Wednesday, February 4, 2026
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पीड़ा है रेल से उपेक्षित पाकुड़ की और आशा है बाबूलाल मरांडी से इसलिए सवाल भी उन्हीं से कर रहे लोग

*पाकुड़ की रेल पीड़ा और एकमात्र आशा बाबूलाल मरांडी*

पाकुड़ एक शांत, सरल और सहनशील जिला है। भौगोलिक रूप से यह दो ओर से पश्चिम बंगाल से जुड़ा है और सामाजिक रूप से यह एक आदिवासी बहुल क्षेत्र है। यहां की जनता का जीवन संघर्षों से भरा है। उनके सपने बहुत छोटे हैं—बस इतना कि दो वक्त की रोटी मिल जाए, बच्चों की पढ़ाई किसी तरह चल जाए और बीमार पड़ने पर इलाज के लिए शहर भागना न पड़े। बड़े-बड़े सपने, जैसे उद्योग, उच्च शिक्षा, आधुनिक अस्पताल, बेहतर रोजगार या सशक्त प्रशासन—ये सब यहां की आम जनता के मन में आकार ही नहीं ले पाते।

इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि यहां के सुविधा-संपन्न और संभ्रांत वर्ग जन आंदोलनों से दूरी बनाए रखते हैं। राजनीतिक दल चुनाव के समय जनता को साधन की तरह इस्तेमाल करते हैं और चुनाव खत्म होते ही उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है। सरकारें भी जनता को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय लोकलुभावन योजनाओं के सहारे एक पराश्रित जीवन की ओर धकेल देती हैं। ठीक वैसे ही जैसे पोल्ट्री फार्म में मुर्गियों के सामने दाना डाल दिया जाता है—जीवन तो चलता है, पर उड़ान की कोई गुंजाइश नहीं रहती।

पाकुड़ की भोली-भाली जनता अपने और अपने बच्चों के भविष्य को लेकर बड़े संघर्षों में शामिल होने से भी कतराती है। शायद उन्होंने मान लिया है कि उनका भाग्य पहले ही लिख दिया गया है।

विडंबना यह है कि पाकुड़ जिला काला पत्थर उद्योग के लिए पूरे एशिया में जाना जाता है। यहीं से निकला कोयला पश्चिम बंगाल और पंजाब को रोशन करता है। कहा जाता है कि जहां कोयला होता है, वहां विकास अपने आप आता है। लेकिन पाकुड़ ने इस कथन को झूठा साबित कर दिया है। यहां न तो उच्च स्तरीय चिकित्सा सुविधा है, न गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, न बेहतर आवागमन के साधन। संसाधन यहां हैं, लेकिन विकास कहीं और चला जाता है।

पाकुड़ रेलवे स्टेशन हावड़ा–गुवाहाटी मुख्य रेलखंड पर स्थित है। यह पूर्व रेलवे के हावड़ा मंडल का एकमात्र जिला मुख्यालय स्टेशन है। रेल राजस्व संग्रहण में हावड़ा मंडल देश में दूसरे स्थान पर है। सिर्फ कोयला और पत्थर की माल ढुलाई से रेलवे हर वर्ष लगभग 3600 करोड़ रुपये का राजस्व कमाती है। इसके बावजूद पाकुड़ को यात्री सुविधाओं के नाम पर उपेक्षा ही मिली है।

यह अत्यंत दुखद है कि जैसे राजनीतिक दल जनता को उनके हाल पर छोड़ देते हैं, ठीक वैसे ही रेल प्रशासन भी पाकुड़ की जनता को उनकी समस्याओं के साथ जीने के लिए मजबूर कर रहा है। जनता जिन जनप्रतिनिधियों को लोकसभा और विधानसभा भेजती है, वे शायद ही कभी पाकुड़ की आवाज लोकतंत्र के मंदिर तक पहुंचाते हैं। अगर ऐसा होता, तो आज पाकुड़ रेलवे स्टेशन इस कदर उपेक्षित न होता।

हाल ही में 17–18 जनवरी 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा देश को पांच-पांच अमृत भारत एक्सप्रेस ट्रेनों की सौगात दी गई। चिरूपल्ली–एनजेपी, नागरकोइल–एनजेपी, बेंगलुरु–राधिकापुर, बालूरघाट–बेंगलुरु और अलीपुरद्वार – बंगलुरु अमृतभरत एक्सप्रेस—ये सभी ट्रेनें पाकुड़ से होकर गुजरीं। लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि एक भी ट्रेन का ठहराव पाकुड़ स्टेशन पर नहीं दिया गया।

यह सिर्फ एक तकनीकी निर्णय नहीं, बल्कि पाकुड़ की जनता की भावनाओं पर सीधा आघात है। यह वही स्टेशन है जो रेलवे को हजारों करोड़ का राजस्व देता है, लेकिन जब सुविधा की बात आती है तो उसे नजरअंदाज कर दिया जाता है।

हालांकि इतिहास गवाह है कि जब मालदा–बेंगलुरु अमृत भारत एक्सप्रेस की घोषणा हुई थी और उसका ठहराव पाकुड़ में नहीं था, तब पाकुड़ के वरिष्ठ अधिवक्ता सुकु उपाध्याय की पहल और झारखंड के वरिष्ठ नेता बाबूलाल मरांडी जी के त्वरित हस्तक्षेप से उसी दिन 14 जनवरी को बेंगलुरु–मालदा अमृत भारत एक्सप्रेस का ठहराव पाकुड़ में सुनिश्चित हुआ था।

आज एक बार फिर पाकुड़ की जनता उम्मीद भरी आंखों से बाबूलाल मरांडी जी की ओर देख रही है। उन्हें भरोसा है कि वे फिर से आगे आएंगे और पाकुड़ के साथ हो रहे इस सौतेले व्यवहार को समाप्त करेंगे। जनता चाहती है कि सभी नई अमृत भारत एक्सप्रेस ट्रेनों का ठहराव पाकुड़ में हो। साथ ही पाकुड़ होकर पटना और नई दिल्ली के लिए सीधी ट्रेन चलाई जाए, ताकि यह जिला देश की मुख्यधारा से सही मायनों में जुड़ सके।

झारखंड और संथाल परगना प्रक्षेत्र में बाबूलाल मरांडी जी एकमात्र ऐसे नेता हैं जिनकी स्वीकार्यता सर्वव्यापी है। केंद्र में भाजपा-नीत एनडीए सरकार है और उनका सीधा संवाद केंद्रीय नेतृत्व और मंत्रियों से है। ऐसे में यह अपेक्षा अस्वाभाविक नहीं है।

आज जरूरत है उसी इच्छाशक्ति की, जिसके लिए बाबूलाल मरांडी जी पहले से जाने जाते रहे हैं। जनता को आज भी भरोसा है कि वे पाकुड़ की पीड़ा को समझते हैं और सही समय पर निर्णायक कदम उठाएंगे।

यह सिर्फ ट्रेन के ठहराव का सवाल नहीं है, यह पाकुड़ के सम्मान, भविष्य और अधिकार का सवाल है। और इस सवाल का जवाब देने की उम्मीद आज भी बाबूलाल मरांडी जी से ही है।

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