Saturday, June 15, 2024
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पंचायत चुनाव में मत का करें दान , वोट की कीमत लगाने वालों को नकारे

झारखंड में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की प्रक्रिया चल रही है, फ़िलवक्त नामांकन की प्रक्रिया शबाब पर है।

एक और चीज़ अपने शबाब पर अपने है, वो है चुनावी चर्चा।
गाँव, गली,कपाल चाय-पान की दुकान और ऐसी हर जगह जहाँ लोग किसी न किसी कारण जुट रहे हैं, यहाँ तक कि शादी-ब्याह के घरों तक में बस पंचायत चुनाव पर ही चर्चा ए आम है।
कहीं नाराज़गी तो कहीं पक्ष के तर्क खुलकर इन चर्चाओं की महफ़िल में परोसे जा रहे हैं।
एक वर्ग और सुसुप्तावस्था में सक्रिय है , जो मौसमी तौर पर चुनावी दावे करते हैं , लेकिन ये दावे , वो दावे करने वालों नेताओं से करते हैं , कि अग़र उन्हें खुश रखा गया तो उनके हाथ में इतने वोट हैं, जो उन्हें ख़ुश रखने वाले को दिला सकते हैं। उनके पास सभी स्वयंभू आँकड़े होते हैं, जिसे वे तर्कों के साथ परोसते हैं।
खैर ये मौसमी रोजगार वाले लोग हैं जो कुछ ऐसे समय मे अपनी रोटी सेंक जाते हैं, और फिर जीतने वाले लोग अपने पूरे कार्यकाल में सिर्फ़ रोटियाँ ही सेंकते हैं।
इस पूरे खेल में जो पीसे और सेंके जाते हैं, वो इस पूरी प्रक्रिया के सबसे मजबूत और महत्वपूर्ण कड़ी मतदाता हैं, और यही मजबूत कड़ी अन्ततः सबसे मजबूर नज़र आती हैं।
इसलिए अपनी क़ीमती वोटों को क़ीमत के एवज में नहीं बाँटना चाहिए।
लेकिन कई बार मैंनें देखा-अहसासा है , कि कई जगह वोट बेचनेवालों को इसकी क़ीमत कार्यालयों के चक्कर लगाते ही देना पड़ता है, चाहे वो कार्यालय सरकारी हो या फ़िर जीते हुए नेताजी का।
पत्रकारिता के साथ मैं आदतन समाजसेवा के 15-16 वर्ष बिताने के बाद चुनावी राजनीति को समझने के लिए तकरीबन डेढ़-दो दशक पहले चुनावी मैदान में ताल ठोक बैठा हूँ ।
मैंनें सुन रखा था, कि मत ख़रीदे भी जाते हैं। मैं इसे समझ नहीं पाता था, आख़िर कैसे ! अगर कोई बिकने के बाज़ार में दिखे तब तो ख़रीदना सम्भव होगा, लेकिन यहाँ तो कोई बाज़ार मुझे दिखता ही नहीं था।
इस बाज़ार से परिचय ज़रुरी था , मेरी जिज्ञासा की हठ ने मुझे चुनावी मैदान में उतार दिया। मेरे उतरने भर की देरी थी वोट मैनेज करनेवाले दावेदार मुझ तक पहुँचने लगे।
पूरी प्रक्रिया, पूरी होते होते मैं पूरी बात-बाज़ार और बहुत कुछ पूरी तरह समझ और मस्तिष्क में पिरो गया।
यहाँ ग़ज़ब तरीका है बेचने और खरीदने का।
इसमें नेता वोट , बीचवाले वोटों के दावेदार नोट और मतदाता सिर्फ़ आश्वासन के घूँट समेटते हैं , मुर्गे और बकरे जान गंवाते हैं।
पूरी प्रक्रिया के दौरान सरकारी अफसरों , अमलों और पुलिस वालों को न चैन की घड़ी और भोजन तक का समय नही मिलता।
लेकिन इधर नेताओं और उन्हें नेता बनाने वालों की ख़ूब छनती हैं।
शराब की बोतलों और मुर्गे-बकरों की बोटियों पर वोटों के बाज़ार का माहौल तैयार होता है और फिर मतदान के पहले की अंतिम रात ही फैसला नतीजों में बदल चुका होता है जो मतपेटियों में जाने भर की औपचारिकता पूरी करने के लिए अंतिम रात की सुबह होती है।
बाज़ार सजने को आतुर है, प्रक्रियाएं चल रही है, शासन-प्रशासन रेस है , चुनाव आयोग क्रियाशील है।
अब मतदाताओं की बारी है, गाँव की सरकार बनेगी , काम करने वाले लोगों को चुनकर अपनी सरकार बनाइये ।
किसी लोभ-मोह में बिना फँसे, पूरे सरकारी तंत्र की मेहनत को साकार करते हुए मत का दान करने का संकल्प लें, ये लोकतंत्र का संस्कार है , इस पर दाग न लगे।

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