Saturday, June 15, 2024
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डिजिटली भी सत्संगति से सम्भव है स्वयं का परिष्करण

सन्तों की संगति मनुष्य के सिर्फ़ स्वभाव को सुंदर नहीं बनता, बल्कि दिल-दिमाग के साथ व्यक्ति के चिंतन और दूरदृष्टि को भी परिष्कृत तथा स्वस्थ करता है।

ये संगति सन्तों की कई प्रकार की होती है-
पहली संगति तो आप या मैं स्वयं संत के भौतिक रूप के साथ रह कर प्राप्त कर सकते हैं, दूसरी कि हम उनका चिंतन, मनन तथा उनके द्वारा कहे या लिखे गए को पढ़ें सुने आदि।
आज की डिजिटल दुनियाँ में दूसरा पहलू ज़्यादा सुलभ है,ऐसे भी जो संत या महापुरुष भौतिक नश्वर शरीर का त्याग कर चुके हैं, डिजिटल दुनियाँ हमें उनके चिंतनों से भी परिचित करवाता हैं।
बाबा कीनाराम शिष्य परम्परा के अघोरेश्वर संत भगवान स्वरूप को प्राप्त कर अवधूत राम बाबा ने किस तरह अध्यात्म और आध्यात्मिक सिद्धान्तों के परे आध्यात्मिक जीवन और देश तथा पीड़ित समाज की सेवा को ईश्वरीय कार्य से जोड़कर सुलभ बनाया है,इसे मैं फ़िर कभी लिखूँगा , लेकिन समय समय पर उनके चिंतनों का प्रसाद मुझे डिजिटली पठन पाठन में मिलता रहता है। उन्हीं में से एक कथा मैं यहाँ अपने मित्रों से साझा करना चाहता हूँ।
” एक नाविक एक साधु को प्रतिदिन नदी के उसपार ले जाता और ले आता था।
साधु इस दौरान नाविक को धर्म की कथाएँ सुनता था, नाविक भी आनन्द के साथ चुपचाप साधुवचन का रसास्वादन करता रहता । बदले में नाविक साधु से लाख प्रयासों के बाद भी कोई पारिश्रमिक नही लेता।
मानव स्वभावबस साधु नाविक के साथ उसकी सरलता के कारण बंधता चला गया।
संत कथा श्रवण की पात्रता एवं नाविक के व्यवहार से प्रशन्न साधु ने एक दिन नाविक से अपने आश्रम चलने का आग्रह किया , नाविक संत के आश्रम में गया।
नाविक को साधु ने अपनी कहानी सुनाते हुए बताया कि पहले वह व्यापार करता था , एक सुंदर सांसारिक जीवन व्यतीत करता था।
एक आपदा में उसका पूरा परिवार चल बसा , और वह गृह त्याग कर साधु बन गया।
इसके बाद साधु ने नाविक से कहा कि उसके पास आश्रम में उसके व्यापार से कमाए बहुत धन है, जो वह नाविक को देना चाहता है।
साधु ने कहा कि ये धन अब मेरे किसी काम के नही , तुम परिवार वाले और सांसारिक हो , इस धन से तुम्हारी सभी आवश्यकताएं पूरी हो जाएंगी।
लेकिन नाविक ने वो धन लेने से मना कर दिया।
उसने कहा कि इस धन से मैं और मेरा परिवार न सिर्फ़ अलसी – कामचोर हो जाऊँगा बल्कि मेरे बच्चों का भविष्य भी ऐसे में बर्बाद हो जाएगा।
ऐसे में साधु कौन है ?
वो जो परिवार के खोने के बाद विरक्ति में गृह त्याग तो सकता है, लेकिन धन आश्रम तक ढो लाया है , या फ़िर वो नाविक जो मुफ़्त में मिल रहे स्वप्नातीत अगाध धन को नकार कर अपने मेहनत पर जीवन यापन चाहता है ?
यहाँ साधु की संगति ने नाविक को साधु से भी बड़ा साधु बना दिया।
खैर यहाँ सिर्फ़ संगति ही अपने गुणों को सावित करता है।
ये मैंनें भी अपने जीवन में अहसास किया है, कि संगति स्वभाव, व्यवहार , चिंतन मनन एवं जीवन पर अपना प्रभाव छोड़ ही जाता है।
इसलिए कम से कम डिजिटली सन्तों के विचारों और जीवन का अध्ययन कर स्वयं के हर पहलू को परिष्कृत जरूर करना चाहिए।

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