बंगाल चुनाव , बिना चुनावी हिंसा हत्या के मतदाताओं का निर्भीकता से भारी संख्या में टर्न ऑन होना और फिर अप्रत्याशित परिणाम क्या संदेश देता है ? सिर्फ केंद्रीय सुरक्षा बल और शर्मा जी जैसे सिंघम ही नहीं बल्कि कई अप्रत्यक्ष कारण भी हैं।
केंद्र सरकार के रणनीतिक कदमों ने सिर्फ बंगाल चुनाव नहीं बल्कि पूरे पूरव-उत्तर के भारत के राज्यों तथा घुसपैठ को ध्यान में रख कर बंगाल , बिहार , उड़ीसा जैसे राज्यों में बड़े कूटनीतिक कदम उठाए।
एक आलेख जो मुझे किसी मित्र ने भेजा उसे मैनें किसी दृष्टिकोण से सोचा ही नहीं था।
इसके लेखक का नाम याद नहीं आ रहा लेकिन , उनसे क्षमा मांगते हुए अपने पाठकों के लिए हू ब हू उसे परोस रहा हूँ। क्योंकि झारखंड में हेमंत सोरेन ने VC कर राज्य के अधिकारियों को कड़े निर्देश दिए हैं। लेकिन पाकुड़ जैसे जिला में इस ओर सक्षम अधिकारियों का ध्यान किस मजबूरी में नहीं जा रहा ! समझ से परे है।
खैर पहले उस तार्किक आलेख को पढ़िए :—
12 अप्रैल के दिन रविन्द्र नारायण रवि जब कालीघाट पहुंचे तो उनके अंदर जैसे एक संकल्प दौड़ रहा था कि जो जिम्मेदारी मुझे दी गई है ,वो किसी और को भी मिल सकती थी,पर ये उन्हे करके दिखाना होगा… अचानक से तमिलनाडु से बंगाल आना उनके लिए ये समझना कोई नई बात नही थी कि मैटर कितना महत्वपूर्ण है…
पटना के बिहारी बाबू रविन्द्र रवि इतने खुर्राट हैं कि वो अजित डोवाल से लेकर इंटेलिजेंस में सबके लिए अर्जुन जैसे हैं….जबरदस्त इंटेलिजेंस आफिसर,भारत के पूर्व आइबी हेड की निगाहें हमेशा मछली की आंख पर ही रहती है…बेदाग छवि,मृदूभाषी,कम बोलना और नेपथ्य में काम करना ही उनकी पहचान है….
केंद्र सरकार के लिए बंगाल का चुनाव बस चुनाव नही था ,ये था भारत का सबसे संवेदनशील चोकपॉइंट मात्र बाईस किलोमीटर चौड़ी वह पट्टी जो मुख्यभूमि को पूर्वोत्तर के आठ राज्यों से जोड़ती है,उसको सुरक्षित रखना….
हाल ही में जब इन नए राज्यपालों को बंगाल और बिहार की जिम्मेदारी मिली तो ये अचानक लिया फैसला नही था,यही मात्र एक रास्ता बचा था…क्योंकी रविन्द्र रवि का करियर आईबी अधिकारी के रूप में बीता हैं, जिन्होंने दशकों बस यही अध्ययन किया कि उन लोगों की सीमा क्षेत्रों में आबादी कैसे बढ़ती है, बसती है और डेमोग्राफिक चेंज के साथ राजनीतिक नक्शे को बदल देती है…
25 फरवरी से 6 मार्च के बीच तीन घटनाएँ तेजी से हुईं थी… अमित शाह सीमांचल में सुरक्षा दौरे पर पहुंचे थे… आर. एन. रवि को तमिलनाडु से पश्चिम बंगाल के राजभवन भेजा गया…. लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन, जो कश्मीर की हार्ट्स डॉक्ट्रिन के सूत्रधार माने जाते हैं, को बिहार का राज्यपाल बनाया गया… दोनों नियुक्तियाँ चौबीस घंटों के भीतर हुईं थी…
पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग की सर प्रक्रिया में 58 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए और 60 लाख को जांच के दायरे में रखा गया था… सबसे ज्यादा असर मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे कॉरिडोर जिलों में दिखा…. जिस झारखंड ने घुसपैठ जैसे मामले को चुनाव में उठाने पर भाजपा को पठखनी दे दी थी …उसी ने केंद्र को रिपोर्ट भेजी है और हाई कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल किया है, जिसमें बताया गया कि संथाल परगना में आदिवासी आबादी 1951 के 44.67% से घटकर 2011 में 28.11% रह गई, जबकि मुस्लिम आबादी ईकाई से बढ़कर लगभग 24% तक पहुंच गई…. इस हलफनामे में घुसपैठ शब्द का इस्तेमाल किया गया… सीमांचल में बस किशनगंज की मुस्लिम आबादी 68% है, जबकि बिहार का औसत 17% है…
तीन राज्यों में फैले तेरह सटे हुए जिले, दो अंतरराष्ट्रीय सीमाएँ और एक महत्वपूर्ण चोकपॉइंट जिसे चिकेन नेक के नाम से जाना जाता रहा है, उसके ये सभी आंकड़े अब अदालत के रिकॉर्ड में हैं…
और इस पूरे कॉरिडोर के दोनों सिरों पर जिन दो लोगों को तैनात किया गया है, उन्होंने अपना पूरा करियर इसी तरह के क्षेत्रों में बिताया है…..
भाजपा बंगाल जितती है तो जो होने वाला है ,इसके लिए अब उसे झारखंड की मंजूरी की भी जरूरत नही है..क्योंकि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 3 तीनों विधानसभाओं से मंजूरी की मांग करता है…
बंगाल ,आसाम और बिहार ये तीनो मिलकर एक बहुत जरूरी काम करने जा रहे है….ये होना ही भारत की सुरक्षा के लिए बहुत जरुरी है…
रविन्द्र रवि और सैय्यत अता हसनैन दोनो ये जिम्मेदारी निभाना बखूबी जानते हैं…
बंगाल की जीत का सेहरा अगर भाजपा बांधती है तो इन सीआरपीएफ और इंटेलिजेंस के लोगों को भी इसका क्रेटिट पुरा जाता है,जिसके बिना भयमुक्त चुनाव असंभव था….
अब खेला होगा,पर जो होगा वो देशहित में होगा,किसी खास समुदाय के हित में नही…
ये चीजें झारखंड और खाशकर पाकुड़ में नहीं समझा जा रहा। जब सत्ता बदलती है , कारवाई होती है तो कोई नहीं बचाता। कल ही एक बंगाल में एक DCP को भारत से भागने के दौरान ED ने पकड़ लिया।
पाकुड़ में DMFT में अकेले कई अरब रुपये ग़बन हुए, लेकिन अधिकारी और लिपिकों की फ़ौज वहीं बनी हुई है। इन पैसों का हिस्सा चिकन नेक के इलाके में भी मोल और होटल बनाने में लगा है , तो क्या किसी अलगाववादी कार्यों में नहीं लगा होगा , इसकी क्या गारंटी है ?
जब अधिकारी में मुखिया तक के चेम्बर में दिये निर्देश लीक हो जाता हो , वहाँ सुरक्षा और अन्य कई बातों पर सोचना लाज़मी है।
माननीय मुख्यमंत्री बहुत कुछ समझ रहे हैं , इसलिए निर्देश कड़क दे रहे हैं , लेकिन उनके साथ साथ अधिकारियों को भी दिकभर्मित करनेवाले सफल हो जाते हैं। फॉलोअप में आगे लिपिकों के स्थान्तरण और प्रतिनियुक्ति में हुए खेल को भी पाठकों के सामने परोसेंगे।
खैर बंगाल को देखते जाइये और और झारखंड के भविष्य पर चिंतन कीजिए , नहीं तो चिंता का भी मौका नहीं मिलेगा।
हँलांकि हमारे मुख्यमंत्री इस ओर ध्यान दे रहे हैं, लेकिन….