Wednesday, February 4, 2026
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राज्य के सबसे बड़े साहब बनते ही अपना वादा भूल गए हजूर, ये तो वादाखिलाफी है !😢

 

शिक्षाविद निर्मल मुर्मू की कलम से —-

 

एक बार फिर से युवाओं के सपनें को जोरदार धक्का लगा।
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जब झारखंड के युवाओं ने भरी सदन में झारखंड के लोकप्रिय मुख्यमंत्री माननीय हेमंत सोरेन जी को यह कहते हुए सुना कि हमने 5 लाख सरकारी नौकरी नहीं, रोजगार का वादा किया था और स्थानीय नीति खतियान आधारित कभी नहीं बन सकती हैं। क्योंकि झारखंड के युवाओं ने युवा मुख्यमंत्री को बहुत ही आस भरी निगाहों से देखी थी उनसे ऐसी बातों का कभी उम्मीद ही नहीं किया थे। आज युवाओं के सपनें को फिर से जोरदार धक्का लगा और टूट कर बिखर गई। उन युवाओं का क्या होगा जो दिन रात नौकरी की आस में तैयारी कर रहे हैं, डिग्रियां ले रहे हैं, घर द्वार छोड़कर तैयारी करने में जुटे हुए हैं। और उन अभिभावकों का भी क्या होगा? जो खून पसीना बहा कर है सारे धनराशि अपना बेटा बेटी की पढ़ाई में लगा देते हैं।

वादा तो आपने मुख्यमंत्री जी बहुत सारा किया था। आपने कहा था बेरोजगार युवाओं को 5 हजार और 7 हजार बेरोजगारी भत्ता देंगे, 3 लाख का आवास देंगे, अनुबंध कर्मियों को नियमित करेंगे, 1932 का खतियान लागू करेंगे, समान काम का समान वेतन देंगे, निजी क्षेत्र में 75 प्रतिशत आरक्षण लागू करेंगे आदि जो अभी गिना पाना संभव नहीं है, लेकिन इससे भी युवाओं को कोई फर्क नहीं पड़ता था। उनका सपना को तब धक्का लगा जब आपने कहा हम नौकरी की बात नहीं रोजगार की बात किए हैं और खतियान आधारित स्थानीय नीति और नियोजन नीति नहीं बना सकते।

क्या इसी झारखंड के लिए यहां के युवाओं ने, नौजवानों ने, मां बहनों ने और बुजुर्गों ने अपना खून पसीना बहा कर झारखंड की लड़ाई लड़ी थी? झारखण्ड मिलने के बाद भी अगर यहां के लोगों को रोजगार ना मिले, उनको अपना हक ना मिले, उनका यहां कोई पहचान ना हो, बाहरी लोगों से ठगा महसूस करें, तो ऐसे झारखंड का क्या औचित्य है? सुन लीजिए मुख्यमंत्री जी यहां के लोग अगर झारखंड को लड़कर ले सकते हैं तो आपसे सत्ता छिनने का हिम्मत भी रखते हैं।वह दिन दूर नहीं कि आप खुद को झारखंड का दूसरा राहुल गांधी महसूस करेंगे।

✍️ निर्मल मुर्मू

इस अपने बनाये दोपायों को इंसान बना दो भगवान

आख़िर किसी इंसान की मौत में हम देश, राज्य , जाति , सम्प्रदाय , धर्म आदि पर ध्यान देते हुए या समीक्षा करते हुए अपनी प्रतिक्रिया कैसे दे सकते है ?

हमारी सोच , मानसिकता और चिंतन इतना पंगु, इतना विकलांग कैसे हो सकता है ?
कल तक कश्मीरी पंडितों पर बनी फ़िल्म पर नफ़रतों के आरोप का रुदन करनेवाले रुदालियों को क्या हो गया, कि पश्चिम बंगाल के वीरभूम की घटना पर क्या हो गया कि उनके दहाड़ें मारती रुदन ख़ामोश हैं ?
हँलांकि यहाँ ममता शासन है, और मरने – मारने वाले एक ही समुदाय के हैं, तो क्या वे इंसान नहीं है ?
यह भी सच है, कि दीदी हर जगह और हर किसी को मानसिकता और कर्मों पर स्वयं पहरेदारी नही कर सकती, लेकिन ऐसी विकलांग और हिंसक तथा कानून को धता बतानेवाली मास मानसिकता कहाँ से आईं ?
बहुत दुखद घटना
वहाँ पार्टी वाले नही, हिन्दू मुस्लिम नही इंसानियत को जलाया गया है, इंसानियत की हत्या हुई है।
फ़िर भी तथाकथित इंसानियत पर मगरमच्छी आँसू बहाकर दहाड़ें मार कर रोने वाले चुप्प ?
इतनी ख़ामोशी क्यूँ है भाई !😢
घटना इतनी शर्मनाक और अमानवीय है, कि स्वयं भी आईने के सामने जाने में मुझे व्यक्तिगत रुप से झिझक होती है, हम भी तो उन्हीं मरने- मरनेवालों और गहरी बेशर्म चुप्पी साधनेवाले जैसे ही दिखते हैं 😢
हे भगवान अब तुम्हीं इन दोपायों को जो दिखते सिर्फ़ मनुष्य जैसे हैं, इन्हें मनुष्य बनाओ।
तुम ही सिर्फ़ तुम ही , जिस भी नाम से जाने जाओ , तुम ईश्वर , अल्लाह ,भगवान जो भी हो इन्हें मनुष्य बनाओ हे सर्वशक्तिमान ।
अब नीचे वालों पर विश्वास , कम से कम मेरी तो नही रह गई है।
देखो तुम्हारे बनाये इन्सानों को —😢

पाकुड़ जिले के कोल माइंस, रोज़गार के साधन या प्रताड़ना का अभिशाप , निर्णय करना मुश्किल

पाकुड़ जिला के पचुवाड़ा नॉर्थ ब्लॉक में WBPDCL/BGR कंपनी और दलालों का कला सच, उल्टे रैयतों के उपर ही केस करवा डाला।
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  • लेखक सन्थाल साहित्य और समाज के जानकार के साथ समाजसेवी तथा शिक्षाविद हैं । लेलेखक निर्मल मुर्मू मेरे छोटे भाई भी है। कई अख़बारों में पढ़ा कोल माइंस में बंदी से बड़ा नुकसान हुआ है।सरकार और कम्पनी को हुए नुकसान तो पढ़ लिया, जान लिया।
  1. निर्मल जी के अलग नजरिये को भी जानना ज़रूरी है, और सवाल भी बनता है, कि क्या अपने अधिकार के लिए बहरी सरकार और कम्पनी को नुकसान की चोट पर जगाना गुनाह है ? आगे निर्मल जी को पढ़ें—–

ही में पाकुड़ जिला के आमड़ापाड़ा थाना में बिशुनपुर गांव के तकरीबन 13 महिला/पुरुषों के उपर एक मामला दर्ज किया गया है जिसका कांड संख्या- 20/22 और भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत धारा- 143,149,341,353, एवं 427 लगाया गया है। आप जानते हैं क्यों?
क्योंकि इन लोगों ने अपने गांव में अपनी जल, जंगल,जमीन और भाषा और संस्कृति की रक्षा के लिए अपने ही जमीन पर चोड़का गढ़ा है। प्रशासन और दलालों को इसी बात का रास नहीं आया और केस कर डाला। अरे हम अपनी जमीन पर चोढ़का नहीं गढ़ेंगे तो तुम्हारा बाप का जमीन पर चोड़का गाढ़ेंगे?
मैं बात कर रहा हूं रूर प्रदेश कहे जाने वाले झारखण्ड के सबसे पिछड़े जिला के रूप में सुमार पाकुड़ का। पाकुड़ जिला का आमड़ापाड़ा प्रखंड कोयला के लिए बिख्यात है। यहां पर प्रचुर मात्रा में अच्छे किस्म का कोयला पाये जाते हैैं।इसका उत्खनन का काम बहुत पहले से ही चला आ रहा है। बीच में थोड़ा दिन बंद भी हुआ था क्योंकि कोल माफियाओं ने खादी की सहायता से खुब बड़ा घोटाला का आंजम दिया था। तत्कालीन कंपनियों ने अपना झोला तो खूब भरा, जाते जाते यहां के जान माल के साथ साथ सरकार को भी राजस्व का चूना लगा के गया। वर्तमान समय में यह काम पश्चिम बंगाल पॉवर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (WBPDCL)/ बीजीआर कंपनी कर रही है। यह क्षेत्र शहर से दूर है और शिक्षा के जगत में तो बहुत ही पिछड़ा है। इसी का फायदा उठाकर कंपनी वहां के लोकल नेता, प्रशासन और दलालों की सहायता से रैयतों का जमीन ओने पौने भावों सौदा कर लेती है और कोयला उत्खनन का काम शुरू करती है और फिर शुरू होता है वहां के लोगों की शोषण की कहानी। क्योंकि माफिया और दलालों ने वहां के लोगों के बीच इतना दहशत और खौफ पैदा करके रखा है कि वहां के लोग कंपनी के विरोध में चुं शब्द भी बोलने का हिम्मत नहीं जुटा सकते। उनके जमीन से रोज करोड़ों का कारोबार हो रहा है, लेकिन उनका हालत देखकर आपको रोना आएगा। रोजगार के नाम पर तो ज़ोरदार तमाचा है। हाथ से जमीनें निकल चुकी है, मुआवजा की राशि भी ठीक से नहीं मिली है, विस्थापन के लाभ से भी कोसों दूर है। घर से भी बेदखल हो चुके हैं उनके नाम पर कॉलोनी तो बना है पर वह भी रहिसों के पान गुंठी के बराबर है।
सप्ताह दिन पहले वहां के क्षेत्रीय सांसद श्री विजय हांसदा और क्षेत्र विधायक श्री दिनेश मरांडी और जिला प्रशासन ने वहां के लोगों को गृह प्रवेश कराया लेकिन उनके लिए पशु शेड, धार्मिक स्थल, संस्कृतिक स्थल, खेल मैदान, अच्छा हॉस्पिटल और स्कूल का ख्याल नहीं आया? बस इसी के विरोध में वहां रैयतों ने बिगत 16 मार्च से आंदोलन शुरू कर दिया है और कोयला ढुलाई को ठप पड़ गई है। कोयला ढुलाई ठप होते ही माफिया और दलालों की किरकिरी शुरू हो गई। आंदोलन को एड़ी चोटी लगाकर दबाने की कोशिश किया जा रहा है। पहले प्रशासन और कुछ लोगों ने मिलकर वहां के लोगों को खूब समझाया बुझाया, लेकिन वहां के लोग सामने वालों की चाल और चरित्र को अच्छी तरह से समझ चुके थे इसलिए एक भी ना माने तो उन लोगों ने उल्टे रैयतों के ऊपर ही केस करवा दिया है। और धमकी दिया जा रहा है कि तुम लोग साले जेल में साड़ोगे। कभी खुले आसमान की चांद और सूरज को नहीं देख पाओगे। जिसका उल्लेख मैं ऊपर ही कर चुका हूं।
इन लोगों के ऊपर जबरन कोयला खदानों में खुदाई और ढुलाई बंद करने, सरकारी काम में बाधा पहुंचाने और राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाने सहित कई आरोप लगाया गया है। मैं सरकार से पूछना चाहता हूं इन कि इन लोगों ने क्या गलती किया है? क्या विस्थापन का लाभ मांगना कोई गुनाह है? क्या अपनी जमीन की रक्षा करना गुनाह है? क्या अपनी धार्मिक आस्था प्रकट करना गुनाह है? क्या जल, जंगल और जमीन की रक्षा करना गुनाह है? क्या वह अपनी जमीन पर भी हक नहीं जता सकते? ऐसे भी यह क्षेत्र पांचवी अनुसूची के अंतर्गत आता है और यहां एसपीटी एक्ट जैसा कड़ा कानून पहले से लागू है। इन लोगों ने आदिवासियों का जमीन किस तरह से अधिग्रहण किया? जबकि यहां का जमीन लीज में नहीं दिया जा सकता, दान पत्र में नहीं दिया जा सकता, किसी भी प्रकार से हस्तांतरण करना अवैध होगा, तो फिर इन लोगों से जमीन किस रूप में लिया गया? अगर लिया भी गया तो इन लोगों को पार्टनरशिप में क्यों नहीं रखा गया? इसलिए कि इन लोगों को फटे हाल में रखकर अपना जमीन का टुकड़ा चांद में सुरक्षित किया जा सके।
आज भी कंपनी में बहुत सारे लोग काम कर रहे हैं जो बाहर से आए हैं। क्या उनकी जमीन यहां पर है? क्या उनके बाप दादाओं ने यहां पर जमीनें तैयार किया था? क्या संताल परगना अलग करने के लिए उनके पूर्वजों ने बलिदानी दी थी? फिर उनके लोग यहां पर किस रूप में काम करने आ गए? क्या यहां के लोगों में योग्यता की कमी है? यहां के लोगों के साथ इस तरह का जुल्म क्यों किया जा रहा है?
मैं दाद देना चाहता हूं सोम हेम्ब्रम, सुशांति मराण्डी, दानियाल मुर्मू, रानी हांसदा,मकलू मुर्मू, मोनिका हांसदा,ठाकरान मुर्मू, मालती हेम्ब्रम,सुवल हेम्ब्रम,बोयला टुडू, पानी टुडू,लिलू किस्कू एवं जुनास मरांडी को, जिनके ऊपर में एफआईआर दर्ज किया गया है। आप लोग संघर्ष करिए मातृभूमि की रक्षा के लिए।खुन से सनी इस धरती का इतिहास ही तो बलिदान और संघर्ष का है।हम अपने घर में नहीं लड़ेंगे तो कहां लड़ेंगे? आप पंजाब में तो चोड़का गाड़ने नहीं ना जा रहे हैं, आप हरियाणा में तो चोड़का गाड़ने नहीं ना जा रहे हैं, आप पश्चिम बंगाल में तो चोड़का गाड़ने नहीं ना जा रहे हैं, आप विधायक जी का घर डुमरिया में तो चोड़का गाड़ने नहीं ना जा रहे हैं, आप सांसद महोदय का घर बरहरवा और बिहार में तो चोड़का गाड़ने नहीं ना जा रहे हैं, आप हेमंत जी का घर में भी चोड़का गाड़ने नहीं ना जा रहे हैं, आप बाबूलाल जी के घर में भी चोड़का गाड़ने नहीं जा रहे हैं, तो फिर डर किस बात का? हम अपनी जमीन पर चोड़का नहीं गाड़ेंगे तो कहां गाड़ेंगे? तुम्हारा बाप का जमीन में?
यहां के जनप्रतिनिधि पर भी धिक्कार है जो आधे अधूरे घर का चाबी थमाने तो जाते हैं लेकिन उनकी मूलभूत समास्याएं और आधारभूत संरचना का ख्याल नहीं रखते। दूसरी ओर उसके नाम पर सीएम साहब के यहां फोटो खिंचवाने चले जाते हैं। उसे भी हस्यसपद तो इस बात का मुझे लगता है जो अपने भाषण में कंपनी से वहां के लोगों को मांदर दिलाने की बात करते हैं। नेताजी उन लोगों को भाषा और संस्कृति का पाठ मत पढ़ाइए। उन्हें मालूम है अपनी भाषा और संस्कृति की रक्षा कैसे की जाती है? बात करना है तो अधिकार और रोजगार बात करिए। यह कैसे संभव है कि जख्म भी आप ही दीजिएगा और मरहम भी आप ही लगाएगा।
मैंने उन लोगों से बात किया तो पता चला कि वे लोग बहुत दहशत में है। बहुत सारे लोग चैन से सोते भी नहीं है। डर के साये में जिंदगी जीने को मजबूर हैं। उन लोगों को डर है कहीं नक्सली के नाम पर जिंदा सूट न करवा दे। कहीं अनाप-शनाप केस में फंसाकर जेल में न सड़वा दें। चिंता नहीं करना है मित्रों, डरना भी नहीं है। डटकर सामना करना है। भले ही दुनिया की आंखें बंद हो सकती है,लेकिन जिभ हमेशा खुली रहेगी।
और मैं क्या लिखूं इस पर यह आबोवाक् राज की सरकार है, वरना सरकार बदनाम हो जाएगी। बस आप लोग आगे देखते जाइए किसका हाथ घी में होगा और किसका हाथ की खिचड़ी में होगा। लेकिन अंदर ही अंदर बड़े आंदोलन की आग सुलग रही है कहीं यह आंदोलन सरकार और प्रशासन को राख में ना तब्दील कर दें।

✍️निर्मल मुर्मू।

बेदर्द महीने और कलम के सिपाहियों का ज़ख्म

आसमान को ऊँचाइयों की क्या बात करें हम,

पेट की गहराइयों में खो गया है आदमी

फरवरी मार्च और अप्रैल का महीना सरकार के विभाग और जिम्मेदारियां इतनी बेरहम हो जाती हैं कि हमें जीने नही देती।
इन्ही दिनों बच्चों की परीक्षाएं
टेक्स भरने के लिए नोटिशें
नगरपालिका ,बिजली विभाग , बैंक जैसे सभी बेरहमों के प्रेम पत्र और न जाने क्या क्या !
हे भगवान फिर बच्चों का रिएडमिशन, किताबें ड्रेस
सच में जीने पर भी सोचना पड़ जाता है
लेकिन सरकारें इन विषयों पर क्यों नही सोचती ?
मैं ये नही कहता कि सब माफ़ कर दो लेकिन सोचो यार
किश्तों में मारो
ये हक़ है आपको कि आप चाहे जो करें
मगर क़त्ल भी करें तो जरा प्यार से
खाश कर हम जैसे लोगों के लिए बड़ी समस्या है सरकार
क्योंकि ठहरे मुफ़सील पत्रकार और स्वाभिमानी बनने के ढोंग में विज्ञापन भी नही उठा पाते, अख़बार और टी भी वालों के कोर्ट पेंट , ए सी , बंगला, ठाट बाट सब हमारे खून पर ही चलते हैं । किसी तरह पमरिया , बन्दी चारण के तर्ज़ पर अपना जीवन बसर करते हैं , ताकि हमारे मालिकों को खून मिल सके।
और हाँ मेरा पारिवारिक बैकग्राउंड भी ऐसा है, कि अगर कहीं नॉकरी ….पार्ट या फूल टाइम जॉब भी मांगने जाते हैं, तो कोई विस्वास ही नही करता … हंस कर ठहाकों के साथ प्रेम से चाय वाय पिलाते हुए ये कह कर टाल जाते हैं कि आपको और नोकरी मज़ाक मत कीजिये साहब , देश विदेश ……………..
खैर टाल जाते हैं ,अब उनको कैसे समझाये कि हमको तो यही हमी होने ने मारा है
कभी बेबशी ने मारा
कभी बेकशी ने मारा
किस किस का नाम लूँ
मुझे हर किसी में मारा
बस सरकार और हालात से विनम्र प्रार्थना है कि हम जैसे बीच में लटके न अमीर न गरीब बन सके लोगों को जरा किश्तों में मारें तो बड़ी कृपा होगी।
मेरे जैसे मेरे सभी मित्रों को समर्पित
साथ ही भगवान से यह प्रार्थना भी कि कोई मित्र मेरे जैसा न हों।

सन्थाल परगना की उत्कृष्ट पत्रकारिता स्वर्गीय नन्दलाल परशुराम के नाम पर हर वर्ष होगी पुरस्कृत

संथालपरगना में पत्रकारिता पर अच्छा काम करने वाले पत्रकाराें का हर साल मिलेगा नंदलाल परशुरामका पत्रकारिता पुरस्कार
पल्लव, गोड्‌डा

मानव का यह दस्तुर है कि इंसान की मौत पर कुछ दिन तो लोग रोते हैं। याद करते हैं। बाद में उसे भूल जाते हैं। पर पत्रकार नंदलाल परशुरामका को लोग सदा याद रखे इसके लिए गोड्‌डा के पत्रकारों ने एक पहल किया है। संथालपरगना के छह जिलों में पत्रकारिता पर उत्कृष्ठ काम करने वाले पत्रकारों में से प्रत्येक साल एक का चयन कर उसे नंदलाल परशुरामका पत्रकारिता पुरस्कार से नवाजा जाएगा। इस पुरस्कार में नगद राशि के साथ प्रशस्ति पत्र भी दिया जाएगा। इस अवसर पर पत्रकारिता पर परिचर्चा का भी आयोजन किया जाएगा। जिसमेें संताल के पत्रकारों के साथ- साथ झारखंड और बिहार के पत्रकारों, संपादकों को भी आमंत्रित किया जाएगा। इसके लिए एक ज्यूरी टीम का भी गठन किया जाएगा, जो संथालपरगना में पत्रकारिता कर रहे पत्रकारों के कार्यों का आकलन कर उसकी नाम का सिफारिश पुरस्कार के लिए करेगा।
नंदलाल परशुरामका की मौत के बाद यह सुझाव वरिष्ठ संपादक राघवेंद्र भाई ने दिया था। राघवेंद्र भाई का कहना था कि गोड्‌डा से इसकी शुरूआत की जाय, और यह हर जिले तक पहुंचे। जिससे पत्रकारिता की लौ जलाने वाले तथा अपने जीवन को तिल- तिल दूसरों के लिए जलाने वाले पत्रकार को लोग सदा याद रखे। पत्रकार दूसरे के लिए तो बहुत करते हैं, पर अपने समाज के लिए वे कुछ करने से कतराते हैं। इस बात को कई पत्रकार भाईयों के सामने रखा। पत्रकार तथा विधायक रहे प्रशांत मंडल सहित संतालपरगना के कई पत्रकार भाईयाें ने कहा कि यह निर्णय स्वागत योग्य है। इसका आयोजन हर साल किया जाए। हमलोग भी मदद करने को तैयार हैं।

जय जय पाकुड़ का अवैध खनन, कोई अजय बोल दे, तो गलत ही होगा। सचमुच अजेय ही

न जाने कितनी ज़िंदगियाँ लील चुकी है,पाकुड़ के पत्थर खदान !
ऊपर के चित्रों में जो सुरसा की तरह मुँह बाए धरती के सीने पर ये खाइयों जैसे सैकड़ों फूट गहरे खदान दिख रहे हैं , ये एशिया प्रसिद्ध काले पत्थरों को उगलने वाले खदान हैं।
इन खदानों ने कितने व्यवसायियों और उन्हें सुविधाएं उपलब्ध कराने वालों सरकारी और गैर सरकारी अमलों को कड़ोरों रुपये उगल कर दिए हैं , इसकी कल्पना करना भी असम्भव है।
अगर आप इन खदानों के मालिकों और इनसे जुड़े आज तक पदस्थापित सरकारी अमलों की सम्पत्तियों की बृहत उच्च स्तरीय जाँच या अवलोकन करें , तो देश विदेश में इसके तार जुड़े मिलेंगे।
सैकड़ों उदाहरण है ,  पर ये खदान कितनी ज़िंदगियाँ लील चुकी हैं, अब तक ये अंदाज़ा लगाना तक मुश्किल है। पालतू पशुओं की तो छोड़ दें , इंसानों को भी निगलने में इन पाताल छूती गड्ढों को कोई परहेज़ नही है।
 दुखद और चिंता की बात ये है, कि इसी तरह के एक खदान ने एक मालिक तक को ही लीलने से नही छोड़ा। कुछ दिनों पहले प्रदीप भगत नाम के एक पत्थर व्यवसायी अपने ही खदान में मोटरसाइकिल से फिसल कर गिर गये, और दुखद अंत को प्राप्त हो गये । कितने ही लोग असुरक्षित और खनन नियमों को अँगूठा दिखनेवाले खदानों में अपनी जान गवाँ चुके हैं, लेकिन हर जान की एक क़ीमत लग जाता है यहाँ।
ऊपर खदानों को देखिए न , माइंस और मिनरल एक्ट, तथा खान सुरक्षा के तमाम नियमों को ताख़ पर रख कर खुले खदानों की खुदाई से कितने लोगों को ख़ुदा की ख़ुदाई बचा सकती है, एक ग़लती हुई नही कि ख़ुदा के प्यारे होने से कोई नही बचा सकता।
नियमों के अनुसार मोटे तौर पर हर पाँच फुट की खुदाई पर पाँच फीट चौड़ा एक बैंच होना है, और ऐसे ही बैंचों की क्रमबद्धता के साथ सीढ़ी नुमा खनन का नियम है। खदान के किनारे बृक्षारोपण और सुरक्षित घेराबंदी आवश्यक है, सड़क से नियत दूरी पर ही खनन करने का नियम है।
लेकिन चित्रों में देखिए कहीं बेंच नही दिखता, एकदम सैकड़ों फीट सीधी खड़ाई लिए खुदाई है। यहाँ ऊपर जिन खदानों का चित्र है, वो बिलकुल मुख्य सड़क के किनारे है। कहाँ का है, मैं जगह का नाम नही बता रहा, क्योंकि वसूली चालू हो जाएगी।

बस हाथ की लेखनी ही काफ़ी है नन्दलाल परशुराम सर के लिए

*हिन्दुस्तान के संपादक ओमप्रकाश अश्क जी गोड्डा आए और नए व्यूरो चीफ अनिमेष भाई को बनाए। वे बोले कि केवल नंदलाल बाबू की खबर हाथ से* *लिखी होगी बाकी को टाइप कर खबर भेजनी* *है*
*पल्लव, गोड्डा*

नंदलाल परशुरामका जी के साथ सौतेला व्यवहार की बात दिल्ली हिन्दुस्तान के संपादक के पास भी पहुंच गया। वहां से आदेश आया कि गोड्डा के पुराने व्यूरो को हटाकर नया व्यूरोचीफ बनाया जाय। इसी क्रम में हिन्दुस्तान धनबाद के तत्कालीन संपादक ओमप्रकाश अश्क साहब गोड्डा आये और *अनिमेष भाई को नया व्यूरो चीफ बनाए। गोड्डा आने* *पर अश्क साहब नए व्यूरो चीफ अनिमेष जी से बोले कि नंदलाल बाबू के हाथ से लिखी खबर को केवल टाइप करा देना* है। बाकी संवाददाताओं को अपने से टाइप कर खबर भेजनी है। इस तरह इस वार की लड़ाई मेें भी अपने को इश्मार खान समझने वाले पत्रकार भाई को मुंह खानी पड़ी।
*नया व्यूरो चीफ अनिमेष जी छोटा भाई ऐसे सब दिन रहा है। वे* *बोलते भैया आपने चाणक्य जैसा रॉल अदा कर मुझे चंद्रगुप्त मौर्य बना दिया है। आपको मेरी ताज की हिफाजत सब दिन करनी है। मैंने अनिमेष भाई को* उसी समय वचन दिया कि जो सही है, उसके साथ पल्लव हर समय खड़ा ही नहीं, किसी भी हद तक लड़ने के लिए भी तैयार है। आप शान से हिन्दुस्तान में लिखिएगा। मेरी अगर कहीं जरूरत होगी तो एक बड़े भाई के रूप में हमेशा आपके आगे खड़ा रहूंगा।
जब अनिमेष जी व्यूरो चीफ हिन्दुस्तान का बन गए तो नंदलाल बाबू को काफी इज्जत करने लगे। वे सदा उसे चाचा कहकर ही संबोधित करते। वे खुशी मन से पत्रकारिता करने लगे। नंदलाल बाबू बोलते कि जब भी पत्रकारिता में मुझे दिक्कत हुई तो आप संकटमोचन बनकर आगे आए पल्लव जी। आप पहले तो किसी को छेड़ते नहीं, लेकिन जो आपको बेवजह छेड़ा, उसको आपने कभी छोड़ा भी नहीं। *नंदलाल बाबू मुझे सब दिन हिम्मती और जीवट इंसान कहते थे। सच भी यही है कि मेरा एक* *हाथ अगर इंद्रजीत तिवारी थे तो दूसरा हाथ नंदलाल बाबू थे। नंदलाल बाबू के नहीं रहने से मेरा एक हाथ जरूर टूट* *गया। पर मैं आपको भरोसा दिलाता हूं दादा, कि आपकी अदृश्य प्रेरणा शक्ति मुझे कभी कमजोर होने नहीं देगी।*
*नोट – आज नंदलाल बाबू का श्राद्ध कर्म संपन्न हाे रहा है। वैसे तो इनपर लिखने के लिए मेरे पास कई महीनों का खजाना है। पर कल का आलेख नंदलाल बाबू पर अंतिम होगा। विनम्र श्रद्धांजलि दादा।*

जादोपटिया : कलाकार की कृतियाँ , जो बन गईं भिक्षापात्र

सन्थाल जनजाति की संस्कृति प्रकृति के साथ कैसे और किस स्तर तक जुड़ी हुई है, इसकी कल्पना इससे की जा सकती है, कि किसी भी सन्थाल जनजाति के गांव में बिना गए नही समझा जा सकता। उनके घर आँगन सब प्रकृति की कहानी कहता सुनाता सा लगता है। उनकी घरों की दीवारें तक उनकी संस्कृति की कहानी कहतीं हैं।
1990 के दशक में मेरे मित्र पत्रकार डॉ आर के नीरद ने सन्थाल समाज की लुप्त होती जादो पटिया चित्रकला पद्धति को ढूंढ निकाला, और फिर उसपर उन्होंने शोध शुरु किया।
इस शोध के समय डॉ आर के नीरद के साथ मैं भी सन्थाल संस्कृति को समझने और जानने उनके साथ कभी कभी घूमने लगा। कई कार्यशालाओं का भी नीरद जी ने आयोजन किया।
इसी क्रम मैं एक ऐसे दुमका के एक गांव में पहुँचा , जहाँ जादोपटिया के एज्ञाहरवें पायदान से नीरद जी ने मुझे मिलाया। एक संस्मरण आपलोगों से साझा कर रहा हूँ। ——
उस समय ये हिंदुस्तान दैनिक के पटना में छपा था।

एक कलाकार कैसे भिक्षुक बन जाता है, और हम समाज के लोग कैसे उन्हें कलाकार रहते हुए भिक्षुक बना देता है इसकी कहानी है ये।
आर के नीरद जी के साथ कई संथाली गांव घूमते हुए हम एक गाँव के अंतिम छोर पर पहुँचे। जितने भी गाँव से गुजरे हर जगह एक संस्कृति नज़र आई जो हमारी अतीत को छूती हुई नज़र आई।
गाँव का नाम याद नही आ रहा, लेकिन नीरद जी के शोध में ये जरूर होगा, मुझे राघो चित्रकर(चित्रकार) मिला। गाँव के बाहर गोचर जमीन पर उसका घर दिखा। घर क्या उसे घर कह लें, तो शायद यही काफ़ी था। बिना चहार दीवाली के आंगन में एक बिना छत की एक कोठरी भर, छत क्या फूस की झोपड़ी से उसपार तारों की दुनियाँ तक झाँकती एक बाँस की अस्थि पंजर सी, झोपड़ी के छप्पर में कहीं-कहीं फूस इस क़दर दिख भर जाता कि मानो गवाही दे रहा कि कभी पूरा छप्पर छहाया हुआ होगा । हाँ रात में अपनी स्वर्गीय पत्नी की चार निशानी बच्चों के साथ बिलकुल प्रकृति के साथ जुड़ी उनकी आँखें झोपड़ी के अंदर से तारों को मानो रोज़ गिनती थीं। शायद राघो के बच्चों ने गिनती भी यहीं सीखी होगी।
टिमटिमाते तारो को देख उसके बच्चे इतना सब्र भर कर लेते कि घने अंधकार के उसपार रोशनी का एक भंडार भी जरूर होगा। इसी प्रकाश के भंडार की आस में राघो और बच्चों को कब नींद आ जाती और किसी भी मौसम के लिए अनुपयुक्त झोपड़ी में कब सूरज झाँक कर सुबह होने की ख़बर दे डालता पता ही नही चलता।
दिन के निकलते ही वो दीन राघो चित्रकर घर से निकल पड़ता, और आसपास के दो चार गांवों में घूम कर चित्र दिखाते हुए गाकर, एक से डेढ़ पाव चावल माँग लाता, यही राघो की दैनिक आय थी , और क्षीण-हीन सुबह से साम तक घूमने और गाने से हुई कमरतोड़ थकान राघो की बोनस।

इसी तकरीबन डेढ़ पाव चावल से राघो के परिवार का भरणपोषण होता। कमरे के एक कोने में ज़मीन को कोड़कर तीन बड़े पत्थरों को रख कर बना उसका चूल्हा तथा कभी न भर पाने वाला एक मिट्टी का पतीला ही उस परिवार की रसोई थी।
भारतीय लोक कला की एक और विलुप्त होती शैली जादोपटिया की दुमका जिला में मात्र गिनती के बचे कलाकारों में राघो अंतिम एज्ञाहरवें पायदान की तरह उस समय 65 वर्षीय अंतिम टिमटिमाता सितारा था, अब तो राघो ऊपर ईश्वर को अपनी कला दिखा रहा होगा।
भूमिहीन जर्जर शरीर रोज चार-छह गाँव में चित्र दिखा और गाकर भिक्षाटन कर आता था , बस इतना ही भिक्षा उसको मिल पाता कि शायद ही कभी उसके परिवार ने पेट भर खाया हो।
केसी विडंबना थी, कि कभी सन्थाल समाज की समृद्ध संस्कृति की उच्च भावना से जुड़ी ये चित्रकला एक भिक्षा पात्र भर बन कर रह गई थी।
फणीश्वरनाथ रेणु की कथा रसप्रिया के पात्र पचकोड़िया की तरह काँपती राघो की उनलियाँ अब सीधी रेखा नहीं खींच पातीं थीं, आड़ी तिरछी रेखाओं से उकरी चित्रों को दिखा कर ही बेदम सीने से गाते गाते फूलते दम से खाँसते खाँसते कफ़ से बेहाल हो जाता राघो।
राघो के चित्र को विदेशी कद्रदान भी ख़रीद ले गए थे उस समय। समाचार माध्यमों से दूर , तथा सरकारी आकाओं की गाड़ियों की चक्के की धुरी के पहुँच से दूर उस समय कोई सरकारी सहायता भी तो इन तक पहुँचते पहुँचते घिस जाती थीं।
लेकिन दलालों और बिचौलियों की क्रूर लुटेरी पंजों की पहुँच इन तक जरूर थी। विदेशी ग्राहकों से मिलने वाली कीमत भी राघो और राघो जैसे चित्रकर तक पहुँचते सरकारी सुविधाओं की तरह घिस ही जातीं थी।
दीन हीन राघो के जर्जर काँपते शरीर में धसीं आँखे मानो मेरे हर सवाल पर यही कहतीं नज़र आतीं-
“दुख ही जीवन की कथा रही,
क्या कहूँ जो अब तक नही कही”
इस लोक कला को विलुप्तता के कगार पर देख आदिवासी लोककला अकादमी की स्थापना करनेवाले अध्यक्ष और शोधकर्ता डॉ आर के नीरद ने उस समय मुझे बताया था, कि राजसैनिक पद्धति का अब तक की ख़ोज में इकलौता कलाकार है राघो। जादोपटिया के उस समय के ढूँढ निकाले गए छः पद्धतियों में ये छठी पद्धति थी, जो महाराष्ट्र के पिथोराशैली से हु ब हु मिलती है।
उस समय भी मेरे बालसखा,पत्रकार और शोधकर्ता डॉ आर के नीरद इस समृद्ध चित्रकला पद्धति की विलुप्तता और सरकारी बेरुख़ी से चिंतित थे, आज भी हैं। आश्चर्य कि सन्थाल संस्कृति से जुड़े इन कलाकारों को जैसे गाँव से बाहर बसना पड़ता था, ठीक उसी तरह आज भी इन कलाकारों को सरकार ने किसी जाति में परिभाषित कर उन्हें जो सुविधाएं विशेष तौर पर मिलनी चाहिए , नही दीं हैं।
राघो और कितने ही इस लोककला के कलाकार चित्र बनाते और कथा सुनाते सदा के लिए ख़ामोश हो गए, लेकिन आदिवासी और सन्थाल समाज की बात करनेवाले लोग, समाजसेवी, स्वयंसेवी संस्थाएं एवं सरकार की खामोशी नही टूटी। क्या एक ऐसी लोककला अब हमें सिर्फ़ कहानियों में ही सुननी पड़ेंगी और शोधपत्रों से ही जाननी पड़ेंगी ?
एक यक्ष प्रश्न है।
( क्या है ये कला और इनके प्रकारों पर आगे भी क्रमबद्ध यहाँ परोसूंगा )

पत्रकार के साथ एक संत भी थे नन्दलाल परशुराम

नंदलाल परशुरामका पत्रकार के साथ एक संत भी थे
संतमत आश्रम कुप्पाघाट के संतसेवी जी महाराज भी इनके कमरे में पधारे थे
पल्लव, गोड्डा

नंदलाल परशुरामका पत्रकार के साथ संत भी थे। वे महर्षि मेंही परमहंस जी महाराज के शिष्य भी थे। शान्ति संदेश जैसी पत्रिकाओं में भी नंदलाल बाबू लिखते रहे। महर्षि मेंही के शिष्य संतसेवी जी महाराज उनके बैठक खाना में कई वार आए। वहीं बैठक खाना जिसमें गद्दा लगा रहता था और नंदलाल बाबू उसी पर बैठकर समाचार लिखते रहते थे। संत सेवी जी महाराज को नंदलाल बाबू साहब कहा करते थे। एक वार संतसेवी जी महाराज उनके बैठक खाना में आने वाले थे। वे बोले पल्लव जी, कल साहब अपनी बैठक खाने में पधारने वाले हैं। आप जरूर आइएगा। इनके कहने पर मैं वहां पर गया और नंदलाल बाबू ने संतसेवी जी महाराज से परिचय भी कराये। बोले यह युवा लड़का पत्रकार है और बेवाक लिखता है साहब। उन्होंने मुझे भी आशीर्वाद दिया और संतसेवी जी बोले कि उसके हक के लिए जरूर लिखते रखना जिसकी बात कोई नहीं सुन रहा हो। तुम्हारी कलम से अगर किसी एक बेवश, लाचार, निरीह का भी उपकार हो रहा हो तो लाख विरोध के बाद भी तुम डरना नहीं, लिखते रहना। ऐसे लोगों काे भगवान खूद मदद करते हैं। ऐसे कार्य करोगे तो तुम्हें खूद अनुभव होगा कि मेरी मदद कोई परोक्ष रूप से कर रहा है। भले ही वह तुम्हें न दिखे। नंदलाल बाबू को भी आशीर्वाद दिए । वे संतसेवी जी महाराज को कभी साहब कहते तो कभी सरकार कह कर संबोधित करते। यह तस्वीर तभी कि है जब संतसेवी जी महाराज नंदलाल बाबू के बैठक खाना से निकल रहे थे। साहित्य पर भी नंदलाल बाबू की गजब की पकड़ थी। गोड्डा के साहित्य साधक पर भी कई आलेख किस्तों में मैंने प्रभात खबर में लिखी, जब इस अखबार का मैं हीरो था।
संतसेवी जी की बात और नंदलाल बाबू की हिदायत का परिणाम रहा कि जब मेरी खबर छपी तो स्कूल से अपनी बीमार मां के लिए अंडा छिपाकर लाने वाले बच्चे की मां की जिंदगी बच गई। वहीं थैलेसीमिया से पीड़ित गरीब बच्चे जिसको खून दिलाने के लिए कोरोना काल मेे उसका पिता साईकिल चलाकर 300 से अधिक किलोमीटर की दूरी तय करता है। मेरी खबर छपने और बंगलौर में पढ़े जाने के बाद उस बच्चे को बंगलौर की एक संस्था ने एक बड़े अस्पताल में करीब 37 लाख की सहायता से बोन मेरो ट्रांसप्लांट करा दिया। सचमुच यह दैविक प्रेरणा का ही परिणाम है। नंदलाल बाबू भले हमारे बीच नहीं रहे, पर उनकी प्रेरणा हमारी कदम कभी भी डगमगाने नहीं दे। यही प्रार्थना भगवान से करता हूं।

पत्रकारों की पूंजी होती है स्वाभिमान : स्व.परशुराम

डीसी को भी गलती माननी पड़ी थी नंदलाल परशुरामका से
पल्लव, गोड्डा
दैनिक प्रदीप के बाद मौत आने के दिन तक दैनिक हिन्दुस्तान के मान्यता प्राप्त पत्रकार रहे नंदलाल परशुरामका बाहर से जरूर सरल थे, पर जब कलम और स्वाभिमान की बात होती थी तो वे किसी भी हद तक जाने को तैयार हो जाते थे। बात 1995 की है। एमपी चुनाव में किसी छपी समाचार को लेकर डीसी नंदलाल बाबू से नाराज थे। गोड्डा गांधी मैदान स्थित टाउन हॉल के पास एमपी चुनाव की मतगणना हो रही थी। प्रशासन की ओर से मतगणना स्थल तक जाने के लिए पास की व्यवस्था किया गया था। नंदलाल बाबू को भी पास निर्गत किया गया था। वे जैसे ही मतगणना कक्ष में पहुंचे तो वहां पर बैठे तात्कालीन डीसी एस एन गुप्ता ने अनादर करने के ख्याल से पूछ दिया कि आप कौन हैं? और कैसे यहां तक आ गए? नंदलाल बाबू पहले तो चौके पर तुरंत बोले कि मैं हिन्दुस्तान हिन्दी का निज संवाददाता हूं और आपके द्वारा जारी पास के मिलने के बाद ही यहां समाचार संकलन करने आया हूं। बाद में उन्हें बैठने के लिए कहा गया पर स्वाभिमान पर लगी चोट के बाद नंदलाल बाबू वहां से तुरंत लौट गए। उस समय नंदलाल बाबू जिला पत्रकार संघ के अध्यक्ष भी थे। उसने अपनी बात पत्रकार संगठन में रखा। इंद्रजीत तिवारी ने मोर्चा संभाला और बाद में जाकर डीसी को नंदलाल बाबू से गलती मांगनी पड़ी। नंदलाल बाबू ने वार्ता के समय डीसी को कहा कि आपसे समाचार संकलन के दौरान भेंट होती रहती थी। आप सदा कहते थे कि आइए परशुरामका जी बैठिए और एका- एक उस दिन आपने सबों के सामने कहा कि आप कौन हैं और यहां तक कैसे आए? यह मेरे स्वाभिमान के खिलाफ था। नंदलाल बाबू ने कहा कि पत्रकार के पास स्वाभिमान ही पूंजी होती है। इसे के सहारे वे जीते- मरते हैं। यही कारण है कि इसके आगे आप कौन कहे, बड़ी- बड़ी हस्ती को भी पत्रकारों को सम्मान देना पड़ता है। पत्रकारिता में लोग सम्मान पाने को लेकर ही आते हैं। आज कुछ लोग इस सम्मान को गिरवी रखकर अपना स्वार्थ सिद्धि के लिए प्रशासन की जी हजूरी करते हैं। मैं इसमें से नहीं हूं डीसी साहब