सोमवार को हिंदुस्तान सहित पड़ोसी मुल्कों में ईद मनाई गई। खुशियों के इस त्योहार की मिठास से पूरा वातावरण मानो महक उठा , अभी ईद की मिठास की ख़ुमारी कई दिनों तक रहेगी।
ये अलग बात है कि देश के कुछ जगहों पर ईद भी राजनीति का अखाड़ा बना। दुखद बात रही कि कुछ इस्लामिक पड़ोसी मुल्क मंहगाई की मार से इस क़दर त्रस्त दिखा, कि गरीबों के दामन और आँगन ईद की खुशियों से अछूता रह गया।
हिंदुस्तान में कुछ गरीबों के आंगन तक राजनीति की चाशनी में लिपटी ईद की खुशियाँ पहुँची , लेकिन पाकुड़ में राजनीति और कूटनीति से बिलकुल इतर एक शख़्स अंदर से व्यग्र था कि ईद की खुशियाँ कैसे उन जरूरतमंदों तक पहुंचाई जाय , जहाँ कोई कूटनीति की महक न पहुँचे।
एक आँखें ईद की खुशियों को बाँटना चाहता था, गरीबी के भावशून्य आँखों में भी मिठास का संतोष देखना चाहता था।
365 दिन पाकुड़ स्टेशन पर गरीबों को भोजन कराने वाले पत्थर व्यवसायी लुत्फुल हक़ ने सन्ध्या होते ही उन्हीं गरीबों की थाली में ईद की मिठास परोस दी।
खाने के साथ अपनी थाली में सेवइयों के साथ साथ मिठाई की परोसन देख गरीबों के गले के साथ आँखें भी भर आईं। और खाने के साथ ईद की मिठास परोसने वाले हाथ स्वयं उस लुत्फुल हक़ के रहे , जो पवित्र एक महीने तक रोज़े के बाद ख़ुदा की ईबादत को उठते रहे। एक ग़ज़ब का सन्तोष लुत्फुल के चेहरे पर दिख रही थी। कुछ पत्रकारों ने सवाल भी किये , उन्होंने कहा कि ये तो रोज की बात है , इसमें कहना क्या।
लेकिन मैं दूर खड़ा सेवइयां और मिठाइयाँ बाँटते उनके चेहरे और आँखों को पढ़ रहा था , मानो वो कह रहा हो , कि ईद ख़ुशियाँ मनाने का त्योहार सिर्फ़ नहीं , एक महीने के रोज़े के बाद ईद ख़ुशियाँ बाँटने पर ही मुक़म्मल होता है।
सचमुच ख़ुशियाँ बाँटना ही तो ईद है , जैसे चाँद चाँद चाँदनी बाँटने निकलता है! है न ?
ख़ुशियाँ बाँटने वाले इस शख़्स की इसी महक ने देश-विदेश में उन्हें सम्मानित कराया है।
एक सेल्यूट मेरा फिर से लूट ही जाती है ज़नाब लुत्फुल की सादगी और सोच❤️