Sunday, March 22, 2026
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आगामी 14 मार्च 2026 को राष्ट्रीय लोक अदालत को सफल बनाने को लेकर पीडीजे की अध्यक्षता में हुई अहम बैठक

नालसा नई दिल्ली एवं झालसा रांची के निर्देशानुसार जिला विधिक सेवा प्राधिकार पाकुड़ के तत्वाधान में आगामी 14 मार्च 2026 को राष्ट्रीय लोक अदालत को सफल बनाने को लेकर प्रधान जिला एवं सत्र न्यायधीश सह अध्यक्ष जिला विधिक सेवा प्राधिकार पाकुड़ दिवाकर पांडे की अध्यक्षता में इंश्योरेंस अधिवक्ता मेडिएटर अधिवक्ता के साथ महत्वपूर्ण बैठक की गई जिसमें मामलों से संबंधित कई बिंदु पर कानूनी पहलुओं पर विचार विमर्श किया गया। जिसमें अधिक से अधिक मामलों का निष्पादन को लेकर आवश्यक दिशा निर्देश दी गई। मौके पर अपर सत्र न्यायधीश प्रथम कुमार क्रांति प्रसाद डालसा सचिव रूपा बंदना किरो समेत इंश्योरेंस कंपनियों के अधिवक्तागण एवं अन्य उपस्थित रहें।

सांत्वना के दो बोल सुनने को इंतजार करते रह गए लोग , मिलने नहीं पहुँचे पूर्व मुख्यमंत्री

सड़क दुर्घटना में हुए मृतक के परिजन और ग्रामीण रह गये इंतजार में, पाकुड़ आकर भी वहां नहीं पहुंचे पूर्व मुख्यमंत्री

– उनका नहीं आना मतलब पीड़ित परिवार से उनकी कोई हमदर्दी नहीं – जिप सदस्य

पाकुड़ में पिछले दिनों शहर के गांधी चौक स्थित मस्जिद के सामने एक सड़क दुर्घटना में तलवाड़ांगा का रहने वाला एक युवक की घटनास्थल पर ही मौत हो गई थी, जिसपर प्रशासन की लापरवाही के विरोध में लोग सड़कों पर उतर कर विरोध प्रदर्शन करने लगे थे। विरोध के बाद लगभग नौ घंटे के उपरांत प्रशासन के द्वारा सकारात्मक पहल के बाद मामला शांत हुआ। इस घटना के बाद जिला प्रशासन द्वारा कई नामजद एवं अज्ञात के ऊपर नगर थाना में प्राथमिकी दर्ज किया गया था। उसके बाद पीड़ित परिवार के द्वारा नगर थाना में आवेदन देकर निर्दोषों पर कार्यवाही ना करने की मांग की गई थी। इस मामले को लेकर बुधवार को तलवाड़ांगा के ग्रामीण पीड़ित परिवार के साथ राज्य के पूर्व प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी से मुलाकात हेतु घंटों इंतजार करता रहा। लेकिन घंटों इंतजार के बाद भी बाबूलाल मरांडी पीड़ित परिवार से मिलने नहीं पहुंचे, जिससे ग्रामीणों को काफी दुःख हुआ। ज्ञात हो कि बुधवार को भाजपा के द्वारा शहर के अपर्णा मार्केट में बाबूलाल मरांडी की उपस्थिति में एक कार्यक्रम का आयोजन था। इस मामले में क्षेत्र की जनप्रतिनिधि जिला परिषद सदस्य पिंकी मंडल ने बताया कि बाबूलाल मरांडी के पाकुड़ आगमन को लेकर उनके द्वारा एक दिन पहले ही भाजपा के जिला अध्यक्ष सहित अन्य वरिष्ठ पदाधिकारियों को फोन पर सूचित किया गया था, जिसपर कहा गया था कि सबको लेकर अपर्णा मार्केट, जहां कार्यकर्ता सम्मेलन होना है वहां आया जाए। लेकिन ग्रामीण इसपर तैयार नहीं थे, ग्रामीणों का कहना था कि आजतक कोई बड़ा नेता एवं कार्यकर्ता गाँव में नहीं आया है और इस मर्माहत घटना पर पूर्व मुख्यमंत्री को एकबार गांव आना चाहिये। लेकिन उनका नहीं आना मतलब पीड़ित परिवार से उनकी कोई हमदर्दी नहीं है, जो दुःखद ही नहीं निंदनीय भी है। मौके पर क्षेत्र के मुखिया, पीड़ित परिवार, ग्रामीण एवं अन्य कई संगठन के लोग मौजूद थे।

गुटखा नहीं मिलने पर कट्टा लहराया था, पिता-पुत्र को दी धमकी — आरोपी को 7 साल की सजा

पाकुड़ जिला एवं सत्र न्यायाधीश दिवाकर पाण्डेय की अदालत ने अवैध हथियार से हमला करने और पिता-पुत्र को जान से मारने की धमकी देने के मामले में आरोपी सलीम शेख को दोषी करार देते हुए 7 वर्ष की सश्रम कैद की सजा सुनाई है। साथ ही न्यायालय ने दोषी पर कुल 13 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। जुर्माना नहीं देने पर उसे अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा। यह मामला पाकुड़ मुफस्सिल थाना क्षेत्र के इलामी गांव का है। सत्र वाद संख्या 185/2022 में सुनवाई पूरी होने के बाद न्यायालय ने फैसला सुनाया। अभियोजन पक्ष की ओर से अधिवक्ता लुकस कुमार हेमब्रम ने पक्ष रखा।

गुटखा नहीं मिलने पर निकाला था कट्टा

घटना 5 नवंबर 2020 की है। सूचक इमादुरुल रहमान के पुत्र अबुल कलाम आजाद की किराना दुकान पर आरोपी सलीम शेख ‘विमल गुटखा’ मांगने पहुंचा। दुकान में गुटखा नहीं होने पर वह उग्र हो गया और देसी पिस्तौल निकालकर पिता-पुत्र को जान से मारने की धमकी देने लगा। जान बचाकर जब बेटा घर के आंगन की ओर भागा तो आरोपी वहां भी पीछा करते हुए कट्टा तानकर गाली-गलौज करता रहा। इसी दौरान सूचक ने साहस दिखाते हुए पड़ोसी जर्जिश शेख और परिजनों की मदद से आरोपी को पकड़ लिया। उसके पास से एक लोडेड कट्टा तथा लुंगी में छिपाकर रखा गया एक कारतूस बरामद किया गया।

आर्म्स एक्ट में दो धाराओं में सजा।

अदालत ने आरोपी को आर्म्स एक्ट की धारा 25(1ए) के तहत 7 वर्ष की सश्रम कैद व 8,000 रुपये जुर्माना तथा धारा 26(2) के तहत 7 वर्ष की कैद व 5,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। दोनों मामलों में जुर्माना नहीं देने पर अलग-अलग अवधि की अतिरिक्त कैद भुगतनी होगी।

डी ए वी विद्यालय में चलाया गया फाइलेरिया मुक्ति अभियान कार्यक्रम

मंगलवार, 10 फरवरी 2027
राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम के अंतर्गत स्थानीय विद्यालय डी ए वी पब्लिक स्कूल पाकुड़ के सभा भवन में फाइलेरिया उन्मूलन हेतु फाइलेरिया मुक्ति अभियान की शुरुआत की गई। कार्यक्रम की शुरुआत विद्यालय प्राचार्य डॉ विश्वदीप चक्रवर्ती, सिविल सर्जन पाकुड़, डॉ सुरेंद्र कुमार मिश्रा, डी एम ओ डॉ अमित कुमार, इंचार्ज सी एस सी सफर डॉ के के सिन्हा एवं अन्य स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। तत्पश्चात विद्यालय के सभी बच्चों को तीन विभिन्न प्रकार की दवाएं खिलाई गई। दिनांक 10 फरवरी 2026 से 25 फरवरी 2026 तक फाइलेरिया रोधी दवाओं का सामूहिक सेवन जिले के हर प्रखंड, विद्यालय एवं गांवों में कराया जाएगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन एवं भारत सरकार द्वारा वर्ष 2027 तक फाइलेरिया उन्मूलन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। अपने अपने संबोधन में प्राचार्य डॉ चक्रवर्ती एवं सिविल सर्जन पाकुड़, डॉ सुरेंद्र कुमार मिश्रा जी ने सभी जिलेवासियों से अपील की है कि फाइलेरिया रोधी दवा सुरक्षित एवं प्रभावी है। उनलोगों ने अपने अपील में बताया कि फाइलेरिया या हाथीपांव एक गंभीर बीमारी है जो समय पर दवा लेने से पूरी तरह रोकी जा सकती है । समय पर दवा नहीं लेने से आजीवन विकलांगता का कारण बन सकती है।
इस कार्यक्रम को सफल बनाने में स्वास्थ्य कर्मी के साथ साथ विद्यालय के संजय कुमार यादव, पपीया बनर्जी, अमृता दास, तूलिका बिस्वास आदि का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

*मेडिएशन फॉर द नेशन 2.0” अभियान के तहत् आज एक मामलों का हुआ सफल मध्यस्थता*

नालसा नई दिल्ली एवं झालसा रांची के निर्देशानुसार जिला विधिक सेवा प्राधिकार पाकुड़ के तत्वाधान में प्रधान जिला एवं सत्र न्यायधीश सह अध्यक्ष जिला विधिक सेवा प्राधिकार पाकुड़ दिवाकर पांडे के निर्देश पर चले रहे मेडिएशन फॉर द नेशन 2.0” के तहत् आज एक मामलों का सफल सुलह समझौता कराया गया। मामला पाकुड़ व्यवहार न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश कुटुंब न्यायालय में चल रहे ओरिजनल सूट संख्या 140/2025 मोजामूल अंसारी बनाम जमेला बीबी जो वर्षों से अलग रह रहे दंपतियों को प्रधान न्यायाधीश कुटुंब न्यायालय रजनीकांत पाठक के अथक प्रयास से पति पत्नी के बीच चल रहे आपसी मतभेद को समाप्त किया गया। दोनों पति पत्नी ने आपसी मतभेद को भूलाकर एक साथ रहने के लिए राजी हुए। दोनो पक्ष एक दूसरे के भावनाओं का ख्याल करते हुए संसारीक जीवन व्यतीत करने भविष्य में किसी प्रकार का वाद-विवाद उत्पन्न नहीं करने मिलकर रहने का संकल्प लिया। प्रधान न्यायाधीश कुटुंब न्यायालय रजनीकांत पाठक के प्रयास से टूटता परिवार एक हो गए। इस टूटते रिश्ते को बचाने के लिए जिला विधिक सेवा प्राधिकार में मध्यस्थता राष्ट्र के लिए 2.0 का भूमिका एवं संबंधित दोनों पक्षों के अधिवक्ता का योगदान रहा। जिससे घर में खुशी लौट पाया। इस दौरान दंपति को एक साथ खुशी खुशी रहने मतभेद से बचने परिवार के साथ मिलजुल कर रहने का संदेश प्रधान न्यायाधीश कुटुंब न्यायालय रजनीकांत पाठक ने दिया। मौके पर दंपतियों के परिजन, उभय पक्ष के अधिवक्ता मो सलीम एवं राजाधन किस्कू न्यायालय कर्मी उपस्थित रहें।

विकास के दौड़ में परंपरा को पूरी तरह कुचल देना भी विकास नहीं, महेशपुर अंबेडकर चौक पर दिखा टमटम

पूर्व सैनिक और पत्रकार राजेश प्रसाद की कलम से अतीत में झाँकता एक आलेख—-

इतिहास के पन्नों से झांकता विलुप्त होता एक साधन, एक सवारी

पाकुड़ (महेशपुर) : आज के तेज़ रफ्तार और डिजिटल दौर में जब सड़क पर दौड़ती मोटरसाइकिल, कार, ई-रिक्शा समेत अन्य मशीनी गाड़ी आम दृश्य बन चुके हैं, उसी बीच महेशपुर अंबेडकर चौक पर सोमवार को एक घोड़ा गाड़ी यानी टमटम का दिखना लोगों के लिए कौतूहल का विषय बन गया। कुछ पल के लिए मानो समय थम-सा गया और लोग इतिहास के उन पन्नों में वापस लौट गए, जब टमटम (घोड़ागाड़ी) ही सफर का सबसे सम्मानित और भरोसेमंद साधन हुआ करता था।
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*रामायण और महाभारत काल से जुड़ी है घोड़ा गाड़ी की परंपरा*
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इतिहासकारों के अनुसार घोड़ा और रथ का उपयोग रामायण और महाभारत काल से ही भारत में होता आ रहा है। उस दौर में रथ केवल यातायात का साधन नहीं, बल्कि शौर्य, प्रतिष्ठा और शक्ति का प्रतीक था। राजाओं, सेनापतियों और दूतों की यात्रा रथों के माध्यम से ही होती थी। कालांतर में यही रथ साधारण जनजीवन में ढलते-ढलते घोड़ा गाड़ी और टमटम के रूप में विकसित हुआ।
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*अंग्रेजी शासन में टमटम का रहा स्वर्णिम दौर*
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ब्रिटिश शासनकाल में टमटम ने एक व्यवस्थित परिवहन व्यवस्था का रूप ले लिया। रेलवे स्टेशन, कचहरी, थाना और बाजारों में टमटम की कतारें लगती थीं। उस समय वर्तमान झारखंड का साहिबगंज जिला, जो गंगा नदी के कारण रेल और व्यापार का प्रमुख केंद्र रहा, वहाँ टमटम का व्यापक प्रचलन था। साहिबगंज, राजमहल और आसपास के इलाकों में टमटम चालक न केवल सवारी ढोते थे, बल्कि खबरें, संदेश और सामान भी एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाते थे।
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*झारखंड की ग्रामीण संस्कृति में टमटम*
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झारखंड के आदिवासी और ग्रामीण समाज में टमटम केवल यातायात का साधन नहीं था, बल्कि शादी-ब्याह, मेले-ठेले और सामाजिक आयोजनों का अभिन्न हिस्सा रहा है। दूल्हे की बारात, देवी-देवताओं की शोभायात्रा और साप्ताहिक हाट, हर जगह टमटम की अहम भूमिका होती थी। साहिबगंज, पाकुड़, दुमका और गोड्डा जैसे जिलों में टमटम चलाना एक सम्मानजनक आजीविका मानी जाती थी।
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*सुविधा, सादगी और पर्यावरण मित्र साधन*
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टमटम की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि यह ईंधन-रहित, पर्यावरण मित्र और कम खर्चीला साधन था। खराब सड़कों और कीचड़ भरे रास्तों में भी यह आसानी से चल जाता था। न शोर, न प्रदूषण, बस केवल घोड़े की टापों की आवाजें।
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*तकनीक के आगे हारती परंपरा*
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समय बदला, सड़कें पक्की हुईं और तकनीक ने रफ्तार पकड़ी। मोटर वाहन, ऑटो और ई-रिक्शा के आगमन के साथ ही टमटम धीरे-धीरे हाशिए पर चला गया। घोड़े के रख-रखाव की बढ़ती लागत, सरकारी नियमों की अस्पष्टता और आधुनिक साधनों की सुविधा ने इस परंपरा को लगभग विलुप्त ही कर दिया।
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*आज का दृश्य एक चेतावनी*
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महेशपुर अंबेडकर चौक पर टमटम का सोमवार को दिखना केवल एक दृश्य नहीं, बल्कि एक संकेत और चेतावनी है कि हमारी सांस्कृतिक विरासत चुपचाप हमसे दूर होती जा रही है।
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*विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों की मांगें*
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विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों का मानना है कि सरकार को टमटम को सांस्कृतिक धरोहर का दर्जा देना चाहिए। पर्यटन स्थलों और मेलों में इसके उपयोग को प्रोत्साहित करना चाहिए। टमटम चालकों के लिए प्रशिक्षण व आर्थिक सहायता की योजना बनानी चाहिए। स्कूलों और संग्रहालयों में इसके इतिहास को स्थान देना चाहिए।
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*संरक्षण नहीं तो स्मृति में सिमट जाएगी परंपरा*
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अगर समय रहते टमटम जैसी परंपराओं का संरक्षण नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां इसे केवल किताबों और तस्वीरों में ही देख पाएंगी। सोमवार को अंबेडकर चौक पर टमटम का दिखना यह याद दिलाता है कि विकास के दौड़ में परंपरा को पूरी तरह कुचल देना भी विकास नहीं है। जरूरत है संतुलन की, जहां तकनीक के साथ-साथ इतिहास और संस्कृति भी जीवित रहे।
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*क्या कहते है जानकार*
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स्थानीय इतिहास के जानकार प्रो. अजय मंडल (सेवानिवृत्त शिक्षक, साहिबगंज) बताते हैं कि 1960–70 के दशक तक साहिबगंज, राजमहल और पाकुड़ क्षेत्र में टमटम आम परिवहन का साधन था। स्टेशन से बाजार और गांव तक जाने के लिए यही सबसे भरोसेमंद साधन माना जाता था।
महेशपुर के 75 वर्षीय बुजुर्ग रामचंद्र साह कहते हैं कि उनके जमाने में शादी-ब्याह में दूल्हा टमटम पर ही बैठकर जाता था। मेले में जाना हो या हाट, टमटम ही सहारा था। उस समय यह इज्जत की सवारी मानी जाती थी। पर्यावरणविद दीपक हेम्ब्रम का मानना है कि आज जब दुनिया प्रदूषण से जूझ रही है, टमटम जैसा साधन पूरी तरह ईंधन-रहित और पर्यावरण मित्र है। अगर इसे पर्यटन और सांस्कृतिक आयोजनों से जोड़ा जाए तो यह रोजगार का भी अच्छा माध्यम बन सकता है। महेशपुर के एक पूर्व टमटम चालक सलीम अंसारी बताते हैं कि पहले दिनभर में अच्छी कमाई हो जाती थी। लेकिन अब लोग जल्दी गंतव्य पर पहुंचना चाहते हैं। घोड़े का चारा महंगा है, रख रखाव मुश्किल है, इसलिए उन्होंने यह काम छोड़ दिया है। इसके अलावा पशु-चिकित्सा सुविधा की कमी, सरकारी प्रोत्साहन का अभाव और बढ़ती शहरीकरण की रफ्तार ने इस परंपरा को लगभग समाप्त कर दिया है। सामाजिक कार्यकर्ता मीना हांसदा कहती हैं कि सरकार अगर मेलों, पर्यटन स्थलों और ऐतिहासिक आयोजनों में टमटम को बढ़ावा दे तो यह परंपरा बच सकती है। इसे सांस्कृतिक धरोहर घोषित कर प्रशिक्षण और सब्सिडी दी जानी चाहिए।

10 से 25 फरवरी तक चलेगा फाइलेरिया उन्मूलन अभियान

आम जन रहें तैयार , स्वास्थ्य विभाग है पूर्ण तैयार

एक भी पात्र व्यक्ति दवा सेवन से न छूटे, अभियान को जन आंदोलन बनाने का आह्वान: सिविल सर्जन

पाकुड़ जिले में फाइलेरिया (हाथीपांव) जैसी गंभीर बीमारी के उन्मूलन को लेकर 10 फरवरी से 25 फरवरी 2026 तक मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एमडीए) अभियान चलाया जाएगा। इसकी जानकारी सिविल सर्जन डॉ. सुरेंद्र कुमार मिश्रा ने पुराने सदर अस्पताल परिसर में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दी। प्रेस कॉन्फ्रेंस में सिविल सर्जन डॉ. मिश्रा ने बताया कि अभियान के तहत लक्षित आयु वर्ग के सभी पात्र व्यक्तियों को फाइलेरिया रोधी दवा का सेवन कराना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि कोई भी लाभार्थी दवा सेवन से वंचित नहीं रहना चाहिए।
उन्होंने जेएसएलपीएस की सखी दीदी, सीएलएफ पदाधिकारियों एवं स्वास्थ्य कर्मियों की भूमिका को अहम बताते हुए कहा कि घर-घर संपर्क कर लोगों को जागरूक करना, भ्रांतियों को दूर करना और दवा सेवन सुनिश्चित करना उनकी प्रमुख जिम्मेदारी होगी। उन्होंने सभी से अभियान को जनभागीदारी से जोड़ते हुए इसे जन आंदोलन का रूप देने की अपील की।
सिविल सर्जन ने यह भी निर्देश दिया कि दवा खाली पेट न खिलाई जाए तथा दवा सेवन के दौरान सभी आवश्यक स्वास्थ्य मानकों का पालन किया जाए। उन्होंने कहा कि फाइलेरिया एक गंभीर बीमारी जरूर है, लेकिन समय पर और सामूहिक दवा सेवन से इसे पूरी तरह समाप्त किया जा सकता है।
उन्होंने बताया कि अभियान के दौरान बूथ स्तर पर विशेष दवा सेवन दिवस का आयोजन किया जाएगा और क्षेत्रवार निगरानी भी की जाएगी। बेहतर कार्य करने वाले समूहों और स्वास्थ्य कर्मियों को प्रोत्साहित किया जाएगा।

पत्थर के धूल बने आफ़त , बीमारियों की आशंका से लोग हलकान

*दिनरात अवैध पत्थर खनन और धूल उगलती क्रशरों की भारी कीमत चुका रहे हैं स्थानीय निवासी*

– पातालफोड़ खुदाई से स्थानीय लोगों में है दहशत

पाकुड़ (महेशपुर) : महेशपुर प्रखंड के शहरग्राम के अमलागाछी व नारायणटोला गांव के लोग दिनरात पत्थर खनन और धूल उगलती क्रशरों की भारी कीमत चुका रहे हैं। पत्थर उद्योग ने क्षेत्र के पर्यावरण और जन स्वास्थ्य पर ऐसी चोट की है, जिसकी भरपाई आसान नहीं है। इन खदानों से अवैध खनन लगातार जारी है, स्थानीय भाषा में इतनी गहरी खुदाई को पातालफोड़ खुदाई कहते हैं। इस तरह की खुदाई खान अधिनियम 1952 का खुला उल्लंघन है। अधिनियम कहता है कि खनन उच्चतम बिंदु से निम्नतम बिंदु के छह मीटर की गहराई तक ही हो सकता है। अधिनियम में खदान में 18 वर्ष से कम उम्र के मजदूर से काम कराना प्रतिबंधित है। साथ ही मजदूरों को काम के निश्चित घंटे, चेहरे को ढंकने के लिए मास्क, चिकित्सा सुविधा, समान मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने को कहा गया है। लेकिन पत्थर खदानों में इन प्रावधानों का पालन नहीं किया जा रहा है।
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*सड़क किनारे स्थित क्रशरों के धूलकण से लोग लगातार हो रहे हैं प्रभावित*
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पत्थर व्यवसायियों पर खनन विभाग मेहरबान है। क्षेत्र में अवैध खनन का धंधा भी फल-फूल रहा है। सड़क किनारे स्थित क्रशरों के धूलकण से लोग ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। क्रशर के मालिकों एवं कर्मियों के द्वारा नियम को ताक पर रखकर क्रशर संचालित किया जा रहा है। धूलकण के कारण मुख्य सड़क पर दिन में ही चारों ओर अंधेरा छा जाता है, जिस कारण राहगीर एवं स्थानीय लोग परेशान रहते हैं। धूलकण के कारण आए दिन छोटी-मोटी दुर्घटनाएं होती रहती है।
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*इस गोरख धंधा पर अंकुश लगाने में विभाग पूरी तरह से विफल*
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खनन विभाग की मिली भगत के चलते पत्थर खदान संचालकों की मनमानी अपने चरम पर है। सूत्रों की मानें तो खदान की आड़ में पत्थर के अवैध कारोबार बिना माइनिंग चालान एवं एक ही चलान पर कई बार ढुलाई कर हो रहा है। इस कारण सरकार को प्रतिमाह करोड़ों का चूना लग रहा है। लेकिन इस गोरख धंधे से जुड़े लोग रातों रात लखपति बन रहे हैं। विभाग इस गोरख धंधा पर अंकुश लगाने में पूरी तरह विफल रही है।
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*विभाग के संरक्षण में चल रहा है अवैध कारोबार – सूत्र*
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सूत्रों की माने तो अवैध कारोबार में विभाग को एक मोटी रकम पहुंचाई जाती है, जिस कारण नियमों को ताक पर रखकर क्रशर संचालन किए जा रहे हैं।

प्रखंड परिसर में ही हो रहा अंधेर , हर ओर क्यूँ है चुप्पी

*चिराग तले अंधेरा कहावत को चरितार्थ करता प्रखंड कार्यालय परिसर में घटिया ईंटों से बाउंड्री वॉल निर्माण*

– गुणवत्ता व पारदर्शिता पर उठे सवाल

पाकुड़ (हिरणपुर) : हिरणपुर प्रखंड कार्यालय परिसर में चल रहे बाउंड्री वॉल निर्माण कार्य में गंभीर अनियमितता का मामला सामने आया है। निर्माण कार्य में प्रयुक्त ईंटों की गुणवत्ता अत्यंत निम्न स्तर की बताई जा रही है। स्थानीय लोगों के अनुसार, बाउंड्री वॉल के निर्माण में तीन नंबर (घटिया) ईंटों का उपयोग किया जा रहा है, जो मानक के अनुरूप नहीं है। निर्माण स्थल पर कार्य कर रहे मिस्त्री से जब ईंटों की गुणवत्ता के संबंध में पूछताछ की गई तो उसने स्वयं स्वीकार किया कि कार्य में घटिया किस्म की ईंटें लगाई जा रही है। देखने मात्र से ही स्पष्ट प्रतीत होता है कि प्रयुक्त ईंटें कमजोर और निम्न गुणवत्ता की है, जिससे निर्माण की मजबूती पर गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं।
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*चिराग तले अंधेरा*
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चिंताजनक बात यह है कि यह निर्माण कार्य हिरणपुर प्रखंड कार्यालय परिसर में ही हो रहा है। जब सरकारी कार्यालय के समीप इस प्रकार का घटिया कार्य किया जा रहा है, तो दूर-दराज के इलाकों में चल रहे सरकारी योजनाओं की स्थिति क्या होगी, यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।
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*योजनास्थल से सूचना पट्ट भी नदारद*
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नियमों के अनुसार किसी भी सरकारी योजना के अंतर्गत कार्य प्रारंभ करने से पूर्व योजना संबंधी सूचना पट्ट लगाया जाना अनिवार्य होता है, जिसमें योजना का नाम, प्राक्कलित राशि, कार्य अवधि एवं संवेदक का नाम अंकित रहता है। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से उक्त निर्माण स्थल पर कोई सूचना पट्ट भी नहीं लगाया गया है, जिससे कार्य की पारदर्शिता पर भी सवाल उठ रहा है। घटिया ईंटों से निर्मित बाउंड्री वॉल की टिकाऊ क्षमता संदिग्ध मानी जा रही है। यदि समय रहते इसकी जांच नहीं हुई, तो भविष्य में समय से पहले ही दीवार के क्षतिग्रस्त होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, जिससे सरकारी धन की बर्बादी के साथ-साथ सुरक्षा का भी खतरा उत्पन्न हो सकता है। स्थानीय लोगों ने मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है तथा दोषी संवेदक और संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई की अपेक्षा जताई है। यह मामला न केवल निर्माण गुणवत्ता से जुड़ा है, बल्कि सरकारी योजनाओं में व्याप्त संभावित भ्रष्टाचार की ओर भी इशारा करता है।

महेशपुर के दमदमा में सरकारी स्वास्थ्य भवन बना निजी आवास

*सरकारी अस्पताल बना निजी आवास! दमदमा में 3 साल से उप स्वास्थ्य केंद्र पर एक परिवार का कब्जा*

– मुखिया के आदेश पर खड़े हुए बड़े सवाल

– उक्त गांव या आसपास नहीं है कोई भी सरकारी स्वास्थ्य केंद्र

पाकुड़ (महेशपुर) : महेशपुर प्रखंड के दमदमा गांव में सरकारी व्यवस्था की बड़ी लापरवाही सामने आई है। गांव का एकमात्र उप स्वास्थ्य केंद्र, जहां ग्रामीणों को प्राथमिक इलाज मिलना चाहिए था, वह पिछले करीब तीन वर्षों से एक परिवार का निजी आवास बना हुआ है। चौंकाने वाली बात यह है कि पंचायत के मुखिया द्वारा दिए गए बिना किसी तारीख के एक लिखित कागज के आधार पर यह व्यवस्था की गई है। अब इस पूरे मामले ने पंचायत अधिकार, सरकारी नियम और ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

कैसे शुरू हुई कहानी

प्राप्त जानकारी के अनुसार, दमदमा गांव निवासी रीना बीवी के पति का निधन हो जाने के बाद वह रहने के लिए जगह की तलाश में थी। इसी दौरान वह गांव में बने उप स्वास्थ्य केंद्र में रहने लगी। बताया जा रहा है कि यह उप स्वास्थ्य केंद्र करीब 16 वर्ष पूर्व बना था, लेकिन तब से बंद पड़ा है। रीना बीवी ने बाद में दूसरी शादी कर ली। वर्तमान में वह अपने मौजूदा पति आजीबुल शेख के साथ उसी उप स्वास्थ्य केंद्र भवन में रह रही है। भवन के अंदर खाना बनाने से लेकर सोने तक की पूरी व्यवस्था कर ली गई है और घरेलू सामान भी रखा गया है।

मुखिया के बिना तारीख के आदेश पर मिला आश्रय

रीना बीवी का कहना है कि रहने के बाद वह पंचायत के मुखिया अनिल कोड़ा के पास गई थी, जहां से उन्हें एक लिखित कागज दिया गया। उक्त आवेदन की प्रति उपलब्ध है, जिसमें यह उल्लेख है कि रीना बीवी के परिवार द्वारा पूर्व में उक्त जमीन दान में दी गई थी। हालांकि, मुखिया द्वारा दिए गए कागज में यह स्पष्ट नहीं है कि परिवार कब से वहां रह रहा है, कितने समय तक रहने की अनुमति है, या घर निर्माण की स्थिति क्या है। आवेदन में किसी प्रकार की तारीख का उल्लेख भी नहीं है, जिससे पूरे प्रकरण की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे है।

जल्द खाली कराया जाएगा अस्पताल भवन – मुखिया

इस संबंध में जब मुखिया अनिल कोड़ा से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उन्हें जल्द ही भवन खाली करने का आदेश दिया जाएगा। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब मामला तीन साल पुराना बताया जा रहा है, तो अब तक कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की गई।

इस बाबत कोई जानकारी ही नहीं है – चिकित्सा पदाधिकारी

इस संदर्भ में महेशपुर चिकित्सा पदाधिकारी सुनील कुमार किस्कू से बात किया गया, तो उन्होंने कहा कि इसकी उन्हें जानकारी नहीं है। यहाँ पर यह सोचनीय है कि जो डॉ महेशपुर में वर्षों से पदस्थापित हैं, उन्हें इस मामले की जानकारी ही नहीं है, जो काफी चिंताजनक है।

घर तैयार या गुमराह करने की कोशिश

रीना बीवी का दावा है कि अब उनका घर बनकर तैयार हो गया है और वे जल्द ही उप स्वास्थ्य केंद्र खाली कर देंगी। हालांकि यह भी आशंका जताई जा रही है कि कहीं दूसरे के घर को अपना बताकर प्रशासन और ग्रामीणों को गुमराह तो नहीं किया जा रहा है। इस संबंध में आधिकारिक सत्यापन अब तक नहीं हुआ है।
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*बड़ा सवाल : क्या मुखिया को है यह अधिकार*
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बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी पंचायत प्रतिनिधि को सरकारी स्वास्थ्य भवन में किसी को रहने देने की अनुमति देने का अधिकार है । यदि भवन बंद भी पड़ा था, तब भी वह सरकारी संपत्ति है। ऐसे में बिना सक्षम प्रशासनिक आदेश के किसी परिवार को वहां रहने देना नियमों के विरुद्ध माना जा सकता है।

जांच की उठी मांग

ग्रामीणों के बीच इस मामले को लेकर चर्चा तेज है। लोगों का कहना है कि यदि उप स्वास्थ्य केंद्र वर्षों से बंद है तो उसे चालू कराने की पहल होनी चाहिए थी, न कि उसे निजी आवास में बदल दिया जाए। मामले की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार पदाधिकारियों पर कारवाई की मांग उठने लगी है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस पूरे प्रकरण पर क्या रुख अपनाता है। क्या सरकारी भवन खाली कराया जाएगा या फिर यह मामला कागजों तक ही सिमट कर रह जाएगा।

गांव में नहीं है कोई स्वास्थ्य सुविधा

बताते चलें कि दमदमा गांव और आसपास के टोले में वर्तमान में कोई भी संचालित स्वास्थ्य केंद्र नहीं है। छोटी मोटी बीमारी, गर्भवती महिलाओं की जांच, टीकाकरण या आपात स्थिति में ग्रामीणों को कई किलोमीटर दूर दूसरे गांव या प्रखंड मुख्यालय जाना पड़ता है। बरसात के दिनों में रास्ता खराब होने से मरीजों को भारी परेशानी होती है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि उप स्वास्थ्य केंद्र चालू होता तो गांव को बड़ी राहत मिलती। ऐसे में जिस भवन को स्वास्थ्य सेवा का केंद्र बनना था, उसे निजी आवास में तब्दील हो जाना काफी खेदजनक है।

क्या कहते हैं सरकारी नियम

सरकारी भवन (विशेषकर स्वास्थ्य विभाग की संपत्ति) का उपयोग केवल निर्धारित सरकारी कार्यों के लिए किया जा सकता है। बिना सक्षम प्राधिकारी (जैसे सिविल सर्जन, स्वास्थ्य विभाग या अंचल प्रशासन) की अनुमति के किसी भी व्यक्ति को आवासीय उपयोग की अनुमति देना नियमों के विरुद्ध है। पंचायत प्रतिनिधि को सरकारी स्वास्थ्य भवन को निजी आवास के रूप में आवंटित करने का अधिकार नहीं होता है। सरकारी संपत्ति पर अनधिकृत कब्जा या उपयोग प्रशासनिक और कानूनी कार्रवाई के दायरे में आता है। यदि जमीन दान में दी गई थी, तब भी भवन निर्माण के बाद वह स्वास्थ्य विभाग की संपत्ति है।