं से से छीन ही लिया।

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माँ शब्द इतना सुंदर है, कि इसके सामने सुंदरता के मामले में कोई भी शब्द पानी माँगता सा लगता है। जब शब्द ही सुंदरता का अहसास कराता है, तो बच्चों के लिए माँ के चेहरे की सुंदरता की कल्पना करना भी असंभव सा दिखता है। लेकिन अब तो इस शब्द पर भी शॉर्टकट ने अतिक्रमण कर लिया है। अब माँओं को भी इस शब्द के शॉर्टकट पर्याय ही सुनने में अच्छा लगता है। माँ की ख़ुशियाँ बच्चों की खुशियों में निहित होती है। किसी भी क़ीमत पर माँ अपने बच्चों को खुश देखना चाहती है। एक पति भी पत्नी को खुश रखने के लिए पहले उनके बच्चों को खुश रखने का प्रयास करता है। हमेशा माँ की खुशी बच्चों की खुशी में निहित दिखती है। पर यहाँ भी किट्टी पार्टी ने अतिक्रमण कर रखा है।
माँ घर में कहाँ क्या है , किसे क्या पसंद है से परिचित रहा करतीं है। ये भारतीय परंपरा के अनुसार ही नही पूरे विश्व में माएँ ऐसी ही होती रहीं हैं।

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लेकिन अतिक्रमण ने यहाँ भी अपनी इंट्री मार रखी है। अब तो आया इन बातों के लिए जिम्मेवार हैं। मानवीय मूल्यों (human values) के गिरते स्तर ने तमाम रिश्तों को कमज़ोर कर दिया है। यहाँ इन रिश्तों को भी देशी और पौराणिक जीवनशैली के टॉनिक की आवश्यकता है। ये विद्रोही लेख किसे कितना पसंद आएगा, पता नहीं लेकिन जैसे कुछ उदाहरण आजकल विदेशों से नॉकरी छोड़ कर आये युवाओं को खेती करते देख ऐसा लगता है, कि हमें अपनी ज़मीन पर वापस लौटना होगा।

बस हाथ की लेखनी ही काफ़ी है नन्दलाल परशुराम सर के लिए

ठीक उसी तरह हमें अपनी पारिवारिक संस्कृति की जमीन पर लौटना आवश्यक है। वरना हम बस नकल में अकल खोते रहेंगे और बिना माँ के जीवन की कल्पना न करने वाले बच्चे और आधुनिक माएँ , इस माँ शब्द और इससे जुड़ी भावनाओं, सच्चाइयों से इतर एक दिन Mothers day मना कर रह लिया करेंगें।

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