पश्चिम बंगाल में पहले चरण के मतदान ने ये तो स्पष्ट शंदेश दे दिया कि मतों का ध्रुवीकरण हुआ है। हमेशा की तरह मतदान का प्रतिशत काफी संतोषजनक रहा , बल्कि अपेक्षाकृत बढ़े प्रतिशतता ने बंगाल के मतदाताओं की जागरूकता का भी परिचय दिया।
लेकिन इनसब बातों के बाद , जो सबसे बड़ी बात यह रही कि इसबार वो मतदाता भी मतदान केंद्र पर पहुँच कर मतदान करने में सफल रहे, जिन्हें या तो घर पर ही रोक दिया जाता था , या फिर उन्हें मतदान केंद्र से इसलिए बेरंग लौटना पड़ता था कि उनका मत पहले ही कोई और दे जाता था। लम्बी लाइनों ने गवाही दी कि लोग बिना भय के मतदान करने गये।
ऐसे ही एक परिवार से मुलाकात में यह पता चला कि उन्हें कई बार ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा था , लेकिन इसबार वे बेफिक्र मतदान कर पाए हैं।
बढ़े मतदान के प्रतिशत से दोनों मुख्य पार्टियाँ अपनी अपनी जीत के दावे कर रही हैं , पर मजहबी तौर पर ध्रुवीकरण स्पष्ट नज़र आई।
इसके कई कारण हैं। पहला तो यह है कि सभी पार्टियों के नेताओं के बयानों ने मतदाताओं को प्रभावित किया , दूसरा कारण सोशल मीडिया ने डाला। खाशकर हुमायु कबीर के स्टिंग ने उनकी नई नवेली पार्टी को काफी नुकसान पहुँचाया , और ओबैसी साहब से गठबंधन टूटने पर भी मतदाताओं के विश्वास को हिलाकर रख दिया। अल्पसंख्यक समुदाय को तृणमूल के अलावे कोई विकल्प नज़र नहीं आ रहा था। भाजपा को रोकने के लिए ममता से असंतुष्ट लोगों को भी तृणमूल पर ही अपना विश्वास दिखाना पड़ा। कोंग्रेस के समर्थक मतदाता भी राहुल गांधी के एक वाइरल बयान पर अंतिम समय में तृणमूल का रुख कर गये। जबकि सन्देशखाली की घटना ने बहुसंख्यक समुदाय को भाजपा का रुख करने को मजबूर किया। ममता बनर्जी के समर्थक रहे बहुसंख्यक भी मुर्शिदाबाद दंगे की ख़ौफ़नाक यादों और ममता सरकार की करवाई करने में उदासीन बेरुखी को भुलाये नहीं भूल पा रहे थे। मालदा के कालियाचक की घटना रहीसही कसर पूरी कर दी। धुलियान , बहरमपुर , मालदा , दुर्गापुर हर जगह मतदाताओं का मुख्य रूप से दो ही पार्टियों के प्रति ध्रुवीकरण अहसासा गया।
पिछले हर स्तर के कई चुनावों को जमीनी स्तर पर देखने से यह बात मंथन के बाद निकल कर आती है कि ध्रुवीकरण तृणमूल और भाजपा के पक्ष में गया है। बाबरी मस्जिद की नींव या हैदराबाद के चारमीनार का कोई प्रभाव मतदाताओं की बातों से नही दिखी।
इस पहले चरण में एक ओर तृणमूल और दूसरी ओर भाजपा के बीच ध्रुवीकरण सिमट कर रह गया।
आश्चर्य इस बात की है कि मुसलमान हित की बात करनेवाले बंगाल के ओबैसी की उपाधि पानेवाले हुमायु कबीर और स्वयं ओबैसी साहब मतदाताओं के मन से मतदान के समय उतरे-बिसरे दिखे। यहाँ तक कि हुमायु साहब को अपने प्रभाव वाले क्षेत्र में भी उग्र विरोध का सामना करना पड़ा।
जो भी हो भाजपा इस बार एक और ऊँची छलाँग लगाने को आतुर है , भाजपा के विकल्प के रूप में दीदी में ही दम मतदान में दिखा, हँलांकि आगामी 4 तारीख़ को ही सब पता चलेगा कि ऊँट किस करवट बैठेगा , लेकिन बंगाल के ओबैसी हुमायु कबीर और ओबैसी साहब का मंचीय रुतवा मतगणना के दिन जमानत बचाने की जद्दोजहद में शायद दिखे।
चुनावी हिंसा के लिए बदनाम हो गये बंगाल में इतनी बड़ी संख्या में केंद्रीय सुरक्षा बलों की प्रतिनियुक्ति के बाद भी , छिटपुट ही सही , लेकिन हिंसा ने बता दिया कि अतीत में चुनावी हिंसा का साम्राज्य कैसा रहा होगा। एक भी जान की हानि न होना और चुनाव के दौरान हत्याओं की अतीत की कहानी बहुत कुछ कहती सी है।
अब राज्य के जिस इलाकों में मतदान होना है , वो ममता के तृणमूल का गढ़ है। भाजपा के लिए यहीं सबसे बड़ी परीक्षा है। क्योंकि अतीत बताता है कि इन इलाकों में तृणमूल के मतदाताओं के अलावा कोई और मतदान केंद्र तक पहुँच ही नहीं पाता है। क्लब और केरम क्लबों की तकरीबन 3250 कमिटियाँ यहाँ तृणमूल के पक्ष में संगठित होकर कर उग्र और नीतिगत तरीके से काम करती है। वे पहले से ही रैलियों में जाने वाले परिवारों पर नज़र रखते हैं। मतदान के दिन भाजपा या किसी दूसरी पार्टी की रैली में जानेवाले परिवारों को मतदान केंद्रों तक पहुंचने नहीं देते और उनका मत भी डाल दिया जाता रहा है। इसबार तीन लाख से अधिक केंद्रीय बलों की उपस्थिति इनको कहाँ तक क्या कर लेने देंगे ये वक़्त बताएगा।
लेकिन चुनाव के बाद जैसे तृणमूल विरोधियों से निपटने की परंपरा रही है , ठीक उसी तरह इसबार केंद्रीय बल चुनाव शांतिपूर्ण कराने, तथा विना किसी चुनावी हिंसा और हत्या न हो का ध्यान रखते हुए , मतदान के बाद उनसे चुनचुन कर निपट रहे हैं। केरम कमिटियों के जासूसों की तरह सेना के जासूस भी इस पर नजर रखे हुए हैं। दूसरी तरफ मतदाता इस बार केंद्रीय बलों की सुरक्षा की छाँव में मुखर हो गये हैं।
चुनाव आयोग ने बंगाल चुनाव को बिना हिंसा के शांतिपूर्ण तथा निष्पक्ष करने की जैसे कसम खा रखी है। वहाँ मतदाताओं को डराने धमकाने के सभी तकनिकों के गहन अध्ययन के बाद चुनाव आयोग ने भी अपनी वैसी ही विसात बिछा रखी है कि उपद्रवियों से चुनाव के पहले , चुनाव के दिन और मतदान के बाद कैसे निपटने हैं , इसकी पूरी तैयारी कर रखी है।
बाँकी पार्टियों की असली परीक्षा दूसरे दौर के मतदान के दौरान ही होना है। चार मई को सब खुलासा हो जाएगा। सम्मपूर्ण भारत बंगाल चुनाव और उसके नतीजे की ओर व्यग्रता से देख रहा है।
नोट:– मैंने किसी का नाम या स्थान और मुहल्ला चुनाव के बाद होने वाली हिंसा को ध्यान में रखते हुए नहीं लिखा , और बातचीत करने वाले परिवारों-लोगों से ये वादा भी था।