Tuesday, January 13, 2026
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घुसपैठ के पीछे की अनकही कहानी। भाग – 2

क्रमांक 1 से आगे
भाग –2

बंगलादेशी घुसपैठ के द्वारा भारत के टुकड़े करने तथा आंतरिक रूप से असुरक्षित करने की मंशा में सी आई ए और आई एस आई क्यूँ ?
यह एक स्वाभाविक सवाल है। विभाजन के बाद कुछ हद तक आपसी बहुत सारे विषयों पर असहमति रहने के बाद भी भारत में सभी समुदायों ने आपस में मिलजुल कर रहना शुरू किया। सभी ने मिलकर देश को आगे ले जाने में अपनी सहयोगिता देना शुरू किया और रखा, तथा देश आगे की ओर तेजी से चल पड़ा।
लेकिन आसपास के देशों में भारत की साम्प्रदायिक एक जुटता के साथ आगे बढ़ना कट्टरपंथियों को रास नहीं आ रहा था । उधर पश्चिमी देशों को भी भारत के अंदर की शांति और आगे बढ़ना रास नहीं आ रहा था। भारत की आंतरिक शांति तथा आगे बढ़ने से उपजे असन्तोष के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने दूरगामी स्वार्थ थे। लेकिन उस स्वार्थ को साधने के लिए कोई दूरगामी योजना लाज़मी थे। उसकी योजना ब्रिटिश शासन काल से ही अमेरिका सहित पश्चिमी देशों ने शुरू कर दी थी , जो आहिस्ते आहिस्ते भारत की आज़ादी के समय ही राजनैतिक बुद्धिजीवियों और विद्वानों को समझ में आने लगा था। बंगलादेश बनने के बाद योजना ने जोर और रंग पकड़ना शुरू किया।
देश में घुसपैठ कराकर कट्टरपंथियों ने हमें अस्थिर करने की योजना पर जोरदार काम शुरू किया।
इन दिनों आप देख रहे होंगे कि एक के बाद एक कई ऐसी पत्थरबाजी की घटनाएं सामने आईं, जिसमें उस विशेष जगह के लोग शामिल नहीं थे , बल्कि अफवाहों के सहारे दूसरे स्थान की भीड़ बाहर से पुलिस पर पत्थरबाजी करने आये थे। इनके प्रायोजित होने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता। देश की अखंडता एवं सौहार्द में जीने की बोखलाहट और असहजता बृहत तौर पर देखी जा रही है, देश से सात समंदर पार भी और देश के अंदर भी।
अंतरराष्ट्रीय साज़िश के अलिखित इतिहास कहते हैं , कि आज़ादी के बाद लगातार आगे बढ़ रहे भारत को रोकने के लिए बाहर से नहीं बल्कि अंदर से अस्थिर किये जाने की मंशा काम कर रही है। मूल भारत के हिन्दू और मुसलमान अलग अलग पंथ के रहने के बाद भी सांस्कृतिक रूप से मिलजुलकर रहते हैं। इसलिए दहाई दशकों से घुसपैठ कराकर उन्हें देश के हाईवे और रेलवे लाईनों के किनारे ऐसी जगहों पर घने रूप से तंग गलियों का निर्माण कर बसाया गया।
अंतरराष्ट्रीय साज़िशों की सोच ऐसी रही कि जब कभी हिंदुस्तान बाहरी या पड़ोसी देशों से युद्ध में उलझे तो ब्यापक रूप से आंतरिक अशांति फैलाकर हाईवे और रेल लाइनों को ऐसे बाधित कर दिया जाय कि सेना के मुभमेन्ट को रोका या प्रभावित किया जा सके। लेकिन हवाई मार्गों , उच्च स्तरीय टनल , रेलवे लाईनों की आंशिक रूप से घेराबंदी के साथ नए सुरक्षा मानकों पर काम ने एक और चिढ़न पैदा की।
इसी घुसपैठ के द्वारा अलगाववाद की सोच को भी देश में व्यापक रूप से पहुँचाना तथा यहाँ शांति से रह रहे लोगों को एक दूसरे के प्रति अस्वाभाविक विद्वेष प्रत्यारोपित करने की मंशा को साकार रूप देना ही उद्देश्य है और था।
इसके पीछे का प्रारंभिक उद्देश्य था कि महाराष्ट्र के नागपुर से नागालेंड तक के अधिसूचित कॉरिडोर को धर्मांतरण के द्वारा इनका एक अलग पहचान बनाकर भारत को दो और विभाजन का डँस दिया जा सके।
बंगलादेश से लगी सीमांत भारत के जिलों को जो अधिसूचित क्षेत्र में न पड़ते हों या आंशिक तौर पर पड़ते हों , उन्हें बृहत बंगलादेश के छुपी योजना के तहत बंगलादेश में मिला देना , तथा अधिसूचित कॉरिडोर को एक अलग पहचान के साथ अलग देश बनाने की अंतरराष्ट्रीय साज़िश पर काम चल रहा था। ताकि दुनियाँ के इस इलाके में भी सैनिक बेस बनाकर दुनियाँ के इस इलाके के देशों पर भी नज़र रखी जा सके। इस बात को नागालेंड , असम आदि राज्यों में उग्रवाद , आतंकी घटनाओं एवं सशस्त्र आन्दोलनों ने सावित किया, हँलांकि सात बहने राज्यों के विकास को दिल्ली ने भी अनदेखा किया , इसमें दो मत नहीं है। पर यहाँ बंगलादेशी और रोहंगिया घुसपैठ पश्चिम के अलग पहचान के देश की मंशा को मौन रूप से चोटिल करना शुरू किया , इसलिए पश्चिमी देशों ने भी शरणार्थियों एवं घुसपैठ के साथ आतंकवाद पर टर्राना शुरु किया।

ऐसा क्यूँ , तो जवाब है कि प्राकृतिक संसाधनों की कमी तथा अपने स्वार्थ जनित कारणों से घुसपैठ ने अपने पैर पूरे देश में पसारने शुरू किया , जिसके कारण अलग पहचान के लेंड की मंशा पर पानी फिरने की स्थिति दिखने लगी। झारखंड के संथालपरगना पर ख़ुफ़िया विभाग ने सरकार को रिपोर्ट किया कि प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण आदिवासियों की जमीन पर बड़े पैमाने पर कई तरीकों से घुसपैठियों द्वारा कब्जा किया गया है। स्वाभाविक है कि इस तरह के रिपोर्ट सीआईए एवं अन्य सक्षम एजेंसियों को भी रही होगी। इधर जब तक सिर्फ भारत में आतंकवादी घटनाएं होती थी तो पश्चिम चुप था, लेकिन आतंकवाद ने पश्चिमी देशों को भी अपने आगोश में लेना शुरू किया तो आतंकवाद के विरोध में पश्चिमी बयानों की बयार भी चलने लगे।
जो भी हो 1990 के दशकों के आसपास अन्तर्राष्ट्रीय अलगाववादी सोचों ने बंगलादेश में 86 ऐसे ट्रेनिंग सेंटर भी चला रखे थे , जो घुसपैठ का सहयोग विभिन्न ढंग से करते थे, और उनमें अलगाववादी सोच तथा साम्प्रदायिक हिंसा की ज़हर के साथ गजबा ए हिंद की सोच भी आरोपित करते थे।
1996 में तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने कोलकाता में एक प्रेसकन्फ्रेन्स में ऐसे ही ट्रेनिंग केन्द्रों की चर्चा की थी। कुलमिलाकर अंतर्राष्ट्रीय साज़िशों के परिदृश्य के परिणाम आज देखने को विभिन्न स्तरों पर दिख रही है।
अफवाहों से देश के माहौल को हमेशा बिगाड़ने के प्रयास बरबस दिख जा रहे हैं।
आज जब घुसपैठियों को बाहर करने की बात या कार्रवाइयाँ होतीं हैं तो एक विशेष क्लास के लोगों में बेचैनी और छटपटाहट के साथ अनाप शनाप बयान देखने सुनने को मिलते हैं , जो स्वाभाविक है , क्योंकि इस अंतरराष्ट्रीय साज़िश के पीछे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अगाध पैसे लुटाये गये हैं , और तत्कालीन रूप से फ़ायदे के कारण देश के राजनीतिक और धार्मिक तारणहार जमकर बिके हैं। स्वयंसेवी संस्थाओं का तो खैर कहना ही क्या।
इन साज़िशों को मैने किताबों में नहीं जमीन पर पढ़ा है। इस क्षेत्र में लंबे समय तक रहा बल्कि मजदूरी ,लोरियों के सहचालक(खलासी) बनकर दूर सुदूर यात्राएं कर 1990 की दशक में देखा और व्यवहारिक रूप से पढ़ा है।
क्रमशः

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