Thursday, March 26, 2026
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राजनीति के चक्कर में दंगे की आग आम गरीबों को दे जाते हैं नासूर ज़ख्म, नेताओ को कुर्सियाँ।

आज राजनीति ऐसी करवटें बदल रही है, कि जाति और सम्प्रदाय के बीच नेताओं की कूटनीति खेल रही है। राज्य और देश के विषय में सोच ने किनारा कर रखा है। ये पार्टियाँ और नेताओं के चक्कर में आम लोगों को भुगतना पड़ता है। हम इस दूषित राजनीति में ऐसे फँस जाते हैं कि एक दूसरे की जान तक के दुश्मन बन जाते हैं, और समाज में कराह तथा जीवनभर के आँसू रह जाते हैं।

ऐसा ही एक संस्मरण आपके सामने परोस रहा हूँ।

समय बड़ा बेसमय हो गया था, दशक 1980 के अंतिम पड़ाव पर था। सन 1989।
मैं अपनी पढ़ाई के लिए पाकुड़(अब झारखंड, तत्कालीन बिहार के अंतिम छोर के कस्बाई अनुमंडल) जिला से भागलपुर में था।
भागलपुर एक जाना पहचाना , मेरे ननिहाल का निकटतम होम टाउन था। 1986 के अंतिम दिनों में मैं पढ़ाई के लिए वहाँ था। 1989 में शहर दंगे की चपेट में आ गया।
मैं अपने शैशवावस्था से पाकुड़ में ही किशोरावस्था से होते हुए युवा हुआ। मुझे उस समय ये पता नहीं था, कि जाति और धर्म व्यक्ति को बाँटता है , क्योंकि पाकुड़ में ये माहौल ही नहीं था। हमें पता ही नहीं चलता था कि समाज में ऐसा कुछ होता है , लेकिन आज लोगों को ये अविश्वनीय लगेगा। हँलांकि पाकुड़ भी अब बाहरी सोच की हवाओं से मानसिकता के प्रदूषण को झेलने लगा है, लेकिन आज भी यहाँ की हवाओं में खूनी ज़हर जगह नहीं बना पाया है।

मेरी संगति और दोस्ती भागलपुर में भी इन बंधनों से दूर ही रहा।
अचानक एक दिन भागलपुर में दंगा हुआ , पहली बार राजनीति और उसके बदनाम पहलुओं के साथ सम्प्रदाय शब्द से रूबरू हुआ।
बदमिज़ाज राजनीति के पहलुओं से मेरा साक्षात्कार यहाँ पहली बार हुआ। विद्रोह और पुलिस से लेकर जनता तक की बिद्रोही स्वभाव के अस्वाभाविक पहलु से मैं परिचित हुआ। बड़े बड़े पदासीन नेताओं को पिट जाते तक देखा।
दुखद ये कि निरीह और निर्दोषों को अकाल मरते मिटते देखा।
बचाव और सहयोग के हाथ को बढ़ते और उन हाथों को भी कटते देखा । क्या देखा और क्या न देखा , इस सवाल से भी लोगों को बचते देखा।
इन सबके बीच मैंनें अपने आँसू को सूखते और दिल को रोते देखा।
यहाँ से ही सरोकार के लिए मैंनें अपनी कलम को चलते देखा। फिर उस कलम की सफ़र को प्रकाशन के अभाव में दम घुटकर सिसकते देखा।
इन सबके बीच मैं पीड़ितों से मिलता रहा। दंगे की खूनी आग तो दब चुकी थी , लेकिन दबी राख़ में सिसकते दर्द भरी कहानियाँ, उन कहानियों में कहीं असह्य दर्द , दर्द में छुपी हुई घृणा और द्वेष , कहीं बदले की मानसिकता तो कहीं चलो झुलसी जिंदगी को एक नई राह पर ले चलूँ का भाव , न जाने और कितना कुछ दिखता गया , और मैं लिखता गया।
उस समय कोई इंटरनेट या डिजिटल प्लेटफार्म नहीं था। कागज और कलम पर लिखता रहा। जो दिखा उन्हीं दर्दों को शब्दों में उकेरता गया। मैं किसी का नाम नहीं लूंगा , लेकिन सत्यात्मक तथ्यों को कहीं प्रकाशन का मंच नहीं मिला। पढ़ने को बहुत कुछ मिलता , लेकिन जमीन की बातें कम और मसालों की सुगंध ज़्यादा थीं।
” यूँ ही तन्हाई में हम दिल को सज़ा लेते हैं,
नाम लिखते हैं तेरा ,लिखकर मिटा देते हैं,
जब भी नाक़ाम मुहब्बत का कोई ज़िक्र करे,
लोग हँसते हैं, हँसकर मेरा नाम बता देते हैं ”
कुछ इसी तरह के दर्द को लिए हम हक़ीक़त की कहानी लिखते गए, और जमा करते गए।
हाँ दंगा पीड़ितों में मैं दर्द की कहानियों को टटोलता जहाँ गया , हर जगह मुझे सम्प्रदाय से इतर एक पीड़ित ही मिला। हर पीड़ित गरीब , रोज कमाने खानेवाले और दिन निकलते ही अपनी मेहनत से समाज , राज्य और देश को कुछ न कुछ देने वाले दीन ही दिखे।
आश्चर्य था , कोई सामर्थवान हिन्दू या मुसलमान मुझे दंगा पीड़ित नहीं दिखा। किसी कौम का कोई बड़ा या छुटभैया नेता तक पीड़ित नहीं दिखा, जिन्होंने ऐसे नरसंहार की पृष्ठभूमि तैय्यार की।
धर्म के ठेकेदारों ने ऐसा अधार्मिक पृष्टभूमि बनाई कि मानवता कराह उठी थी। जिधर देखता सिर्फ़ एक दर्द की कराह थी। अफवाहों की ज़हरीली हवा कहीं से उठती और मनुष्य को हैवान बनाती गुज़र जाती।
मेरी थैली में सैकड़ों दर्द की कहानी कागज़ों पर उकरी पड़ी थी।
मुझे मेरे पिता ने सकारात्मक पहलुओं पर लिखने की शिक्षा दी थी , मैं उन दर्दो की कराह में भी कोई सकारात्मक पहलू ढूँढता, लेकिन पीड़ितों की करुण चीत्कार मुझे दहला देता , और कहीं मैं स्वयं को बेबस पाता। मेरी कलम भटक पड़ती। मेरी उम्र की अपरिपक्वता मुझे अपनी चपेट में ले लेती। कभी कोई तो कभी और कोई मुझे दोषी लगता।
कुछ दिनों में दर्द के उन पहलुओं ने , जो न तो हिन्दू था , न मुसलमान , जो सिर्फ़ और सिर्फ़ मानवता की कराह भर थी , ने मुझे मानसिक रूप से विचलित कर दिया।
राजनीति की उठापटक और लाशों के सीने पर कूटनीति की नूराकुश्ती ने मुझे विचलित कर रखा था।
गंगा किनारे घण्टो बैठ कर सोचा करता कि कुर्सी के लिए इतनी गोद सूनी कर , घर के चिराग़ तथा कितने ही बच्चों के सर से ममता और पालन की छाँव छीन ये कैसे सामान्य बने रह सकते हैं ?
अपनी कहानियों के प्रकाशन के अभाव में एक दिन मैं भी इतना निराश हो चला कि गंगा किनारे गंगा माँ से कहा कि जितनी लाशों को बिना उसके मज़हब को पूछे तूने उन्हें अपनी गोद में जगह दी माँ , उन तक उनके अपनों की दर्द और आँसुओं का ये संदेश भी पहुँचा देना।
मैंनें अपने लिखे सभी दर्दो की कहानियों को पन्ने दर पन्ने गंगा की लहराती आँचल में डाल दिया।
कहानियाँ तो गंगा की आँचल में चलीं गईं, लेकिन मेरी कलम आँसुओं की राह भी चल चुकी थी अपने सफ़र में।
सच कहने लिखने की मेरी आदत ने पीठ तो बहुत थपथपाए , लेकिन उतने ही छुरा मेरे पीठ ने खाये।
” सच्ची बात कही थी मैंनें,
लोगों ने सूली पे चढ़ाया,
मुझको ज़हर का जाम पिलाया,
फिर भी उनको चैन न आया ”

चुनाव एवं अन्य मामलों पर उपायुक्त ने की कई बैठक , आसन्न लोकसभा चुनाव को ले दिये निर्देश।

*शनिवार को समाहरणालय सभागार में जिला निर्वाचन पदाधिकारी सह उपायुक्त श्री मृत्युंजय कुमार बरणवाल की अध्यक्षता में विभिन्न विभागों के पदाधिकारी, कोल कम्पनी के प्रतिनिधि, बार एसोसिएशन, मीडिया प्रतिनिधि एवं विभिन्न उपक्रम के साथ बैठक की।*

बैठक में *उपायुक्त श्री मृत्युंजय कुमार बरणवाल* ने संबंधित अधिकारियों को कहा कि आपके जितने भी कर्मी है सभी का वोटर आईडी कार्ड बना रहना चाहिए। इसे हर हाल में सुनिश्चित किया जाए। उपायुक्त ने जिला आपूर्ति पदाधिकारी को निर्देश दिया कि जिले में 650 पीडीएस डीलर है। सभी पीडीएस डीलर को voter helpline app डाउनलोड करायें। साथ ही 4 मार्च 2024 को सभी मतदान केन्द्रों पर चलने वाले सोशल मीडिया अभियान #IamVerifiedVoter में शामिल हो। उपायुक्त ने कोल कम्पनियों के प्रतिनिधियों को चुनाव का पर्व, देश का गर्व से संबंधित लोगो 8 हजार मैगनेटिक स्टीकर बनाने का निर्देश दिया। ये स्टीकर जिला के सभी पदाधिकारी एवं कर्मी, मीडिया कर्मी, कोल कम्पनियों के प्रतिनिधि, पेट्रोल पंप के स्टाफ, रेलवे के स्टाफ आदि सभी लोग प्रतिदिन स्टीकर लगाकर कार्यालय जाएंगे, वोटिंग के दिन तक लगाना है। कोल कम्पनी के प्रतिनिधियों को निर्देश दिया कि सभी हाइवा में चुनाव से संबंधित पोस्टर लगाए। साथ ही उपायुक्त ने श्रम अधीक्षक को निर्देश दिया कि सभी श्रमिकों को एसएमएस भेजकर वोटिंग के दिन अपने मतदान केंद्र पर आकर वोट करें। वहीं शिक्षा विभाग को निर्देश दिया कि के.के एम कालेज एवं पॉलिटेक्निक कॉलेज में सभी छात्र छात्राओं को वोटर हेल्पलाइन डाउनलोड करवायें।

*मौके पर सहायक समाहर्ता डॉ कृष्णकांत कनवाड़िया, सिविल सर्जन डॉ मंटू कुमार टेकरीवाल, निदेशक आइटीडीए श्री अरुण कुमार एक्का, उप निर्वाचन पदाधिकारी श्री राजीव कुमार, जिला परिवहन पदाधिकारी श्री संजय पीएम कुजूर, जिला जनसंपर्क पदाधिकारी श्री राहुल कुमार, जिला शिक्षा अधीक्षक श्री नयन कुमार, श्रम अधीक्षक श्री रमेश प्रसाद सिंह समेत अन्य उपस्थित थे।*

लॉटरी के सफेदपोशों के गिरेबान तक पहुँचेंगे कानून के हाथ ?

पाकुड़ सदर प्रखंड के मनिरामपुर के दो युवक बीते दिनों लाखो के अवैध एटीएम लॉटरी के साथ पकड़े गये। ये तो मात्र एक वानगी है। जिले के सभी प्रखंडो में ऐसी लोटरियाँ अपना पैर पसारे हुए है। आख़िर इस अवैध लॉटरी की नदी की कोई तो उदगम स्थल होगा ?
फ़िल्वक जानकार बताते हैं कि इस अवैध की नदी में कई अवैध नाले विभिन्न स्थानों से आकर मिलते हैं। इसमें हिरणपुर प्रखंड से भी एक बड़ी भागेदारी है। सूत्रों के अनुसार हिरणपुर के साहा और यादव जी की जोड़ी एक कलम की छाँव तले भी इबारत , लिखते हैं, तो पाकुड़ में मंडल जी , भगत जी और बाबा जी अपनी कहानियों को अमलीजामा पहनाने का काम करते हैं।
ये सारे साहा जी, यादव जी , मंडल जी , भगत जी , बाबा जी आदि सभी सांकेतिक उदाहरण हैं। यहाँ इतने समाजिक सौहार्द के साथ अवैध लॉटरियों के नाले बहाये जाते हैं, कि ये सभी मिलकर एक नदी बन जाती है। यहाँ के माफियाओं ने ग्रामीण क्षेत्रों के अलावे बंगाल में भी प्रिंटिंग के यूनिट बैठा रखे हैं। ये एटीम लोटरियाँ बंगाल में तो बिकती नहीं , क्योंकि वहाँ लॉटरी पर प्रतिबंध नहीं है , स्वाभाविक रूप से वहाँ अन्य राज्यों सहित बंगाल के भी ओरिजनल लोटरियाँ ही बिकतीं हैं, और अवैध एटीम लॉटरी के लिए पाकुड़-साहेबगंज तो है ही।
कुल मिलाकर स्थानीय स्तर पर छापकर बाज़ार में उतरने वाले इस अवैध लॉटरी की कहानी के पीछे बड़े बड़े सफेदपोशों के हाथ को नकारा किसी क़ीमत पर नहीं जा सकता।
पुलिस ने इस मामले में लोगों को चिन्हित कर आगे और करवाई की बात कही है। आगे सिर्फ़ परिणाम का इंतजार लोगों को रहेगा।
बिना कोई टेक्स चुकाए किये जाने वाले इस अवैध लॉटरी ने कितने ही दिनों से गरीबों की जेब पर डाका डाला है। ये लॉटरी बेचने वाले एक ओर मालामाल हो रहे हैं, तो दूसरी ओर इस बुरी आदत के शिकार इसे खरीदने वाले और फ़कीरी के फाँके में डूबते जा रहे हैं।

अवैध लॉटरी पर पुलिस की कारवाई ने रंग उड़ा दिये हैं सफेदपोश माफियाओं के

पाकुड़ नगर थाने की पुलिस ने एटीम लॉटरी की एक बड़ी खेप के साथ दो लोगों को हिरासत में लेकर बड़े घर भेज दिया। ऐसे पुलिस की ये बड़ी कारवाई सराहनीय और चौकाने वाली है।
क्योंकि बड़े पैमाने पर ये एटीम लॉटरी का खेल बहुत दिनों से चल रहा था, लेकिन इतने बड़े पैमाने एटीम लॉटरी कभी जप्त नहीं किया गया था।
अब स्वाभाविक रूप से सवाल पाकुड़ या संथालपरगना से बाहर के पाठकों के मन में उठेगा कि ये लॉटरी होता क्या है!
वास्तव में ये लॉटरी स्थानीय तौर पर छापा जाता है और इसे कोई व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह अपने एक सिम्बल के साथ छपवाता है, तथा तगड़े कमीशन पर बेरोजगार युवाओं को बेचने के लिए उपलब्ध कराता है। प्रतिदिन अलग-अलग माफियाओं का लाखों की संख्या में ये एटीएम लॉटरी बाज़ार में खपा दिया जाता है।इसे ढोना( केरी ) करना भी आसान है। जैसे आपने 10 लॉटरी खरीदा तो एक लॉटरी पर ही 1गुना 10 अंकित होता है, यानी आप 10 लॉटरी के धारक हो गये।
खैर एक बात और कि इसके खेल भी प्रतिदिन नहीं होता , और तो और सिक्किम या केरला लॉटरी के जिस नम्बर पर इनाम लगता है, उसी के आधार पर महीने में एक बार इनाम दिया जाता है।
अब ज़रुरी नहीं , कि किसी आम आदमी या खरीददार को ही इनाम मिले , बल्कि ये इनाम किसी आश्रयदाता मतलब प्रोटेक्शन देने वाले को भी मिल सकता है। अच्छा ये बताना तो भूल ही गया कि जिसे एटीएम लॉटरी लग गई, उसे पैसे भी इनामवाले मिल ही जाये। हाँ अगर कोई विशेष व्यक्ति है, तो उसे कम बेसी कर इनाम के पैसे मिल जाते हैं।
इस अवैध लॉटरी के खेल में बहुत खेल है भैया।
अच्छा इस अवैध लॉटरी के धंधे ने अपना पैर पसारा कैसे ? तो ये बताना लाज़मी है कि पहले भी यहाँ लॉटरी का कारोबार था। स्वाभाविक रूप से लोगों को इसकी लत लगी हुई थी। कई लोग इनाम मार भी जाते थे। इस लॉटरी ने पाकुड़ को चार करोड़ इनाम मारने वाले भी दिये हैं, लेकिन वो लॉटरी दूसरे राज्यों के वैध लोटरियाँ होतीं थीं। आम जनता में गरीबी और रोजगार की कमी, उसपर लॉटरी द्वारा जुआ खेलने की बुरी लत तथा बर्बाद होते परिवारों को देख राज्य सरकार ने लॉटरी पर प्रतिबंध लगा दिया। फिर भी दूसरे राज्यों के वैध लोटरियाँ यहाँ आतीं रहीं, जो यहाँ आते ही अवैध हो जातीं थीं। इसमें बेचनेवाले पकड़ाते रहे।
इसी को मौका बना कर धुरंधरों ने स्थानीय एटीएम लॉटरी को जन्म दिया, और जुआ के एडिक्टेड गरीब इसके शिकार बनते रहे।
एटीएम लॉटरी के कारोबारियों ने अब तक यहाँ करोड़ों बनाये , और इसे बनाने में जमकर सुविधाशुल्क भी बाँटे। हुआ तो यहाँ तक कि ये अवैध कारोबारी इतने अपनी भरती जेब से इतने रसूखदार बन गए कि दूसरे राज्यों की वैध लोटरियाँ भी बाजार से दबाबों के कारण गयाब होतीं रहीं और एटीम लॉटरी के अवैध बाज़ार ने बाज़ार पर कब्ज़ा कर लिया।
ये अवेध धंधा खादी, ख़ाकी और कलम का भी पोषण करने लगी , और ये सभी मिलकर एटीम लॉटरी का।
लेकिन वो कहते हैं न कि कानून के हाथ बहुत मजबूत और लम्बे होते हैं। व्यवस्था बदली , शासन-प्रशासन में टीम बदली, परिस्थितियों ने भी रंग बदल लिया, और रंग दिख गया।
होली के दस्तख़त के बीच , पुलिस की करवाई ने कितनों के रंग उड़ा दिए।
पुलिस इस मामले की रंग से जाँच कर दे , कितने ही रंग चढ़ेंगे और कितने ही सफेदपोशों के रंग उड़ेंगे कहना मुश्किल है। फ़िल्वक तो पुलिस ने एक जनोपयोगी बड़ी कामयाबी हासिल की है।

चेम्बर के सचिव संजीव कुमार खत्री ने माँगी पटना और दिल्ली के लिए सीधी रेल सेवा

देश के सबसे पुराने लूप रेल लाइनों में से एक जिसपर पाकुड़ स्टेशन स्थित है, रेल द्वारा हमेशा से उपेक्षित रहा है। हावड़ा रेल डिवीजन का कमाऊ स्टेशन रहने के बाद भी आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि यहाँ से गुजरने वाली कई ट्रेनों का ठहराव तक पाकुड़ जिला मुख्यालय के स्टेशन पर नहीं है। इस लूप लाइन पर स्थित झारखंड के पाकुड़ जिला मुख्यालय सिंघारसी एयरफोर्स स्टेशन के लिए भी एकमात्र महत्वपूर्ण स्टेशन है, बावजूद इसके यहाँ से सीधे पटना और दिल्ली के लिए कोई रेल सेवा नहीं रहना दुखद और आश्चर्यजनक है।
लगभग एक शताब्दी से पत्थर और पैसेंजर ढो कर पाकुड़ ने रेलवे को खरबों दीये हैं, अब तो एक दशक से यहाँ का कोयला भी रेल को कमाई नहीं मोटी कमाई दे रहा है।लेकिन रेल ने सुविधाओं के नाम पर काफ़ी कंजूसी बरती है।
यहाँ के चेम्बर ऑफ कॉमर्स स्थानीय अधिकारी ने X पर PMO से पटना और दिल्ली के लिए एक सीधी ट्रेन की माँग रखी है।यहाँ के विभिन्न संगठनों, संस्थाओँ और पार्टियों ने समय समय पर इस माँग को रेल के समर्थ ऑथरिटी के सामने रखी है, लेकिन उसे हमेशा अनसुनी रखा गया।
यहाँ के लोग लगातार उपेक्षित रहने के कारण किसी भी सरकार के रेल मंत्रालय से कभी सन्तुष्ट नहीं रहे। जनप्रतिनिधियों की उदासीनता भी शायद इसके लिए जिम्मेदार रहा हो।
अब तो यहाँ लोग यह कहने लगे हैं कि पाकुड़ – गोड्डा रेल लाइन बनने के बाद ही शायद पाकुड़ के लोगों को पटना और दिल्ली के लिए सीधी रेल सेवा मिल सके , ऐसा क्यूँ ये संथालपरगना के लोग बेहतर समझ रहे होंगे।
खैर जो भी हो पाकुड़ रेल के द्वारा हमेशा से उपेक्षित रहा है, जो चिंता का विषय है लेकिन रेल मंत्रालय के लिए जरूर चिंतन का भी।

ज़िंदगी पर भारी पड़ते साल के कुछ महीने खुलकर रोने भी नहीं देतीं

एक व्यंग का प्रयास जो हक़ीक़त है।

फरवरी मार्च और अप्रैल का महीना सरकार के विभाग और जिम्मेदारियां इतनी बेरहम हो जाती हैं कि हमें जीने नही देती।
इन्ही दिनों बच्चों की परीक्षाएं
टेक्स भरने के लिए नोटिशें
नगरपालिका ,बिजली विभाग , बैंक जैसे सभी बेरहमों के प्रेम पत्र और न जाने क्या क्या !
हे भगवान फिर बच्चों का रिएडमिशन, किताबें ड्रेस
सच में जीने पर भी सोचना पड़ जाता है
लेकिन सरकारें इन विषयों पर क्यों नही सोचती ?
मैं ये नही कहता कि सब माफ़ कर दो लेकिन सोचो यार
किश्तों में मारो
ये हक़ है आपको कि आप चाहे जो करें
मगर क़त्ल भी करें तो जरा प्यार से
खाश कर हम जैसे लोगों के लिए बड़ी समस्या है सरकार
क्योंकि ठहरे मुफ़सील पत्रकार और स्वाभिमानी बनने के ढोंग में विज्ञापन भी नही उठा पाते, अख़बार और टी भी वालों के कोर्ट पेंट , ए सी , बंगला, ठाट बाट सब हमारे खून पर ही चलते हैं । किसी तरह पमरिया , बन्दी चारण के तर्ज़ पर अपना जीवन बसर करते हैं , ताकि हमारे मालिकों को खून मिल सके।
और हाँ मेरा पारिवारिक बैकग्राउंड भी ऐसा है, कि अगर कहीं नॉकरी ….पार्ट या फूल टाइम जॉब भी मांगने जाते हैं, तो कोई विस्वास ही नही करता … हंस कर ठहाकों के साथ प्रेम से चाय वाय पिलाते हुए ये कह कर टाल जाते हैं कि आपको और नोकरी मज़ाक मत कीजिये साहब , देश विदेश ……………..
( आप क्या और किस वर्तमान परिस्थितियों में हैं से किसी का परिचय नही होता , आपके पिता क्या थे , आपके भाई बन्धु , सम्बंधियों पर ही लोग आपका मूल्यांकन करते हैं। ये कोई नहीं समझता कि कोई कौन क्या है, क्या था से सिर्फ़ और सिर्फ़ आपकी एक पहचान भर बनती है , आपके आर्थिक मूल्यांकन से इसका कोई सम्बंध नही होता। )
खैर टाल जाते हैं ,अब उनको कैसे समझाये कि हमको तो यही हमी होने ने मारा है
कभी बेबशी ने मारा
कभी बेकशी ने मारा
किस किस का नाम लूँ
मुझे हर किसी में मारा
बस सरकार और हालात से विनम्र प्रार्थना है कि हम जैसे बीच में लटके न अमीर न गरीब बन सके लोगों को जरा किश्तों में मारें तो बड़ी कृपा होगी।
मिट्टी की दीवारों के पीछे सौंधी सुगंध मिलती है, लेकिन हमारे जैसे बेरोजगार कलमकारों के बपौती पक्के मकानों की दीवारों की आड़ में एक ख़ामोश सिसकियाँ दबी पड़ी मिलेंगी , जो चाह कर भी आवाज़ नहीं करती।

मेरे एक पुलिस वाले कवि मित्र की कुछ पन्तियाँ ऐसे में मुझे याद आ जाती है —
” आसमान की ऊँचाइयों की क्या बात करें हम,
पेट की गहराइयों में खो गया है आदमी ”
हम जैसे आदमियों के बारे में सरकार कुछ आदमियत दिखाते हुए ईएमआई तय कर दे हमारी समस्याओं का।
क्योंकि थोक में एकमुश्त समस्याएं रस्सी और ज़हर की पुड़िया ढूँढने को बेबस करती है , लेकिन मंगहाई की डायन ऐसी बेदर्दी दिखाती है कि …..
खैर क्या किश्तों में हम नही दुहे या मारे जा सकते ?
नहीं बस यूँ बस पूछ रहा था , ऐसे ज़हर और रस्सी का पैसा बचाकर आज मैंनें एक किश्त चुका दी है जिम्मेदारी का 😊

अवैध पत्थर परिवहन के जंगल मे हैं कई सक्रिय “टार्ज़न”।

एक फ़िल्म आई थी , “टार्ज़न” आप सभी ने देखी होंगी। टार्ज़न आदमी का बच्चा होने के बाद भी जंगल मे जानवरों के साथ पला बढ़ा। शेर से भी टार्ज़न नहीं डरता था। उसके साथ भी वह लुका-छिपी खेल जाता था।
झारखंड के साहेबगंज जिला के पत्थर और परिवहन के जंगल मे भी ऐसा ही अनेको टार्ज़न (ये किसी का नाम नही, एक बलशाली जंगली आदमी की परिकल्पना का द्योतक है) है , जो ED जैसे शेर से भी नहीं डरता , और एक ही परिवहन चलान पर कई बार पत्थर ढो डालता है। ऐसे में सरकारी राजस्व को चुना लगाया जाता है। पाकुड़ जिले में भी चेक पोष्ट पर गड़बड़ियाँ होतीं हैं, लेकिन जिले के मुखिया के कड़े रुख़ के कारण इसपर थोड़ा अंकुश है, लेकिन पाकुड़ सीमा क्षेत्र से उसपार साहेबगंज की ओर झाँकने पर चलान को चलता कर एक ही चलान पर कई ट्रिप पत्थर ढोने वाले सक्रिय दिखते हैं।
Puja singhal मामले के बाद सबसे ज़्यादा छापे और करवाई ED ने साहेबगंज में ही की , बावजूद इसके पाकुड़ से लगे सीमाई इलाके के साहेबगंज जिले के चेकनाकों पर चालानों की इंट्री पहली खेप में नहीं की जाती , दूसरे , तीसरे या फिर चौथे ट्रिप में इंट्री की जाती है। इसकी गवाही चालानों के कटने और इंट्री के समय के मिलान देता है।
पत्थर के अवैध परिवहन पर इस पेज को जब मैं लिख रहा था तो साहेबगंज के कोटालपोखर थाना में 39 लोगों के खिलाफ एक मामला दर्ज कराया गया। इस विषय में बताया गया कि एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर अधिकारियों और पुलिस की मुभमेंट की ट्रेसिंग शेयर कर अवैध परिवहन किया जाता था। पुलिस ने इस मामले को खंगालना शुरू कर दिया है।
लेकिन सोचने की बात है कि अवैध पत्थर परिवहन के जंगलों के टार्जनों के हिम्मत का अंदाजा लगाया जा सकता है कि, जिस मामले पर ED जैसी केंद्रीय एजेंसी जाँच कर रही है, उस अवैध पर ऐसे लोग कैसे इतनी हिम्मत कर पाते हैं !
ऐसे लोगों के लिए सरकार और प्रशासन बदनाम होते हैं। जबकि कानूनन सभी व्यवस्था है कि लोग ईमानदारी से अपना व्यापार कानून के दायरे में कर सकें , लेकिन पैसों की भूख अगर किसी मे बेसुमार पैदा हो जाये और वो कुछ भी करने के लिए तैयार रहे तो कोई क्या करे ?
फ़िल्वक पूरा इलाका हतप्रभ है कि सबकुछ छोड़कर जाने के लिए आख़िर और और-और की भूख इन अवैध के “टार्जनों” को कहाँ तक ले जाएगा !

समय , समाज और परिस्थियाँ बदलने के साथ कुछ बोझ बनते परम्पराओं पर होनी चाहिए समीक्षा

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समाज में परम्पराएं अपनी एक अलग महत्व रखतीं हैं। लेकिन कुछ परम्पराएं बोझ बन पीढ़ियों को बोझिल कर जातीं हैं, जिसे निभा पाना संभव नहीं हो पाता, और कई तरह की समस्याएं खड़ी होतीं हैं। यहाँ तक कि कई रिश्तों में दूरियाँ और खटास पैदा कर देतीं हैं। मैं अभी अपनी आपबीती बताना चाहूँगा। हो सकता है आप मेरी बातों से सहमत न हों , लेकिन हाशिये पर खड़े होकर अगर साक्षी भाव से देखेंगे और समझने का प्रयास करेंगे तो शायद सहमत भी हो जाएं।
झारखंड के पाकुड़ में एक परंपरा रही है कि अगर आपके यहाँ शादी ब्याह जैसा कोई आयोजन है , तो आप आमंत्रण पत्र पहले ही क्यूँ न बाँट आएं , आयोजन के दिन मौखिक आमंत्रण पुनः भिजवाना होगा। ऐसा नहीं करने पर पहले के आमंत्रण पत्र निष्क्रिय हो जाते हैं और आमंत्रित परिवार का कोई भी सदस्य आपके यहाँ आयोजन में नहीं आएगा। हाँलाकि ये परम्परा यहाँ के मूल निवासियों पर लागू होता है। कालांतर में बाहर से आकर बसे परिवारों के लिए आमंत्रण पत्र ही काफ़ी होता है।
पाकुड़ पहले एक छोटा सा क़स्बाई नगर था , या आप यूँ कह लें गाँव था। समाज में सहयोगी युवाओं की भी कमी नहीं थी , तथा परिवार भी संयुक्त एवं पर्याप्त पुरुषों की संख्या वाले होते थे। नतीजन आमंत्रण पत्र के बाद भी आयोजन वाले दिन मेन पावर के कारण मौखिक आमंत्रण भेजवाने में परेशानी नहीं होती थी ।
लेकिन अब वो छोटा सा पाकुड़ बड़ा सा जिला मुख्यालय हो गया है। संयुक्त परिवार भी अब पहले जैसे नहीं रह गए। समाज के युवाओं में बिभिन्न प्रकार के भटकाव उनके सहयोगी स्वभाव को भी निगल चुका है।
ऐसे में मैंनें स्वयं अहसासा कि ये परम्परा अब एक बोझ सरीखा हो गया है।
पिछले वर्ष मेरी बेटी की शादी में हुआ यूँ कि मेरे एक अभिन्न मित्र जो मेरे वक़्त बेवक़्त खड़ा रहता था, (और मैं भी अपनी ओर से ऐसा ही प्रयास करता था,) के घर स्वयं मेरी पत्नी ने आमंत्रण पत्र पहुँचा कर ये आग्रह किया कि इस आमंत्रण पत्र को ही महत्व दें। विवाह के दिन कोई मौखिक कहने न आ पाए , तो आज ही मैं मौखिक भी आपके परिवार को आमंत्रित कर रही हूँ।
मेरा मित्र हर दिन मेरे घर आकर विवाह की तैयारियों को देखता और कमी बेसी पर सलाह मशवरा भी देता रहता।
विवाह के दिन मेरे बेटे और भाई से भूल हो गई और उनके घर मौखिक आमंत्रण नहीं पड़ा। इधर मैं बेटी का बाप होने के नाते , और गोधूलि लग्न के कारण 4 बजे ही बारात दरवाजे पर आ जाने से आमंत्रण के विषय में पूछताछ नहीं कर सका, और मेरे मित्र सहित उसके परिवार से कोई नहीं आया।
मेरे मित्र से मैं काफ़ी नाराज़ हुआ। कई मौकों पर परिस्थितिवश इस वर्ष भर में मैंनें उससे सार्वजनिक रूप से दुर्व्यवहार भी किया। वर्ष बीतने के बाद मुझे सभी बातों का पता चला।
लेकिन एक परंपरा के कारण जीवंत रिश्ता दम तोड़ चुका था।
ऐसी परम्पराओं से अब हमें तौबा करनी चाहिए।
एक गरीब बेटी का बाप विवाह वाले दिन व्यवस्थाओं में एक रिश्ता जोड़ने की कयावद में रहे कि किसी दशकों के रिश्ते को परम्परा की भेंट चढ़ते देखे !
एक बार ऐसी परम्पराओं पर समाज समीक्षा करे , ये निवेदन होगा। कृपया एक बार सोचिए न , जिंदगी और ज़िम्मेदारियाँ बहुत कठिन हो गया है भाई इन दिनों🙏🏼

करतूतें कराती सम्मानित और शर्मसार भी

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अमिताभ बच्चन की एक फ़िल्म थी “शराबी”। उसमें कुछ गुंडों की पिटाई के बाद एक डायलॉग अमिताभ कहते थे “एक आप लोग हैं और एक वे थे। आप सबने इस फ़िल्म को देखा ही होगा।
इन दिनों टीभी ऑन करते ही मुझे वो डायलॉग याद आ जाता है। बंगाल के सन्देशखाली के शाहजहां की चर्चा आम है । उनकी करतूतों ने न सिर्फ बंगाल बल्कि पूरे देश को शर्मसार किया है। ड्राइवर और सब्जी बेचने वाले शाहजहां राजनीति में आने के बाद न सिर्फ इस क़दर अमीर बन गया कि ED के रडार पर आ गया, बल्कि उनके करतूतों के पन्ने उलटने लगे , और की ऐसी कहानियां सामने आने लगीं कि सभी चैनलों पर बहस जारी है। लोग छी छी कर रहे हैं।
इधर घनघोर गरीबी से जूझते अपने मेहनत से सफ़ल हुए एक व्यवसायी इसपार झारखंड में प्रतिदिन 300 गरीबों को खाना खिला रहे हैं। मोटरसाइकिल रखने की क्षमता रखनेवाले सवारों में जागरूकता लाने के लिए हेलमेट बाँट रहे हैं। कड़कती ठंड में कम्बल , टोपी बाँटने के साथ फरियादियों की सहायता में हर वक़्त हाज़िर उन्होंने कोरोना और उसके बाद भी हजारों परिवार को राशन उपलब्ध कराकर भुखमरी के कगार से बाहर निकाला।
अपने समाजसेवी कर्मो के कारण देश विदेश में सम्मानित वो समाज के लिए एक आदर्श और सम्मान बन गये हैं।
गरीबी की गलियों से निकले वो अपनी बदली स्थिति को सेवा की दिशा देकर पूरे समाज बिरादरी और देश राज्य के लिए सम्मान का विषय बन गये हैं , वही सन्देशखाली के शाहजहां ने पूरे देश को शर्मसार करने का काम किया है।
हाँलाकि दोनों की तुलना किसी भी कीमत पर नहीं की जा सकती, ( इसलिए मैं उनका नाम नहीं लिख रहा ) लेकिन वो कहते हैं कि पद, प्रतिष्ठा , पैसा रिवॉल्वर और शराब सभी को हजम नहीँ होता।
ठीक उसी तरह गरीबी को मात देकर वो जहाँ मसीहा सावित हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सन्देशखाली के साथ पूरे देश को शाहजहां ने सिसकियों में धकेल दिया है।
इससे ये सावित हो जाता है कि ईश्वर ने अगर आपको एक ईंट भी दिया है तो आपके कंस्ट्रक्टिव विचार दीवाल खड़ी करने में सक्षम होगा , और डिस्ट्रक्शन के विचार किसी के सर फोड़ने को ईंट प्रेरित करेगा।

पाकुड़ के अपनेपन का ताना बाना कहीं खो गया है, भागते दौड़ते शहर की सड़कों की भीड़ में

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अपनी संस्कृति से पहले पहचाने जाने वाले लोग पाकुड़ शहर में अब सड़क पार करना टफ टास्क है, जबकि यादों के झरोखे के उसपार झाँकने पर ये नज़ारा इतना मुश्किल नहीं था। लोग और गाड़ियाँ सब सलीक़े से चलते थे।

अब आवारा लहराते मोटरसाइकिल और रफ़्तार को चुनौती देती गाड़ियाँ किसी अनहोनी को हमेशा मौन निमंत्रण दे रहा है। खेती खलिहानी के लिए बने ट्रैक्टरों की तो अब पूछिये ही मत। बीते कुछ वर्षों के रिकॉर्ड में झाँकिये तो दुर्घटनाओं की फेहरिस्त मिलेगी। जबकि 2-3 दशक पहले कोई दुर्घटना महीनों चर्चा का विषय बनता था।

पाकुड़ की सड़कों पर आया ये बदलाव गलियों मुहल्लों में भी एक उच्चस्तरीय संस्कृति के बदलाव की कहानी कहता नज़र आता है। जात पात और सम्प्रदा य से इतर पूरा पाकुड़ एक बड़ा सा आँगन और एक परिवार सा लगता था। उनदिनों स्कूल जाने के दौरान महल्ले के किसी भी आँगन में रसोई बन गई होती तो पूरे महल्ले का कोई बच्चा बिना पेटभर खाए विद्यालय नहीं जाता था।

मेरे बचपन की गलियों में ये यादें एकदम ताज़ी हो उठतीं हैं, जब विद्यालय जाने के समय गर्म चावल, आलू का चोखा और दाल के साथ एक चम्मच देशी घी सामने परोसा हुआ मिल जाता था। अपने घर में उस समय चूल्हा जला हो या नहीं, लेकिन पता नहीं कौन सा सूचनातंत्र काम करता था, कि पड़ोस के आँगन से स्कूली बच्चों के लिए परोसी हुई थाली हाजिरी बजा जाती। हम भी ऐसी थालियां पड़ोस के आँगन में जाते अक्सर देखते थे।

किसी के यहाँ वक़्त बेवक़्त कोई मेहमान आ जाये तो दाल चावल, रोटी के मूल वेतन के साथ बोनस के रूप में मुहल्ले भर की रसोइयों की सौंधी सुगंध लिए सब्जियों की गिनती मुश्किल हो जातीं थीं।

वो कहते हैं न, कि पहले पड़ोसी परिवार सा महसूस होता था, आज तो परिवार कब पड़ोसी बन जाय कहना मुश्किल है। मैंनें दोनों चीज़ें अहसासा है।

एक क़स्बाई नगर पाकुड़ बंगाल की संस्कृति को जीता हुआ अविभाजित बिहार और अब झारखंड के नाम को जीता है। इस शहर की संस्कृति नज़रुल और रविंद्र संगीत को गुनगुनाता अपनी समृद्ध संस्कृति को जीता था। पूरा नगर परिवार सा था, लेकिन आज के पाकुड़ में हम अपने ही शहर में बेगाने से नज़र आते हैं।

अभी भी यहाँ की पीढ़ियाँ जो उस वक़्त को किसी न किसी तरह छू कर गुजरा है, अपनेपन के उसी महक को अहसासता है, लेकिन भागते दौड़ते शहर की सड़कों पर भीड़ में वो अपनापन अब कहीं खो सा गया है।