Thursday, November 5, 2026
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पत्रकारों के Illegal mining पर लिखते ही उठते थे सवाल के साथ उंगलियाँ

Puja singhal प्रकरण ने सावित कर दिया Illegal mining

Puja singhl मामले के उजागर होने के साथ ही ये तो तय हो गया अवैध उत्खनन (Illegal mining) का बोलबाला रहा है। मुख्यमंत्री झारखंड ने अवैध उत्खनन पर नकेल कसने के निर्देश अधिकारियों को दिया। DGP ने पुलिस को निर्देश दिया। इधर पूरे सन्थाल परगना में अधिकारी अवैध उत्खनन रोकने पर रेस हैं। ED ने लगातार बड़ी रकम जप्त किये। इतना सब कुछ अवैध उत्खनन को सावित करने के लिए शायद काफ़ी होगा।

Illegal mining
Mines

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इससे पहले जब कभी हम पत्रकार अवैध खनन की बात लिखते थे। तो चाँदी के जूते से जूतियाये गये समर्थ सरकारी अमलें सिरे से मामले को झुठलाते थे। सुबह होते ही चरने निकलने वाले नेताओं को मानो मिर्ची लग जाती थी। सम्बंधित थाने के दलालों को दलदली लगतीं थीं। थानेदारों की नज़रें तिरछी हो जातीं। बसूली करनेवाले हथकंडे सिपाही हम निरीह शब्दों के शिल्पकारों के मुँह सिल देने को आतुर दिखते थे।

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अब नही आती निःशब्दता, ओ आरोप लगानेवालों ?

अब ED के शिकंजे में शेर-शेरनियों के आते ही गीदड़ सब हु-हुयाने लगे हैं। भूल जाते हैं लोग बड़ी जल्दी सबकुछ। ये जो लोग अभी खूब बोलते , हिनियाते तथा ढेंचू-ढेंचू करते चोंक चौराहों पर दिख रहें हैं। वे सभी हमारे लिखते ही आरोप लगाते नहीं थकते थे कि पत्रकारों को हिस्सा नहीं मिला होगा। हमें सच लिखने पर शक के दायरे में रखनेवालों आज किस मुँह से Puja तथा Illegal mining and illegal transportation पर सवाल उठा रहे हो ?

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अब ज़रा उन्हें कोई कह तो दे कि

सभी मुझी से कहते हैं, रख नज़र नीची अपनी,

कोई उनसे नहीं कहता , निकलो न यूँ अयाँ होकर।

आदरणीय सर आप पत्रकारों से किये वादे निभाये होते, तो Puja Singhal मामले में जाँच में ED से आगे रहते पर हाय रे छूट गया रेलवे और मौका

बड़े साहब क्या हुआ तेरा वादा ? ED ने तो छान दिया सब घोटाला | उपायुक्त ने पत्रकारों से किये वादे निभाये होते, तो सरकार कम होती बदनाम

कुछ दिनों पहले पाकुड़ उपायुक्त ने प्रेसवार्ता कर पत्रकारों से कहा था। रेलवे से पत्थर ढुलाई की गड़बड़ी पर वे ख़ुद जाँच करेंगे। लेकिन ……..खैर अब Puja Singhal मामले में ED जाँच तथा DMO से पूछताछ के बाद अब लोग पूछने लगे हैं—- क्या हुआ तेरा वादा ? ये सवाल आम जनता के ओठों पर है।

चर्चा भी गली-नुक्कड़ों पर है। लोग सवाल वहाँ जाकर नहीं पूछ सकते।  जहाँ पूछना चाहिए, पूछे भी तो कैसे ? यहाँ तो शेर के गले में घण्टी बाँधने का सवाल है।  इसलिए लोग हम बीच वाले से ही पूछ लेते हैं और हम बगली तो झाँक नहीं सकते।

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इसलिए पन्नों पर ही आम जनता की आवाज और सवाल उठा देते है। पत्थर तो रेलवे से भेजा गया पर चालान नदारत थे। हुआ ये क्या पिछले दिनों रेलवे से पत्थर संप्रेषण में खुलासा हुई गड़बड़ी पर शनिवार को उपायुक्त पाकुड़ ने स्वयं इस मामले की जाँच करने की बात पत्रकारों से वार्ता के दौरान कही। ये बातें स्वयं में एक उदाहरण पेश करता नज़र आया। साधारणतया ऐसे मामलों पर एक औपचारिकता जाँच समिति बना कर कर दी जाती है। लेकिन पहली बार उपायुक्त ने ऐसे मामले में स्वयं जाँच करने की बात कह सबको चोंका दिया।

उधर हड़कम्प कहाँ कहाँ मचा होगा, इसे बयाँ करना बेवज़ह सावित होगा। हँलांकि उपायुक्त के उस शनिवार को किये पत्रकार सम्मेलन और कही बातों के कई दर्जन शनिवार बीत चुके हैं। हँलांकि तीन कम्पनी को 7-8 करोड़ की नोटिस खनन पदाधिकारी ने भेजा है। ये स्वयं बड़ी गड़बड़ी का द्योतक है।

इधर इन तीनों में से एक कम्पनी के प्रोपराइटर बिहार के एक ब्लैक लिस्टेड निर्माण कम्पनी के मालिक से सम्बन्धित है। उनका बड़बोलापन ऐसा है कि मुख्यमंत्रियों के साथ उनकी बैठकी है और नाना पाटेकर की “अब तक 56” फ़िल्म की तरह उनका रेकॉर्ड “अब तक 22” का है। अब भगवान जाने वो क्या हैं, ऐसी पहेलियों को पत्रकार जगत सुन कर दूसरे कान से निकाल देते हैं। दूसरी एक कम्पनी में अब प्रोपराइटर के रहते एक महिला का सक्रिय दखल है और कई बार वो महिला एक बड़ी राजनैतिक हस्ती की मेहमान बन कर सप्ताह दो सप्ताह सरकारी गेस्ट हाउस में भुगतनी मेहमान भी रह चुकीं हैं।

अब माननीय उपायुक्त के स्वयं जाँच में ये मामला आ गया है, तो कई नई कलई खुलने का अंदेशा है। हड़कम्प और चिंता की लकीरें खनन विभाग की दीवारों पर भी दिख रहीं हैं। अगर उपायुक्त स्वयं जाँच करते तो राजनैतिक संरक्षण प्राप्त और कई कम्पनी इसकी ज़द में आती, तो क्या इसलिए वो सिर्फ़ आई वॉस सम्मेलन था। सवाल लाज़मी है। लेकिन हुआ कुछ नहीं और ED आ धमकी।

क्या है रॉयल्टी का मामला

आपके प्यारे अख़बार ने आपके सामने इस मामले को परोसा भी था। वास्तव पाकुड़ रेलवे पत्थर लोडिंग साइडिंग पर कितनी विसंगतियाँ हैं, इस पर चर्चा हरि कथा अनन्ता को भी पीछे छोड़ती नज़र आती है। अपर और लोअर रेलवे साइडिंग में दर्जनों प्लॉट किसी न किसी कारण वस वर्षों से कागज़ों पर खाली है, लेकिन उस पर भंडारण और लोडिंग बजायफ़्ता जारी है, क्यूँ है ? कैसे है ? आदि विषयों पर आगे की रिपोर्टिंग में बताएँगे, लेकिन जब बिना माइनिंग चलान के पत्थर भेजने की चर्चा जब चली तो अनायास दिनांक 26/7/21 का एक नोटिश सामने आया। नोटिश नम्बर सी ओ एम/प्लाट/पीकेआर/न्यू अलॉटमेंट/19 डीआरएम (कमर्शियल) इश्टर्न रेलवे हावड़ा इनवाईट्स (एक्सप्रेशन ऑफ ईंटरेष्ट ) 59 एन ओ एस वेकेंट प्लॉटस पाकुड़ क्वायरी साइडिंग के अनुसार दो पारामीटर पर आमंत्रित किए गए, पर कहते हैं कि इस नोटिस को सार्वजनिक होने से रोक दिया गया।

क्यूँ ये रेलवे अधिकारी ही बता सकते हैं। जबकि नोटिस में साफ निर्देश है, कि इसे अखबारों में प्रकाशित करना है। इससे सम्बंधित एक पदाधिकारी जे एन साहा से जब इस संवाददाता ने बात की तो अपनी टूटी फूटी हिंदी में जो बताया उसका अर्थ ये था, कि ये उनका डिपार्टमेंट नहीं है, लेकिन जब संवाददाता ने बंगला में बोल कर माहौल को दोस्ताना बना दिया। तो माननीय साहा ने बताया कि ये नोटिस उनके पास आया था और कोलकाता में इसे प्रकाशित कराया गया होगा। उन्होनें ये भी बताया कि प्लॉट एलॉटमेंट का दूसरा डिपार्टमेंट है। मामला जो भी हो, कहीं न कहीं मामले में गड़बड़ी की बू आ रही है। जानकारी के अनुसार रेलवे के खाली लोडिंग साइड्स पर माफियाओं का राज है। अगर पाकुड़ उपायुक्त ने अपना वादा निभाया होता तो पाकुड़ और रेलवे कुछ कम ही बदनाम होता।        

Puja Singhal के साथ उद्योपतियों, Railway कर्मियों तथा अन्य सम्बंधित अधिकारियों के तिजोरियों को ED को खंगालना होगा

puja singhal के साथ Railway कर्मचारियों की तिजोरियाँ भी ED की होगी पैनी नज़र

Puja Singhal और  Illegal mining की कहानी पाकुड़ के लिए ED के छापेमारियों का मोहताज़ नहीं रहा है। तकरीबन 125 साल पुराना सन्थाल परगना के पत्थर खनन का सफ़र दाग़दार रहा है। घपले घोटाले तथा राजस्व चोरी मानो यहाँ जन्मशिद्ध अधिकार बन गया हो। कितनी शिकायतें सरकारी फाइलों में धूल फाँक रही, गिनना मुश्किल है। दशकों से रेल और उद्योगकर्मी की मिलीभगत अजगर की तरह लील रहा सरकारी राजस्व।

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कुछ दिनों पहले बिहार भेजे गए पत्थरों का चालान यानी झारखंड सरकार की रॉयल्टी जमा न करने की ख़बरों के छपने के बाद इस घपले में शामिल रेलवे कर्मी और पत्थर उद्योग के घपलासुरों का सुर बिगड़ गया था। खनन विभाग ने भी इससे जुड़े कागज़ात रेल से माँगा था, लेकिन अब तक उसे ढूँढने की औपचारिकताएं हो रही हैं। लेकिन हलक सूखा हुआ नज़र आ रहा है।

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ये तो बस पाकुड़ के मालपहाड़ी रेलवे साइडिंग के एक या दो कम्पनी का मामला भर है, लेकिन अगर ठीक से पाकुड़, बड़हरवा, मिर्जाचौकी, बाकूडी जैसे रेलवे सिडिंगों को खंगाला जाय तो अब तक रेलवे और माइनिंग विभाग को खरबों का चुना लग चुका है।   एक तरह का चालान ही किया जाता है पेश  रेल साइडिंग से रेलवे और प्राइवेट लोगों का भी पत्थर जाता है। खदानों से जो पत्थर चेली के रूप में निकलता है, वो क्रशरों में पीस कर विभिन्न आकार (साइज) का बनता है। चेली जो खदान के लीज एरिया से निकलकर क्रशर तक पहुँचता है, उसका न्यूनतम रॉयल्टी चलान होता है। फिर विभिन्न साइज़ के पत्थरों का अलग-अलग रॉयल्टी होता है, जो कभी कभी कई गुना ज्यादा होता है। खदानों से निकले चेलियों के रिटर्न पर ही, विभिन्न साइजों के पत्थरों का चालान ऑन लाइन निकालने की औपचारिकतायें पूर्ण करने पर निकालने की अनुमति दी जाती है। स्वाभाविक रूप से विभिन्न आकारों के पत्थरों का दाम भी चेली से ऊँचा होता है, तो रॉयल्टी भी ज़्यादा होगा और सेलटैक्स या अब जीएसटी-एसजीएसटी ज़्यादा होगा, लेकिन विभिन्न साइजों के पत्थरों को चेली चलान पर ही रेलवे में लोडकर चलता कर दिया जाता। जिसे रेलवे कर्मी नो साइज़ लिख कर चलता कर देते हैं। रेलवे को तो मशीन मेड के साथ हैंडमेड मिला कर भी चुना या चपत लगाया जाता है।

रेल कर्मचारियों की भी है मिलीभगत

नतीजा खनन विभाग के साथ जीएसटी-एसजीएसटी सभी को चपत झेलनी पड़ती है और उद्योपतियों के साथ रेलकर्मी मलाई चाट जाते हैं। अभी बिना चलान के जो बिहार पत्थर भेजा गया है। उसका आरआर माँगने के बाद भी खनन विभाग को रेल कर्मचारियों द्वारा उपलब्ध न कराया जाना और ढूँढने का बहाना बनाया जाना, उसी नो साइज़ के चेली चालानों की व्यवस्था का प्रयास जान पड़ता है। बंगलादेश गया पत्थर भी है इसी संदेह के घेरे में सन्थाल परगना से बंगलादेश गए पत्थरों का भी यही हाल है। इनकी रॉयल्टी भी संदेह की सीमा में है। Pooja और ऐसे ही पूजनीय लोगों की गुप्त तिजोरियाँ कहीं…. ! एक बात तो तय है कि रेलवे के लोग भी इसमें जरूर संलिप्त रहे हैं। अब देखना ये है, कि होता क्या है ? अजगर की तरह कुंडली मारे रेल और उद्योगकर्मी दंडित होते हैं, या सब ढाक के तीन पात सावित होता है।    

Puja Singhal, ED जाँच, भागलपुर तथा सोने (gold) के साथ इसका कनेक्शन

कई रंगों में रंगने लगा है Puja पर ED जाँच | Illegal mining के तार सोने में भी चमकने लगा | Puja Singhal पर ED का कसता शिकंजा | Illegal mining के मामले में जाँच कई रंगों में रंगने लगा है ।

प्रदेशों के चक्कर लगाता Illegal mining के जाँच भागलपुर तक पहुँच गई है। सूत्र बताते हैं कि ED के अधिकारी भागलपुर के कुछ सोना व्यवसाईयों को अपने रडार पर ले चुकी है। सन्थाल परगना के कोई भगत , निरंजन तथा दीवान की कुंडली खंगालें में लगी है। ये तीनों तथाकथित मिनी मुख्यमंत्री के निर्देश पर चलते हैं।

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Puja singhl ने किए हैं कई जगह निवेश

पूजा के तिषल्म में नगद के साथ 150 करोड़ के निवेश के कागज़ात भी मिले हैं। इधर भागलपुर, कोलकाता और साहेबगंज के सोने की चमक ने भी पूजा को ललचाया।
बताया जा रहा है, करीब 25 करोड़ के सोने में खपाया गया है। साहेबगंज और भागलपुर के सोने का कनेक्शन सीमापार से रहा है। ऐसे में काले हीरे पत्थर को भेजकर सोना मंगाया गया हो तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। इसमें बीच मे सोने के सौदागरों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। ED है कि अपनी जाँच की ख़ुदाई में सब निकाल ही लेगा। शायद इसीलिए ED ने CBI जाँच की मांग रखी है। सीमापार से जुगाड़ NIA को भी जाँच में ले आये तो आश्चर्य नहीं। Puja पर अभी जाँच के कई फूल चढ़ेंगे और करवाई की आरती की ताप बहुतों को लगेगी।

मुख्यमंत्री और प्रशासन हुआ रेस

सन्थाल परगना के थानेदारों तथा सिविल पदाधिकारियों ने अंधाधुंध छापेमारियों को अंजाम देना शुरु कर दिया है। मुख्यमंत्री के निर्देश पर चल रही है छापेमारी। अवैध खनन माफियाओं में ख़ौफ़ तो है। लेकिन पदाधिकारियों और सरकार के विरुद्ध छोभ भी कम नहीं। जब ED नहीं आई थी, तो मिलकर मलाई खा रहे थे, अब छापेमारी क्यूँ ? ये सवाल अधिकारियों को सामने से पूछे जा रहे हैं। सवाल स्वाभाविक भी है। अधिकारियों को नॉकरी बचानी है, तथा मुख्यमंत्री को सरकार।

पूर्व रेंजर अनिल कुमार सिंह

अनिल कुमार सिंह की क्या थी गलती ???

तत्कालीन रेंजर अनिल कुमार सिंह ने कोयला और पत्थर माफियाओं पर नकेल कसा था। पूरे राज्य से आये कोयला माफियाओं के साथ पत्थर माफिया भी नकेल में आये। कई मामले अनिल कुमार ने दर्ज किये। की गई कार्रवाइयों में मुख्यमंत्री के भाई के पार्टनर भी आ गए। बस जबरन रिटायरमेंट दे कर उन्हें घर बिठा दिया। अनिल कुमार सिंह बिके नही तो नप गए। इस सरकार में समझौता कर न बिकनेवाले अधिकारियों के लिए उदाहरण बन गए। किनको नौकरी प्यारी नहीं, सभी अनिल कुमार सिंह तो होते नहीं !

झारखंड में बहुत मुश्किल है ईमानदारी

झारखंड में एक ईमानदार अधिकारी कैसे काम करता है ये दिलीप झा या अनिल ही बता सकते हैं। पूरे कार्यकाल में क्या क्या नहीं भोगा प्रमोटी आई ए एस दिलीप कुमार झा ने। पाकुड़ में पूजा भी दिलीप झा से उलझ चुकी है। यही पाकुड़ है, कि ईमानदारी खा गया अनिल कुमार की नौकरी। इन सब के पीछे राजनीति तथा नेताओं का घटियापन रहा जिम्मेदार। लेकिन अब ED जाँच खोल रहा पोल ।

झारखंड में पूजाओं की कमी नहीं, पाकुड़ में भी एक पूजा (puja) कर रही संरक्षित अवैध खनन (Illegal mining)

खनन सचिव पूजा सिंघल (Puja singhal) मामले में कुछ जिला खनन पदाधिकारी भी ई डी (ED) द्वारा तलब किये गए हैं। सूत्रों से कई तरह की सूचनाएं मिल रही है, लेकिन पर्दा पूरी तरह हटने में अभी कुछ समय लगेगा। लेकिन तलब किये गए जिला खनन पदाधिकारियों में पाकुड़ का छूट जाना आश्चर्य पैदा करता है। आज बात करेंगे लेडी डॉन के Illegal mining की।

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Illegal mining

खैर ई डी तो ई डी है, शायद देर से ही सही……. आइए हम एक और खनन सचिव न सही लेकिन खनन करनेवाले एक प्रोपराइटर के ज़बरदस्ती बने सचिव की बात करते हैं। ये अपने पिता के नाम से पाकुड़ में अवैध खनन (Illegal mining) करनेवाली की कहानी पूजा से कम नहीं है। जब ये तथाकथित लेडी खनन डॉन पाकुड़ आई। तो अपने पिता के आलीशान घर को छोड़ अपनी पहुँच और रुतवा दिखाने के लिए एक सत्ताधारी पार्टी के बड़े नेता की मेहमान स्वरूपा बन कर सर्किट हाउस में रुकी। समय के साथ ये सिलसिला चलता रहा। वहीं से उसने अपनी धौंस हर स्तर पर उस समय दिखाया था। जब मीडिया की शनिदृष्टि इन पर पड़ी तो सर्किट हाउस की पिंड इनसे छूटी।

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खैर तमाम तरह की सरकारी समितियों और एक्शन फोर्स के बाद भी इस लेडी डॉन ने अपने पिता तक पर पाकुड़ आने पर रोक लगाकर उनके खनन बिजनेस पर अपनी पकड़ बना ली। अवैध कारोवार की पराकाष्ठा को भी अपनी छलांगों से लांघ गई। पाकुड़ में पत्थर खनन की एक कम्पनी एन डी इंटरप्राइजेज (ND Enterprises), जिसके प्रोपराइटर (proprietor) नारायण दास साधवानी हैं। हाँलाकि इनके लीज की तय समय सीमा समाप्त हो चुकी है। वावजूद इसके सदर प्रखंड और अंचल के मोजा- राजबाँध, प्लॉट नम्बर- 625 , 626 , 628 , 629 , 630 , 631 और 651 को मिला कर रकवा 3.05  एकड़ पर लीज था। इन प्लॉट नम्बरों पर सुरसा की तरह मुँह बाए खदान आज भी अवैध तरीके से हुए खनन की गवाही देता मौजूद है।

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इस खदान की नापी और रॉयल्टी रिटर्न की सभी फ़ाइलें लीज के बाद भी अवैध की कहानियाँ बयाँ करेंगी। इन प्लॉटों पर जब सारी मलाई ख़त्म हो गई तो अब लेडी डॉन (lady don) प्लॉट नम्बर (plot number) 627 , 964 , 652 पर बिना लीज  के एक सहयोगी के साथ खनन कर रही है। सहयोगी कौन है, इनकी लम्बी कहानी दूसरे आलेख में डालूँगा, लेकिन सवाल उठता है कि टास्क फोर्स की छापेमारियों में भी ये अधिकारियों को दिखा क्यों नही। आश्चर्य है !   अब पाकुड़ में ई डी से ये सवाल पूछे जा रहे हैं, तुम कितने पूजा पकड़ोगे, हर खनन घपले से पूजा निकलेगी। सवाल ये भी उठ रहे हैं, अवैध पत्थर खनन के बना-रस पाकुड़ अभी तक कैसे छूटा हुआ है ! विष्मय है🤔

अगले अंक में पढ़े – Lady Don का सहयोगी कौन है, किसके बल और सह पर बनी लेडी डॉन

पत्रकारिता पर स्वयं पत्रकार और समाज को चिंतन करना चाहिए…..

हर पीड़ा , तमाम उपलब्धि , सरकारी काम , सूचनाएं ,व्यवसायियों की समस्या , समाज की आकांक्षाऐं सबको अपनी बात कहने के लिए पत्रकारिता की बैसाखी लेनी ही पड़ती है , फ़िर भी बेचारा पत्रकार…….
क्या नेताओं , अफसरों , व्यवसायियों और समर्थवान लोगों ने चाय की चुस्कियों के साथ जो कह दिया , उसे लिखना , अखबारों में जगह देना मात्र पत्रकारिता है ?
उनका क्या होगा जो अपनी दर्द की पीडाओं को अपने ही अंदर घोंट जाते हैं !
क्या उनकी पीड़ाओं को कुरेद कर बाहर निकलना और उसे समाधान तक पहुँचाना पत्रकारिता का धर्म नहीं ?
कभी उस आनन्द से भी पुलकित होने का अहसास कर के देखें , जब आपकी पत्रकारिता किसी की आँखों की आँसू को पोछ और चुरा जाए, तथा उन्ही आंखों में प्रसन्नता और सन्तोष की चमक दिख जाए।
हाँ हम पत्रकार करते हैं ऐसा । हम अपने दर्द को अपने ही अंदर दूर तलक दफ़न कर ढूंढते है , दूसरे की आँखों के सकूँ।
लेकिन जिसे देखो बस पत्रकार को कोसने में लगे है।
हम लोगों की दर्द को सामने लाते हैं, तो लोगों को दर्द पहुँचाने वाले धनपशु हमारी औकात नापने निकल लेते हैं। धमकियाँ ,आक्षेप और न जाने क्या क्या लिए निकल पड़ते हैं घर से , धमकियों और आक्षेप के ढेलों से घायल हमारा वजूद लहूलुहान हो फ़िर भी पीड़ितों के घावों को मलहम लगाते और सहलाते हैं।
और फिर सबों के साथ हम पर पत्थर उछालने वालों की भी अंतिम आस के रूप में हमी सहयोग में उभर कर सामने खड़े होते हैं।
क्यूँ होता है ऐसा , क्यूँ ये धनपशु पत्रकारों को अपनी जागीर समझते हैं। हम मानते हैं , हमारे बीच भी सड़ांध है , लेकिन सभी तो दुर्गंधित नही हैं, कुछ अपनी महक भी महकते हैं मित्र , उन्हें पहचानो वरना देश , राज्य और समाज सब पर इसका असर दिखेगा।
दुख और बढ़ जाता है, जब सरकारी अमलों से भी सौतेलापन मिलता है।
माननीय न्यायालय को बताना पड़ता है, उन उच्च शिक्षित सरकारी अमलों को कि पत्रकार भी अपनी मौलिक अधिकार के साथ जीने के अधिकारी हैं।

ये बात और है, कि आज के समय मे पत्रकारिता के क्षेत्र में अयोग्य लोगों ने अपनी उपस्थिति और डिजिटल तथाकथित पत्रकारिता ने इस पेशे को बदनाम जरूर किया है, लेकिन क्या सभी को एक ही तराजू पर तोलना तर्क और न्याय संगत होगा ? ये यक्ष प्रश्न है।

Mother’s Day पर हम अपनी उजड़ती ,बंजर होती धरती माँ पर भी तो सोचें !

Mother’s day पर आपने कभी पृथ्वी पर कोई लेख आलेख नहीं पढ़ा, सुना या देखा होगा। ऐसे हर साल 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस मनाया जाता है। स्वाभाविक रूप से पृथ्वी दिवस पर्यावरण को केंद्र में रख कर ही मनाया जाता है।लेकिन Mothers day पर पृथ्वी पर बात करना भारतीय मान्यताओं के अनुसार कभी बेतुका नहीं लगता।

कम से कम मुझे तो बिलकुल नहीं।
बीते कल मैंनें आनेवाले कल 8 मई को Mothers day को ध्यान में रखकर एक आलेख लिखा था । मेरी एक पाठक बहन ने मुझे धरती माता पर भी लिखने को कहा।
उस बहना के मत के अनुसार धरती भी माँ है, और हमारी करतूतें इस माँ को बंजर बनानेवाली हैं।
बात मुझे घर कर गई, इस बात से मुझे सबसे पहले आज से तकरीबन 8 वर्ष पहले मेरी बेटी वेदिका जो उस समय 6 वर्ष की रही होगी, ने अहसास कराया था।
पाठक (मेरा आलेख पड़नेवाली) बहन की बात सुन मुझे 8 वर्ष पुरानी वो दुपहरिया याद आ गई। मैं सुबह का निकला दोपहर में घर आया था। मेरी 6-7 वर्ष की बेटी वेदिका बरामदे की जमीन पर बैठ कर पेंसिल से कुछ उकेर रही थी। मैंनें पूछा क्या हो रहा है बेटा ?  उसने अपनी उकेरी हुई तश्वीर का वो पन्ना मेरे सामने रख दिया।
उसने मुझसे कहा कि आज मदर्स डे है बाबा इसलिए मैं धरती माँ की चित्र बना रही हूँ।
उस समय मुझे ये इल्म हुआ कि सचमुच आज मदर्स डे है और धरती को हम भारतीय माँ ही तो मानते हैं। मैंनें वेदिका से पूछा तुम्हारे उकेरे चित्र में ये पृथ्वी रोती सी दिख रही है।
वेदिका ने मुझे कहा कि जंगल कट रहे हैं , हमारे आसपास पहाड़ों को लोग खाये जा रहे हैं। उसने मुझसे बड़े निर्दोष से अंदाज़ में शिक़ायत करते हुए कहा , बाबा आप ही तो ख़बरों में लिखते हो, हम सभी को बताते हो। टी भी पर भी तो बाबा दिखाया जाता है, आप भी तो दिखाते हो।
ज्यादा गर्मी , ज्यादा ठंड और बारिश के दिनों में कम बारिश होने पर आप ही तो पर्यावरण असंतुलन की बातें समझाते हो।
वेदिका ने उस मदर्स डे पर रोती हुई पृथ्वी का चित्र दिखाकर जो तर्क दिए , उसने मुझे चिंतन को मजबूर कर दिया। नन्ही वेदिका ने मुझे वेद के ज्ञान का आभास कराया। उसे भी ये ज्ञान वेद की तरह श्रुति से ही प्राप्त हुआ था। कुछ मुझसे कुछ टी भी समाचारों से उजड़ती पृथ्वी और पर्यावरण के बदलाव का ज्ञान नन्ही वेदिका को आया था।
वेदिका अपने प्राप्य श्रुति ज्ञान से रोती हुई पृथ्वी का चित्र बना कर एक संदेश देने में सफ़ल तो दिख रही थी, लेकिन हमलोग तथाकथित सभ्य समाज क्या ऐसा करने में सफल हो रहे हैं।
सेमिनारों और सम्मेलनों में हम माइक की गर्दन पकड़ कर बहुत कुछ बोल-कह जाते हैं। एक शोर मचा जाते हैं , अपने ज्ञान और जानकारियों का लोहा मनवाकर श्रोताओं की तालियाँ बटोर लाते हैं, लेकिन क्या हम कभी कोई ऐसा शंदेश छोड़ पाते हैं, कि उसकी ख़ामोशी से भी एक ऐसी चित्कार निकले , जो छोड़ जाए अमिट छाप।
वेदिका , हाँ नन्हीं वेदिका के रोती पृथ्वी की उस ख़ामोश चित्र की चित्कार ने मुझपर ऐसा छाप छोड़ा है, कि मेरे ब्लॉग के पाठक बहन ने जब धरती माँ पर कुछ लिखने को कहा, तो वेदिका का वेद मुझे बरबस याद आ गया।
सचमुच धरती हमारी माँ है , हम पृथ्वी दिवस जरूर मनाएं, लेकिन मदर्स डे पर हम धरती माँ के आँचल को हरा-भरा रखने की कसम उठाएं।

Mother’s Day खो गयी आँचल की ठंडी छाँव, सुरक्षा का अहसास और सौंधी सुगन्ध

खो गई है Mothers day की एकदिनी आयोजन में इसकी महिमा। माँ (mother) शब्द मात्र नही, एक जीवन पद्धति की पूरी शोधपत्र है। अब माशूका की ज़ुल्फों में वो महक़ कहाँ ? जो सौंधी सुगंध माँ की आँचल से मिलती थी “बच्चन”।

भौतिकता की अंधी दौड़ में माँ के आँचल से बिछड़ने की सज़ा पाता है,
अब तो बच्चे शहरों में हर चीज के तपिश भरी लाइन में ही नज़र आता है

Mathers day 8 मई को है। लेकिन बिना माँ के जीवन (life) की कल्पना ही बेमानी है। एक भी दिन बिना माँ के ? इसके जेहन में आने मात्र से पूरा शरीर, रोम रोम सिहर सा उठता है। इन्सान ही नही सभी जीवों की सबसे अच्छी दोस्त उसकी माँ होती है, जिससे वो अपने दिल की बात करता या कहता है। इंसान (human) या कोई भी जीव जब ज़ुबान से कुछ नहीं बोल पाता तो उसके मौन एक्सप्रेशन को भी सिर्फ़ माँ ही समझ सकती है। माँ शब्द ही अपने आप में एक पूरी थेसिष है, एक ऐसी कहानी है, जिसे कही नहीं बल्कि महसूस की जा सकती है।

World Press Freedom Day 2022, प्रेस फ्रीडम डे, प्रेस की स्वतंत्रता को दर्शाता है

माँ पर कुछ लिखना कहना हमेशा नाकाफ़ी रहेगा। शब्द (word) और तमाम अभिव्यक्तियों के माध्यम माँ शब्द के सामने बौने सावित हो जाते हैं। हलाँकि पत्रकारिता (journalism) के जीवन को जी कर कुछ ऐसे मामलों से भी रूबरू हुआ हूँ, जहाँ इस शब्द को दाग़दार होते भी देखा है। लेकिन कुछ उदाहरण इस शब्द की महत्ता पर भारी नही पड़ सकते, पर चिंता और चिंतन की आवश्यकता पर जरूर जोर देने को मजबूर करता है।

मुझे पता है, इन बातों के कारण लोग इस मामले पर इत्तेफ़ाक़ नहीं रखेंगे। लेकिन मेरी पत्रकारिता ने मुझे हमेशा सत्य के लिए विद्रोही स्वभाव का बनाए रखा। मेरी कलम और लेखन भी मेरे विद्रोही स्वभाव से प्रभावित रहा है। लेकिन माँ की महत्ता को मेरा विद्रोही होना भी नकार नही सकता। आप कितने भी बड़े हो जांय, बादलों सी ज़ुल्फों की छाँव आपको जितनी भी शीतलता दे। प्रेमिका की बाहों की जकड़न आपको किसी तरह महसूस हो, पर माँ की गोद मे उसके आँचल की छाँव जो सकून और सुरक्षा का अहसास कराता है, वो किसी गोद और छाँव से अतुलनीय है। ये और बात है, कि भौतिकता की दौड़ ने साड़ियों को वनवास दे दिया और अब तो आँचल कहीं खो सा गया। कुछ सलवार जंफर की ओढ़नियों में भी आँचल की सुगंध मिलती है, पर भौतिकता और नए फ़ैशन ने उन ओढ़नियों को भी लगभग आधुनिक माँओं से से छीन ही लिया।

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माँ शब्द इतना सुंदर है, कि इसके सामने सुंदरता के मामले में कोई भी शब्द पानी माँगता सा लगता है। जब शब्द ही सुंदरता का अहसास कराता है, तो बच्चों के लिए माँ के चेहरे की सुंदरता की कल्पना करना भी असंभव सा दिखता है। लेकिन अब तो इस शब्द पर भी शॉर्टकट ने अतिक्रमण कर लिया है। अब माँओं को भी इस शब्द के शॉर्टकट पर्याय ही सुनने में अच्छा लगता है। माँ की ख़ुशियाँ बच्चों की खुशियों में निहित होती है। किसी भी क़ीमत पर माँ अपने बच्चों को खुश देखना चाहती है। एक पति भी पत्नी को खुश रखने के लिए पहले उनके बच्चों को खुश रखने का प्रयास करता है। हमेशा माँ की खुशी बच्चों की खुशी में निहित दिखती है। पर यहाँ भी किट्टी पार्टी ने अतिक्रमण कर रखा है।
माँ घर में कहाँ क्या है , किसे क्या पसंद है से परिचित रहा करतीं है। ये भारतीय परंपरा के अनुसार ही नही पूरे विश्व में माएँ ऐसी ही होती रहीं हैं।

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लेकिन अतिक्रमण ने यहाँ भी अपनी इंट्री मार रखी है। अब तो आया इन बातों के लिए जिम्मेवार हैं। मानवीय मूल्यों (human values) के गिरते स्तर ने तमाम रिश्तों को कमज़ोर कर दिया है। यहाँ इन रिश्तों को भी देशी और पौराणिक जीवनशैली के टॉनिक की आवश्यकता है। ये विद्रोही लेख किसे कितना पसंद आएगा, पता नहीं लेकिन जैसे कुछ उदाहरण आजकल विदेशों से नॉकरी छोड़ कर आये युवाओं को खेती करते देख ऐसा लगता है, कि हमें अपनी ज़मीन पर वापस लौटना होगा।

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ठीक उसी तरह हमें अपनी पारिवारिक संस्कृति की जमीन पर लौटना आवश्यक है। वरना हम बस नकल में अकल खोते रहेंगे और बिना माँ के जीवन की कल्पना न करने वाले बच्चे और आधुनिक माएँ , इस माँ शब्द और इससे जुड़ी भावनाओं, सच्चाइयों से इतर एक दिन Mothers day मना कर रह लिया करेंगें।

World Press Freedom Day 2022, प्रेस फ्रीडम डे, प्रेस की स्वतंत्रता को दर्शाता है

World Press Freedom Day 2022 विश्‍व प्रेस स्‍वतंत्रता दिवस पर अगर हम भारत में प्रेस की स्वतंत्रता पर विवेचना करें, तो इसके कई पहलुओं में झाँकना होगा।
विश्व की प्रतिष्ठित संस्था के आंकड़ों को यदि हम खंगालें तो प्रेस की स्वतंत्रता के नाम पर भारत 180 देशों में काफ़ी पिछड़ा हुआ है।

अन्य पड़ोसी देशों की तुलना में भी भारत की स्थिति संतोषजनक आंकड़ों में नहीं दिखती। लेकिन अगर जमीनी स्तर पर हम इसे अपने अनुभव के अनुसार टटोलते हैं, तो प्रेस की स्वतंत्रता के हिसाब से व्यक्तिगत मुझे ऐसा नही दिखता। स्वतंत्र प्रेस पर कोई स्पेसिफिक कानून तो नही है। लेकिन भारत मे कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड़ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। ऐसे में यहाँ जो स्पष्ट तौर पर दिखता है, कि कोई भी व्यक्ति लाइव टीभी पर बैठकर सरकार, सरकारी अमलों तथा यहाँ तक कि सरकार के मुखिया की भी आलोचना कर आरोप लगाते हैं। कोई भी चैनल या अखबार एवं मीडिया माध्यम उसे बेख़ौफ़ परोस भी रहे हैं। ऐसे में प्रेस की स्वतंत्रता पर उठने वाले सवाल एवं आंकड़ों पर मुझे आपत्ति दिखती है।

कानूनन धाराओं एवं उप धाराओं के अनुसार भारत में अभिव्यक्ति की बिना किसी अवरोध के पूर्ण रूप से स्वतंत्रता कम से कम मुझे दिखती है। अगर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर झूठ परोसा जाय तो अगर उस पर किसी भी स्तर पर आपत्ति दर्ज होती है, तो इसकी निंदा नहीं होनी चाहिए। हाँ भारत मे पत्रकारिता, राजनीति की तरह ही विभिन्न रूपों और पहलुओं से स्वार्थजनित हो गईं है। ऐसे में राजनैतिक प्रभाव में अगर पत्रकारिता के स्तर के पतन की बात कही जाय तो अतिश्योक्ति नही होगी। इसके लिए पत्रकार के साथ मीडिया हाउस तथा पत्रकारिता के बाजारीकरण मुख्य रूप से उत्तरदायी है। इस पर विचार और बहस की जरूरत है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पत्रकारिता की होड़ में अनुपयुक्त लोगों का इसमें विभिन्न रूपों से जुड़ जाना काफ़ी दुखद और चिंताजनक है। पत्रकारिता का ग्रामीण इलाकों में पतन से स्वाभाविक रूप से इस पेशे में ख़तरा को पैदा करता है। ऐसे सड़क पर चलते, ड्राईभ करते , घर में बैठे लोगों पर भी काफ़ी ख़तरे होते हैं। जरूरी नहीं कि उन पर हमला हो किसी भी तरह की दुर्घटना का भी अंदेशा बना रहता है। ऐसे में आम नागरिकों की आवाज़ बनने और उठाने वाले पत्रकारों पर भी काफ़ी ख़तरे हैं। अगर उन ख़तरों से आपको परहेज है, तो इस पेशे में मत आएं।

मैंनें कई आलेख और रिपोर्ट पढ़े। जिस तरह भारत में पत्रकारिता एवं इससे जुड़े मामलों का मूल्यांकन किया गया है, उसपर मैं सहमत नहीं हूँ। कानून, मानवीय मूल्यों, देश की सुरक्षा तथा किसी भी तरह के स्वार्थ से विरत रह कर भारत में पत्रकारिता अत्यंत स्वतंत्र तथा सुरक्षित है।

अक्षय तृतीया 2022.. क्या करें. क्या न करें. धन प्राप्ति के लिए करें ये उपाय

तृतीया हर हिन्दू कलेंडर के माह में दो बार क्रमशः शुक्ल और कृष्ण पक्ष में आते हैं। साधारणतया इस तिथि को महिलाएं शिवपूजन तथा अपने पति के लिए उपवास रखती हैं। लेकिनअक्षय तृतीया या वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को कहते हैं। और इस दिन भगवान विष्णु तथा लक्ष्मी की पूजा के साथ विष्णु के छठे अवतार Prshuram की भी पूजा करते हैं।

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माना जाता है कि इस दिन जो भी शुभ कार्य किए जाते हैँ उनका अक्षय फल मिलता है। इस कारण इसे अक्षय तृतीया कहते हैँ। इस दिन बिना कोई पंचांग देखे कोई भी शुभ और मांगलिक काम किया जा सकता है।
अक्षय तृतीया में क्या करें- इस दिन कोई भी शुभ और मांगलिक कार्य किया जा सकता है। जैसे- विवाह, गृह-प्रवेश, जमीन-जायदाद खरीदना, वस्त्र-आभूषण खरीदना आदि। इस दिन सारा दिन शुभ मुहुर्त ही रहता है। इस दिन किए गए जप, तप और दान का कई गुणा अधिक फल मिलता है। इस दिन किया गया जप, तप, हवन और दान अक्षय हो जाता है। इस दिन गंगा स्नान जरूर करे। गंगा स्नान न कर पाने पर, स्नान के पानी मे एक चम्मच गंगाजल मिला दें।यह भी उपलब्ध न हो तो गोक्षरन अर्क एक बूँद मिला कर स्नान करने से सभी पापों से मुक्ति मिलने की मान्यता है।

शुभ-मुहूर्त-:

अक्षय तृतीया 3 मई 2022
अक्षय तृतीया प्रारंभ 3 मई को सुबह 5:18 से
अक्षय तृतीया तिथि समाप्त 4 मई 2022 को सुबह 7:32 बजे तक
अक्षय तृतीया पूजा मुहूर्त सुबह 5:39 बजे से 12:18 तक
सोना खरीदने का शुभ समय – 05:38 से 6:15 तक
रोहिणी नक्षत्र 3 मई सुबह 12:33 से 4 मई को सुबह 3:19 तक

पूजा विधि-:

घर के मंदिर में ईशान कोण में लाल कपड़ा बिछाकर भगवान लक्ष्मीनारायण के की मूर्ति स्थापित कर विधिवत पूजन करें कांसे, सोने , चांदी या मिट्टी के दिये में गाय के घी का दीपक जलाएं,सुगंधित धूप जलाए,गोलोचन से तिलक करें, अक्षत,रोली,सिंदूर,इत्र,अबीर गुलाल आदि 16 चीजों से देवी का षोडशोपचार पूजन करें फिर भगवान लक्ष्मी-नारायण को चावल की खीर का भोग लगाकर भोग को प्रसाद के रुप में बांटे।
अक्षय तृतीया के दिन भगवान लक्ष्मी-नारायण को प्रसन्न करने के लिए इस मंत्र का जाप 108 बार करें मंत्र
जो व्यक्ति दीक्षित हैं, वे लक्ष्मीनारायणायय के बीज मन्त्रों का जप करें। बीज मंत्र सभी जगह नही बताए या लिखे जाने की परंपरा नहीं है। अपने गुरु या पुरोहित से पूछकर जान लें।
या फिर सभी लोग ॐ लक्ष्मीनारायणायय नमः का जप करें।

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पूजन में इन बातों का रखें विशेष ध्यान

मां लक्ष्मी की तस्वीर पर सुहाग का सामान अर्पण करें। घर के मंदिर में मां लक्ष्मी के पास 11 गोमती चक्र रखें। लक्ष्मी जी के चाँदी के चरण पादुका मंदिर में रखे। दक्षिणावर्ती शंख में जल भरकर भगवान विष्णु का अभिषेक करें और साथ ही दूध दही अर्पण करें। इस दिन दान करने के लिए बहुत ही खास दिन माना जाता है। चावलों की खीर बनाकर मां लक्ष्मी को भोग लगाकर प्रसाद में बांटे।

अक्षय तृतीया के दिन करें यह दान

गौ ,भूमि,तिल ,स्वर्ण,घी ,वस्त्र,धान्य गुड़,चांदी नमक,शहद ,मटकी,
खरबूजा एवं कन्या दान

क्या करे , क्या न करें

अक्षय तृतीया को उपवास करें। पूरा दिन न कर पाएं तो एक बार ही खाएं। भोजन में नमक का उपयोग न करें।
सात्विक चिंतन-मनन करें। किसी का बुरा न सोचें, चाहें तथा न करें। ब्रम्हचर्य का पालन करें तथा मिथ्यावादन कदापि न करें।