Wednesday, February 11, 2026
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विकास के दौड़ में परंपरा को पूरी तरह कुचल देना भी विकास नहीं, महेशपुर अंबेडकर चौक पर दिखा टमटम

पूर्व सैनिक और पत्रकार राजेश प्रसाद की कलम से अतीत में झाँकता एक आलेख—-

इतिहास के पन्नों से झांकता विलुप्त होता एक साधन, एक सवारी

पाकुड़ (महेशपुर) : आज के तेज़ रफ्तार और डिजिटल दौर में जब सड़क पर दौड़ती मोटरसाइकिल, कार, ई-रिक्शा समेत अन्य मशीनी गाड़ी आम दृश्य बन चुके हैं, उसी बीच महेशपुर अंबेडकर चौक पर सोमवार को एक घोड़ा गाड़ी यानी टमटम का दिखना लोगों के लिए कौतूहल का विषय बन गया। कुछ पल के लिए मानो समय थम-सा गया और लोग इतिहास के उन पन्नों में वापस लौट गए, जब टमटम (घोड़ागाड़ी) ही सफर का सबसे सम्मानित और भरोसेमंद साधन हुआ करता था।
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*रामायण और महाभारत काल से जुड़ी है घोड़ा गाड़ी की परंपरा*
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इतिहासकारों के अनुसार घोड़ा और रथ का उपयोग रामायण और महाभारत काल से ही भारत में होता आ रहा है। उस दौर में रथ केवल यातायात का साधन नहीं, बल्कि शौर्य, प्रतिष्ठा और शक्ति का प्रतीक था। राजाओं, सेनापतियों और दूतों की यात्रा रथों के माध्यम से ही होती थी। कालांतर में यही रथ साधारण जनजीवन में ढलते-ढलते घोड़ा गाड़ी और टमटम के रूप में विकसित हुआ।
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*अंग्रेजी शासन में टमटम का रहा स्वर्णिम दौर*
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ब्रिटिश शासनकाल में टमटम ने एक व्यवस्थित परिवहन व्यवस्था का रूप ले लिया। रेलवे स्टेशन, कचहरी, थाना और बाजारों में टमटम की कतारें लगती थीं। उस समय वर्तमान झारखंड का साहिबगंज जिला, जो गंगा नदी के कारण रेल और व्यापार का प्रमुख केंद्र रहा, वहाँ टमटम का व्यापक प्रचलन था। साहिबगंज, राजमहल और आसपास के इलाकों में टमटम चालक न केवल सवारी ढोते थे, बल्कि खबरें, संदेश और सामान भी एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाते थे।
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*झारखंड की ग्रामीण संस्कृति में टमटम*
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झारखंड के आदिवासी और ग्रामीण समाज में टमटम केवल यातायात का साधन नहीं था, बल्कि शादी-ब्याह, मेले-ठेले और सामाजिक आयोजनों का अभिन्न हिस्सा रहा है। दूल्हे की बारात, देवी-देवताओं की शोभायात्रा और साप्ताहिक हाट, हर जगह टमटम की अहम भूमिका होती थी। साहिबगंज, पाकुड़, दुमका और गोड्डा जैसे जिलों में टमटम चलाना एक सम्मानजनक आजीविका मानी जाती थी।
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*सुविधा, सादगी और पर्यावरण मित्र साधन*
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टमटम की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि यह ईंधन-रहित, पर्यावरण मित्र और कम खर्चीला साधन था। खराब सड़कों और कीचड़ भरे रास्तों में भी यह आसानी से चल जाता था। न शोर, न प्रदूषण, बस केवल घोड़े की टापों की आवाजें।
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*तकनीक के आगे हारती परंपरा*
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समय बदला, सड़कें पक्की हुईं और तकनीक ने रफ्तार पकड़ी। मोटर वाहन, ऑटो और ई-रिक्शा के आगमन के साथ ही टमटम धीरे-धीरे हाशिए पर चला गया। घोड़े के रख-रखाव की बढ़ती लागत, सरकारी नियमों की अस्पष्टता और आधुनिक साधनों की सुविधा ने इस परंपरा को लगभग विलुप्त ही कर दिया।
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*आज का दृश्य एक चेतावनी*
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महेशपुर अंबेडकर चौक पर टमटम का सोमवार को दिखना केवल एक दृश्य नहीं, बल्कि एक संकेत और चेतावनी है कि हमारी सांस्कृतिक विरासत चुपचाप हमसे दूर होती जा रही है।
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*विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों की मांगें*
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विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों का मानना है कि सरकार को टमटम को सांस्कृतिक धरोहर का दर्जा देना चाहिए। पर्यटन स्थलों और मेलों में इसके उपयोग को प्रोत्साहित करना चाहिए। टमटम चालकों के लिए प्रशिक्षण व आर्थिक सहायता की योजना बनानी चाहिए। स्कूलों और संग्रहालयों में इसके इतिहास को स्थान देना चाहिए।
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*संरक्षण नहीं तो स्मृति में सिमट जाएगी परंपरा*
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अगर समय रहते टमटम जैसी परंपराओं का संरक्षण नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां इसे केवल किताबों और तस्वीरों में ही देख पाएंगी। सोमवार को अंबेडकर चौक पर टमटम का दिखना यह याद दिलाता है कि विकास के दौड़ में परंपरा को पूरी तरह कुचल देना भी विकास नहीं है। जरूरत है संतुलन की, जहां तकनीक के साथ-साथ इतिहास और संस्कृति भी जीवित रहे।
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*क्या कहते है जानकार*
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स्थानीय इतिहास के जानकार प्रो. अजय मंडल (सेवानिवृत्त शिक्षक, साहिबगंज) बताते हैं कि 1960–70 के दशक तक साहिबगंज, राजमहल और पाकुड़ क्षेत्र में टमटम आम परिवहन का साधन था। स्टेशन से बाजार और गांव तक जाने के लिए यही सबसे भरोसेमंद साधन माना जाता था।
महेशपुर के 75 वर्षीय बुजुर्ग रामचंद्र साह कहते हैं कि उनके जमाने में शादी-ब्याह में दूल्हा टमटम पर ही बैठकर जाता था। मेले में जाना हो या हाट, टमटम ही सहारा था। उस समय यह इज्जत की सवारी मानी जाती थी। पर्यावरणविद दीपक हेम्ब्रम का मानना है कि आज जब दुनिया प्रदूषण से जूझ रही है, टमटम जैसा साधन पूरी तरह ईंधन-रहित और पर्यावरण मित्र है। अगर इसे पर्यटन और सांस्कृतिक आयोजनों से जोड़ा जाए तो यह रोजगार का भी अच्छा माध्यम बन सकता है। महेशपुर के एक पूर्व टमटम चालक सलीम अंसारी बताते हैं कि पहले दिनभर में अच्छी कमाई हो जाती थी। लेकिन अब लोग जल्दी गंतव्य पर पहुंचना चाहते हैं। घोड़े का चारा महंगा है, रख रखाव मुश्किल है, इसलिए उन्होंने यह काम छोड़ दिया है। इसके अलावा पशु-चिकित्सा सुविधा की कमी, सरकारी प्रोत्साहन का अभाव और बढ़ती शहरीकरण की रफ्तार ने इस परंपरा को लगभग समाप्त कर दिया है। सामाजिक कार्यकर्ता मीना हांसदा कहती हैं कि सरकार अगर मेलों, पर्यटन स्थलों और ऐतिहासिक आयोजनों में टमटम को बढ़ावा दे तो यह परंपरा बच सकती है। इसे सांस्कृतिक धरोहर घोषित कर प्रशिक्षण और सब्सिडी दी जानी चाहिए।

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