Thursday, February 5, 2026
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*कोयला परिवहन से चौपट होती खेती, प्रदूषण और दुघर्टना के खिलाफ चलेगा अभियान – सीपीएम*

* *16 अगस्त से 31 अगस्त तक स्थानीय ज्वलंत मुद्दों को चिन्हित कर 1 से 15 सितंबर के बीच प्रखंड कार्यालयो पर होगा धरना – प्रदर्शन*

*दिशोम गुरु शिबू सोरेन को श्रद्धांजलि दी गयी*
* पाकुड़ 11 अगस्त, 2025
सी पी एम जिला सचिव गोपीन सोरेन ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि , पाकुड़ जिले में कोयला खनन के लिए जो कोल ब्लाक आवंटित किए गए हैं. वहां इन कोल कंपनियों द्वारा यहां आदिवासियों और अन्य गरीबों की जमीन की रक्षा के लिए बने संताल परगना काश्तकारी कानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए स्थानीय दलालों के माध्यम से रैयतों के जमीन की लूट जारी रखे हुए हैं. अमरा पाड़ा के पचुआडा कोल ब्लाक के समीप बसे गांवों में इनका इतना आतंक है कि आम आदिवासी रैयत कंपनी के खिलाफ मुंह तक नहीं खोलते हैं. दुसरी ओर कोयला खनन करने वाली इन कंपनियों
द्वारा किए गए एमओयू में जो वादे किए गए थे वे केवल कागजी रह गए हैं. जिससे यहां कई समस्याएं पैदा हो रही है. कोयला कंपनियों द्वारा कोयले का उत्खनन करने के बाद उसके परिवहन सेे कई समस्याओं से यहां के ग्रामीणों को जूझना पड़ रहा है. . आमरा पाड़ा के ओपेन कास्ट कोयला खानों से कोयला निकाल कर निजी कंपनियों द्वारा बड़े – बड़े बड़े डंपर /हाइवा वाहनों से कोयला दुमका और पाकुड़ के डम्पिंग यार्ड तक संडक मार्ग से भेजा जाता है. कोयला के परिवहन में सैकड़ों वाहन कोयले की धुल उड़ाते हुए राजमार्ग से गुजरते हैं जिसके चलते भारी प्रदूषण हो रहा है और कभी हरा भरा दिखने वाला यह इलाका कोयले के काले डस्ट से रोड के किनारे बसे गांवों को अपने आगोश में ले लिया है. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा कोयले को ढंक कर ले जाने और रास्ते में पानी का छिड़काव करने का दिशानिर्देश केवल कागजों तक सीमित रह गया है. इस प्रदूषण के कारण यहां का पर्यावरण संतुलन भी नष्ट होता जा रहा है.कोयला परिवहन से उड़ने वाली काले गर्द के उड़ने से वातावरण में कोयले के महीन कणों की मौजूदगी से लोगों को श्वांस की बीमारी हो रही है. इसके अलावा अनियंत्रित बड़े वाहनों के परिचालन से रोज दुघर्टनाएं भी होती हैं. कोयला की ढुलाई से रोड के दोनों ओर के आधा – आधा किलोमीटर के किनारे की खेती भी धूल कणों के खेत की मिट्टी में जम जाने से चौपट हो रही है.
इस ज्वलंत मुद्दे पर आज सीपीएम की पाकुड़ जिला सचिवमंडल की विस्तारित बैठक मे गहन चर्चा कर इस मुद्दे पर प्रचार अभियान संगठित किए जाने के लिए एक कार्ययोजना बनायी गयी. बैठक को रांची से आए पार्टी के राज्य सचिव प्रकाश विप्लव, झारखंड राज्य किसान सभा के महासचिव सुरजीत सिन्हा और जिला सचिव गोपीन सोरेन किसान सभा के जिला संयोजक सैफुद्दीन शेख, आदिवासी अधिकार मंच के हुडिंग सोरेन, रिजाउल करीम, सीटू के देवाषीश दत्ता गुप्ता जनवादी महिला समिति की मुकुल, आर. पी. पासवान, मो. नादेर हुसैन समेत पार्टी और जनसंगठनों के प्रतिनिधियों ने संबोधित किया. बैठक की अध्यक्षता प्रो. शिबानी पाल ने की बैठक में अमरापाडा, लिटटीपाडा, हिरणपुर, महेशपुर और पाकुडिया लोकल कमिटी के सचिव भी शामिल थे.

एक महत्वपूर्ण देश के शक्तिशाली मुखिया का बचकाना और अमान्य हास्यास्पद बयान , जो विश्व को अमान्य है।

विश्व मंच और डोनाल्ड ट्रंप

हाल के दिनों में , विश्व के सर्वाधिक शक्ति शाली देश के शक्तिशाली नेता का बयान आया । यह बयान शक्तिशाली देश भारत की अर्थव्यवस्था के संदर्भ में आया । यह हास्यास्पद बयान विश्व के शक्तिशाली,एक नेता का हो सकता है ,विश्वास करने योग्य नहीं है । भारत की अर्थव्यवस्था को मृत बोला गया।
अब अर्थशास्त्र और राजनीति अथवा अंत राष्ट्रीय वातावरण का बहुत ज्ञान नहीं रखने वाला व्यक्ति भी ट्रंप के बयान को बचकाना कह सकता है ।
निसंदेह ट्रंप और मोदी जी में तुलना ठीक नहीं ।होना भी नहीं चाहिए ।इसमें कोई संदेह नहीं कि ट्रंप ने पुरुषार्थ कर एक बड़ा साम्राज्य खड़ा कर दिया है ।पर पुरुषार्थ से वो वह अर्जित नहीं कर पाए ,जो भारत कर पाया ।
भारत धर्म,अर्थ काम और मोक्ष की बात करता है ।पर ,ट्रंप के लिए धर्म और मोक्ष कोई मायने नहीं रखता होगा ,पर मोदी जी ,भारत को आत्मसात् किए है,इसलिए ये शांत ,संतुलित और निरंतर शारीरिक और मानसिक रूप से दृढ़ हैं।
पुरुषार्थ हमे अंतर्मुखी होना सिखाता है ,पर ट्रंप के लिए यह कुछ और है ।
मागा का नारा देकर सत्ता में आए ट्रंप अब विचलित सा व्यवहार कर रहे है।
एक समय था जब बड़ी से बड़ी बातें सचिव स्तर के या विदेश मंत्रालय कहते थे ,पर अब छोटी से छोटी बातें स्वयं राष्ट्रपति कहतें हैं।
यह शायद बड़ा बदलाव है जो कही न कही अमेरिका को कमजोर करता है।
देह की एक सीमा है।दिमाग तो देह पर निर्भर करता है।उम्र भी कोई चीज होती है ।
भारत के दर्शन और परंपरा का आप अनुकीर्तन करते है तो सौ वर्षों तक और उससे भी अधिक वर्षो तक दोनों ही स्तर पर स्वस्थ रह सकते है। पर ,अन्य देशों की जीवन शैली पर भी निर्भर करता है।
डोनाल्ड साहब और मस्क का प्रकरण, एपल के सी ई ओ को भारत में निर्माण करने के लिए धमकी हो या फुलवामा और टैरिफ , प्रत्येक मामला बहुत कुछ कहता है।रूस से तेल खरीदना हो या अब पाकिस्तान भारत को तेल देगा जैसी बातों पर लोग हास परिहास कर रहे हैं।
भारत शास्त्री जी के कार्यकाल को नहीं भूला है।
परमाणु परीक्षण पर अमेरिकी रवैए को नहीं भूला है और चाइना के धोखे को भी नहीं भूला है।
अगर कोई समर्थ देश इस तरह परेशान है तो समझना चाहिए कि भारत ऊंचाई पर जा रहा है ।आर्थिक रूप से लगातार मजबूत कर रहा है।
कोरोना महा मारी के मार से निकल कर , वैश्विक मंदी में भी स्थिर रहकर अपने को मजबूत रखा ।
जहां तक पाकिस्तान से तेल लेने की बात है तो भारत बैठा नहीं है ,वैकल्पिक ऊर्जा में भारत अव्वल आने वाला है।
हम ऐसा काम कर रहे है कि पेट्रोल की जरूरत ही हमें न हो ।
ट्रंप साहब फैसला लीजिए ,पर अपने पद का बोध लेकर और अगर भारत के बारे में ,तो भारत बोध होना आवश्यक है।
जहां तक दोस्ती की बात है तो हमारा दर्शन है ,हमारा ध्येय है “वसुंधरा परिवार हमारा”।

डॉ संजय
अगस्त 04 /25
श्रावण शुक्ल पक्ष , दशमी,सोमवार

एक थे जनरल मानेकशॉ , जैसा शायद ही कोई हो सकता !

*फील्ड मार्शल का ड्राइवर*

जैसा कि हम जानते हैं, ये ड्राइवर आर्मी हेडक्वार्टर्स की ट्रांसपोर्ट कंपनी, धौला कुआँ, दिल्ली से चयनित आर्मी सर्विस कोर के सिपाही होते हैं।

स्वाभाविक है कि सेना प्रमुख (Army Chief) के पास अपनी सरकारी ड्यूटी के लिए एक से अधिक ड्राइवर रहे होंगे। सभी सेवा में लगे सैनिकों की तरह, ड्राइवर को भी हर साल छुट्टी लेने का अधिकार होता है। ऐसे ही एक ड्राइवर थे हरियाणा के निवासी हविलदार श्याम सिंह।

एक दिन जनरल सैम मानेकशॉ, नॉर्थ ब्लॉक में एक बैठक से हँसते हुए बाहर निकले। ड्राइवर, सख्त सावधान की मुद्रा में खड़ा था और उसने तुरंत गाड़ी का दरवाजा खोल दिया। अप्रैल का महीना था – एक सुखद, नरम धूप और हल्की हवा वाला दिन।

“तुम्हें पता है श्याम सिंह,” जनरल ने हँसते हुए कहा, “आज रक्षामंत्री ने मेरा नाम ही बदल दिया। मुझे श्याम कहकर बोले – श्याम, मान भी जाओ।”

जनरल मानेकशॉ का इशारा रक्षामंत्री बाबू जगजीवन राम की उस विनती की ओर था, जो प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के कहने पर पूर्वी पाकिस्तान पर अप्रैल में हमले के लिए की गई थी। सैम ने यह कहकर मना कर दिया था कि अगर अप्रैल में हमला हुआ तो भारत को 100% हार मिलेगी।

“वैसे श्याम और सैम में ज्यादा फर्क नहीं है – बस एक H और Y का ही तो खेल है,” जनरल ने मुस्कुरा कर कहा।

जब युद्ध समाप्त हो गया और जनरल मानेकशॉ के रिटायरमेंट की तारीख नजदीक आने लगी, उन्होंने देखा कि श्याम सिंह कुछ असामान्य रूप से तनावग्रस्त रहने लगे हैं। उनके चेहरे पर बेचैनी साफ झलक रही थी, जो जनरल ने तुरंत भांप ली।

“क्या बात है श्याम सिंह, इन दिनों तुम्हारा चेहरा ऐसा लग रहा है जैसे तुम्हारे घर की भैंस ने दूध देना बंद कर दिया हो?”

“नहीं साहब, वो बात नहीं है,” और फिर वह कुछ और बोले बिना चुप हो गए।

दिन बीतते गए और रिटायरमेंट का समय करीब आता गया। एक दिन श्याम सिंह ने जनरल से कहा:

“साहब, एक निवेदन है जो सिर्फ आप ही पूरा कर सकते हैं।”

“हाँ, बोलो श्याम सिंह।”

“साहब, मैं समय से पहले सेवा से निवृत्त होना चाहता हूँ। कृपया मेरी छुट्टी की सिफारिश करें।”

“लेकिन बात क्या है? कोई ज़मीन-जायदाद का मुकदमा है या पारिवारिक परेशानी? तुम अपनी पूरी सेवा पूरी करो। मैं तुम्हें नायब सूबेदार बनवा दूँगा, लेकिन सेवा मत छोड़ो,” जनरल ने समझाया।

“नहीं साहब, बात कुछ और है, लेकिन मैं वह तब तक नहीं बता सकता जब तक सेवा से मुक्त नहीं हो जाता।”

जनरल ने उसकी साफगोई और इज़्ज़त की भावना को समझा और आवश्यक कार्रवाई कर दी। जब ड्राइवर की रिहाई के आदेश आ गए, जनरल ने फिर पूछा:

“अब तो खुश हो? अब बताओ क्यों जल्दी रिटायर हो रहे हो?”

ड्राइवर सावधान मुद्रा में खड़ा हो गया और बोला:

“साहब, आपकी गाड़ी चलाने के बाद मैं किसी और की गाड़ी नहीं चला सकता। यही मेरे जीवन का सबसे बड़ा सम्मान था। मैं इसी इज़्ज़त के साथ घर जाना चाहता हूँ।”

फील्ड मार्शल हँसे और बोले:

“तू बहुत बड़ा बेवकूफ है! तुम हरियाणवी लोग भी ना – एकदम ज़िद्दी और पक्के!”

लेकिन अब जब छुट्टी के काग़ज़ बन चुके थे, कुछ नहीं किया जा सकता था। वह तो ठेठ हरियाणवी था – जो मन में ठान ले, फिर पीछे नहीं हटता।

फिर भी जनरल ने एक दिन उससे पूछा:

“रिटायरमेंट के बाद क्या करेगा?”

“कुछ न कुछ कर लूंगा साहब, कोई नौकरी ढूंढ़ लूंगा।”

“तुम्हारे पास खेती की ज़मीन कितनी है?”

“कुछ भी नहीं साहब, मैं तो गरीब परिवार से हूँ।”

जनरल सन्न रह गए। एक निर्धन व्यक्ति, जिसने सिर्फ इसलिए नौकरी छोड़ दी क्योंकि वह किसी और की गाड़ी नहीं चला सकता था।

जिस दिन ड्राइवर विदा हुआ, सैम मानेकशॉ ने उसे एक लिफाफा दिया।

“श्याम सिंह, इसे घर जाकर ही खोलना।”

“जी साहब।” ड्राइवर ने सलाम किया और चला गया।

घर पहुँचकर वह नौकरी ढूँढ़ने में व्यस्त हो गया और लिफाफा भूल ही गया। एक दिन उसे माल ढोने वाले ट्रक की ड्राइवरी का काम मिल गया। फिर एक दिन उसकी पत्नी बोली:

“मैं तुम्हारी आर्मी की वर्दी संदूक में रख रही थी, ये लिफाफा तुम्हारी जेब में मिला।”

“अरे, इसे तो मैं भूल ही गया था। मैंने इसे नहीं खोला क्योंकि मुझे ज्यादा पढ़ना-लिखना नहीं आता। साहब ने शायद मुझे एक प्रशंसा पत्र दिया होगा, जैसे बड़े अफसर देते हैं।”

“फिर भी, इसे खोलो और स्कूल मास्टरजी से पढ़वा लो, मैं जानना चाहती हूँ इसमें क्या है।”

तो दोनों पति-पत्नी गाँव के स्कूल गए और हेडमास्टर से निवेदन किया कि वह पत्र पढ़कर सुनाएँ।

मास्टरजी ने चश्मा पहना, लिफाफा खोला और काग़ज़ को देखकर चुपचाप रह गए।

“क्या हुआ मास्टरजी, ऐसे क्या देख रहे हैं?” श्याम सिंह ने पूछा।

“क्या तुम्हें पता है ये क्या है?”

“नहीं साहब।”

“यह एक हस्तांतरण पत्र (transfer deed) है। 1971 की जीत के बाद हरियाणा सरकार ने फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ को 25 एकड़ ज़मीन युद्ध जागीर के रूप में दी थी। उन्होंने वह सारी ज़मीन तुम्हारे नाम कर दी है। अब तुम 25 एकड़ के मालिक हो।”

यह सुनकर पत्नी ने गुस्से में पति को डाँटा:

“तू तो पूरा बेवकूफ निकला! मैं तो इस लिफाफे को चूल्हा जलाने के लिए जलाने ही वाली थी! भगवान का शुक्र है मैंने पहले पूछ लिया। तू तो सबसे बड़ा मूर्ख है!”

इस तरह यह कहानी है महान जनरल सैम मानेकशॉ की – जिन्होंने अपनी युद्ध जागीर सोनीपत के पास अपने ड्राइवर को दे दी और अपनी फील्ड मार्शल की पेंशन आर्मी विडोज़ वेलफेयर फंड को दान कर दी।

*क्या कोई उनके बराबर आ सकता है⁉️*

🇮🇳🇮🇳🇮🇳

“साभार।”

गुरुजी स्वर्गीय शिबू सोरेन के व्यक्तित्व की छवि मानो हेमन्त में उतर सी गई हो

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स्वर्गीय दिसोम गुरु शिबू सोरेन भौतिक शरीर में हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनकी अमिट छवि एक संस्मरण बन हमारे बीच जीवनपर्यंत रहेगा। ऐसे तो सैकड़ों बार उनसे मिल चुका हूँ, लेकिन एक पत्रकार होने के नाते तीन बार उनके साक्षात्कार के लिए अकेले में भीड़ से अलग मिला, पर एक बार भी साक्षात्कार सूट नहीं कर सका। जब कभी उनसे मिला, कभी लगा ही नहीं कि किसी राजनेता से मिल रहा हूँ। ऐसा लगा जैसे किसी आध्यात्मिक गुरु के सामने बैठा हूँ, और इनसे राजनैतिक सवाल क्या करना। हर बार उनसे बातचीत कर आशीर्वाद ले वापस आ गया। एक आश्चर्यजनक ओज और सादगी के बीच ऐसा कभी मुझे लगा ही नहीं कि इस व्यक्ति ने कभी कानून और सरकार के विरुद्ध उग्र विद्रोह किया होगा, और पुलिस इन्हें ढूंढती रही होगी।

क्योंकि उनकी बातों में कहीं विद्रोही की महक नहीं आती थी, बस अन्याय के विरोध की सुगंध के साथ प्रकृति तथा आदिवासियों की संस्कृति की सुरक्षा की बात रहती थी। बाबा शिबू सोरेन की बात करना एक ऐसी अनुभूति दे जाता कि वहाँ मैं पत्रकारिता भूल जाता, और उनकी बातों में डूब जाता था।

एक बार पाकुड़ के पनेम कोल ब्लॉक के सर्वेसर्वा पूज्य स्वर्गीय डी एन शरण से बातचीत में सुना था कि बाबा शिबू सोरेन ने एकबार झारखंड के कहीं दूसरे जगह उनसे कहा था, कि एक बात हमेशा याद रखें कि खनिजों पर सरकार का अधिकार होता है कानूनन, लेकिन जमीन आदिवासियों तथा प्रकृति की है। खनिज निकालने के बाद उसे समतल कर प्रकृति को वैसे ही आदिवासियों के द्वारा सौंप दें जैसा खनिज निकालने के लिए लिया था। वरना प्रकृति अपना बदला लेगी।

आज जो विभिन्न राज्यों में प्राकृतिक आपदा दिख रही है, उससे लगता है, शिबू सोरेन बाबा कितने दूरदर्शी थे।
शरण साहब से दिसोम गुरु बाबा के विषय में और भी बहुत कुछ सुना था। एक ऐसी छवि मेरे मस्तिष्क में दिसोम गुरु की बन गई थी कि उनसे राजनैतिक सवाल पूछने के लिए मेरा कभी मुँह ही नहीं खुला।
जब भी उनसे बात हुई अलग राज्य और आदिवासियों के हित की झलक उनकी बातों से बिखरती थीं।

उनका कहना था, अलग राज्य बनेगा, आदिवासी चुनाव जीत कर आएँगे, सरकार बनाएँगे, चलाएँगे तभी तो आदिवासी सशक्त होंगे। नई नई चीज सीखेंगे, और दुनियाँ के साथ कदम मिलाकर चलेंगे।

वे कहते थे, मैंनें महाजनों का उग्र विरोध कर आंदोलन किया, कि आदिवासी अन्याय के विरुद्ध मौन न रह उसका विरोध करे। मैंनें अपने हक़ के लिए उन्हें जगाने का प्रयास किया। उन्होंने कई बार कहा था, जब आंदोलन की जरूरत थी किया, जब अलग राज्य के लिए राजनीति की जरुरत थी, वह भी किया। उद्देश्य सिर्फ झारखंड और यहाँ के निवासियों आदिवासियों के कल्याण से जुड़ा था।

गुरुजी सबसे मिलते थे, कभी लगा ही नहीं कि आंदोलन की ताप में खरा सोना बनकर निकला यह अमूल्य धरोहर आम जनता से अलग है। सबसे घुल जाने की उनकी वही प्रबृत्ति आज नेमरा में हेमन्त सोरेन में दिख रही है। वहाँ सहजता के साथ सगे सम्बंधियों और नेमरा की आम जनता के बीच वे बिलकुल गुरुजी की छवि बिखेर रहे हैं।
विधिवत श्राद्धकर्म में लगे हेमन्त सोरेन भी आज मुझे उसी तरह व्यक्तिगत रूप से प्रभावित कर रहे हैं, मानो गुरुजी की छवि उनमें उतर गई हो …..

*माननीय राज्यपाल श्री संतोष कुमार गंगवार नेमरा पहुंचे।*

*★ माननीय राज्यपाल ने झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं राज्यसभा सांसद दिशोम गुरु स्मृति -शेष शिबू सोरेन जी की तस्वीर पर पुष्प अर्पित कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी।*

*माननीय राज्यपाल श्री संतोष कुमार गंगवार आज माननीय मुख्यमंत्री श्री हेमन्त सोरेन के रामगढ़, नेमरा स्थित पैतृक आवास पहुंचकर पूर्व मुख्यमंत्री एवं राज्यसभा सांसद दिशोम गुरु स्मृति -शेष शिबू सोरेन जी की तस्वीर पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी। माननीय राज्यपाल श्री संतोष कुमार गंगवार ने ईश्वर से दिवंगत शिबू सोरेन जी को अपने श्रीचरणों में स्थान देने,उनकी आत्मा की शांति एवं शोकाकुल परिजनों को इस विकट दुःख को सहन करने का संबल प्रदान करने की प्रार्थना की। माननीय राज्यपाल श्री संतोष कुमार गंगवार ने माननीय मुख्यमंत्री श्री हेमन्त सोरेन एवं उनके परिजनों से मुलाकात कर गहरी संवेदना प्रकट की तथा उनका ढांढ़स बंधाते हुए कहा कि दुःख की इस घड़ी में हम सभी उनके साथ हैं।*
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*#Team PRD(CMO)*

*दिशोम गुरुजी का जाना झारखंड के लिए गहरा आघात उनकी क्षतिपूर्ति संभव नहीं , एक जीवन जो प्रेरणा था, मानो आसमान में खो गया : शाहिद इक़बाल*

*मिट्टी का ऋण कभी खत्म नहीं होता और गुरुजी शिबू सोरेन इस मिट्टी की आवाज थे: *

पाकुड़: झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री राज्यसभा सांसद झारखंड के निर्माता दिशोम गुरु श्री शिबू सोरेन के निधन पर झामुमो पूर्व केंद्रीय समिति सदस्य शाहिद इक़बाल ने गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए शाहिद इक़बाल ने कहा कि हम सबों के बीच से गुरुजी का जाना गहरा आघात है। उनके निधन से हुई क्षति का पूर्ति कर पाना संभव नहीं है।
उन्होंने कहा गुरुजी ने अपना सब कुछ न्योछावर कर झारखंड अलग राज्य की लड़ाई लड़ी।
अंततः इस लड़ाई में उनकी जीत हुई। आज उन्हीं के दम पर झारखंड राज्य खड़ा है। उनके निधन से देश ने महान क्रांतिकारी नेता खो दिया है। दिशोम गुरु ने लड़कर झारखंड राज्य लिया है।
झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना एक जनआंदोलन की उपज थी। उनके नेतृत्व में बड़ी संख्या में नौजवान, आदिवासी, अल्पसंख्यक, किसान, छात्र,छात्राएं इस आंदोलन से जुड़ते गए। साल 2000 में झारखंड अगल राज्य बना तो यह दिशोम गुरुजी की तपस्या का फल था। वह आदिवासी अस्मिता के सबसे सशक्त प्रहरी, पीड़ितों की सबसे मुखर आवाज और मजदूरों के लिए अनथक लड़ने वाले सेनानी थे।
झारखंड में बहुत ही खालीपन का एहसास हो रहा है। मिट्टी का ऋण कभी खत्म नहीं होता और शिबू सोरेन इस मिट्टी की आवाज थे।
दिशोम गुरुजी का निधन से झारखंड को जो क्षति हुई है उनका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता है। ईश्वर अपने चरणों मे उन्हें स्थान दें।

*जन आंदोलन की आग, न्याय की जीत — 28 जुलाई 2025 को समाप्त हुआ 9 वर्षों का संघर्ष* अनन्त

“जनता की आवाज़ बनने का दर्द क्या होता है, यह वही समझ सकता है जो उसके हक़ और हक़ीक़त के लिए सड़कों पर उतरता है, आवाज़ उठाता है, और फिर सिस्टम से टकराता है।”

01 सितंबर 2016 का दिन साहिबगंज जिले के बड़हरवा प्रखंड के इतिहास में एक ऐसा दिन बन गया, जो आने वाले कई वर्षों तक संघर्ष, अन्याय और अंततः न्याय का प्रतीक बन गया। उस दिन, जनसमस्याओं को लेकर दो जनप्रतिनिधि — अनंत तिवारी (जो उस समय भाजपा किसान मोर्चा के साहिबगंज जिला अध्यक्ष थे) और जोहन मुर्मू (तत्कालीन जिला परिषद सदस्य) — के नेतृत्व में एक विशाल जनआंदोलन का आयोजन किया गया था।

जब जनता का सब्र टूटा

बड़हरवा प्रखंड कार्यालय के सामने हजारों की भीड़ जुटी थी। नारे लग रहे थे — पानी, बिजली, सड़क, स्वास्थ्य, और सरकारी योजनाओं के भ्रष्टाचार के खिलाफ। यह कोई राजनीतिक ड्रामा नहीं था, बल्कि आम जनता की पीड़ा का विस्फोट था। लेकिन कहते हैं कि जब आवाज़ें ऊँची होती हैं, तो सत्ता बौखला जाती है।

धरना शांतिपूर्ण ढंग से शुरू हुआ था, पर जैसे-जैसे प्रशासन की ओर से अनदेखी हुई, लोगों का गुस्सा बढ़ता गया। तत्कालीन बीडीओ सदानंद महतो और अन्य प्रखंड पदाधिकारियों के खिलाफ जनता की नाराजगी इस कदर फूटी कि बेकाबू भीड़ ने कार्यालय का गेट तोड़ दिया और हल्की तोड़फोड़ की घटनाएं घटित हुईं।

हालांकि आंदोलनकारियों — अनंत तिवारी और जोहन मुर्मू — ने मंच से लगातार शांति बनाए रखने की अपील की थी, फिर भी प्रशासन ने इन्हीं दोनों नेताओं को निशाना बनाया। आंदोलन खत्म होते ही, बड़हरवा थाना कांड संख्या 452/16, जी.आर. केस के अंतर्गत भारतीय दंड संहिता की संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज हुआ।

आरोप: आंदोलन नहीं, अपराध?

प्रखंड प्रशासन और कुछ स्थानीय सत्ताधारी तत्वों की “मेहरबानी” से यह मुकदमा तैयार हुआ। आरोप था कि अनंत तिवारी और जोहन मुर्मू ने सरकारी कार्य में बाधा डाली, तोड़फोड़ की साजिश रची और प्रशासन को जानबूझकर बदनाम किया। यह सब तब जब दोनों नेता जनहित में लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात कह रहे थे।

9 साल की पीड़ा — हर तारीख़ एक इम्तिहान

फिर शुरू हुई न्याय की लंबी और थकाऊ यात्रा। बेल की लड़ाई से लेकर हर सुनवाई तक, अनंत तिवारी और जोहन मुर्मू को न्यायालय के चक्कर लगाने पड़े। हर तारीख, हर गवाही उनके धैर्य और सच्चाई की परीक्षा बन गई। कई बार ऐसा लगा कि क्या सच में इस देश में सत्य की विजय होती है?

लेकिन न उन्होंने हार मानी और न उनकी आवाज़ दबाई जा सकी। मुकदमा चलता रहा, गवाहों की जिरह होती रही, बचाव पक्ष ने हर सच्चाई को बारीकी से अदालत के समक्ष रखा।

प्रदीप सिंह और उनकी टीम — न्याय के रक्षक

इस केस की पैरवी वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप सिंह और उनके जूनियर देवजीत कुमार ने की। उन्होंने केस को सिर्फ एक कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि जनहित के आंदोलन की तरह लड़ा। केस की हर बारीकी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने साबित किया कि आंदोलन पूरी तरह लोकतांत्रिक था, और यदि कुछ क्षणों के लिए हालात बिगड़े, तो उसके लिए आंदोलनकारी जिम्मेदार नहीं थे।

फैसला — बाइज्जत बरी

28 जुलाई 2025 को राजमहल न्यायालय के न्यायाधीश श्री रंजन कुमार की अदालत ने दोनों नेताओं — अनंत तिवारी और जोहन मुर्मू — को सभी आरोपों से बाइज्जत बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि आंदोलन लोकतांत्रिक अधिकारों के दायरे में था, और उसके नेतृत्वकर्ता को साजिश के तहत फँसाया गया।

इस फैसले के साथ न सिर्फ दो निर्दोष व्यक्तियों को न्याय मिला, बल्कि यह भी सिद्ध हुआ कि जनता की आवाज़ को दबाया नहीं जा सकता — न मुकदमों से, न झूठे आरोपों से।

अनंत तिवारी का बयान:

> “हमने कुछ भी गलत नहीं किया था। हमनें सिर्फ जनता की आवाज़ उठाई थी। 9 साल लंबी यह लड़ाई हमें झुका नहीं सकी। हम आज भी उसी तरह जनहित में लड़ते रहेंगे। ये फैसला हर संघर्षशील इंसान की जीत है।”

जोहन मुमु का बयान:-
जनता के लिये लड़ाई लड़ने वाले लोगो को कितना जूझना पड़ता है यह मुकदमा ने हमे सिखाया जनता के लिये लड़ाई जारी रहेगी
सत्यमेव जयते

यह कहानी सिर्फ दो व्यक्तियों की नहीं, बल्कि उस पूरे समाज की है जो अपनी आवाज़ उठाने से डरता है। यह फैसला उन्हें साहस देता है कि लोकतंत्र में आवाज़ उठाना गुनाह नहीं, बल्कि अधिकार है।

अब जब न्याय मिल चुका है, यह एक नई शुरुआत है — जनता के लिए, संघर्ष के लिए, और उस लोकतंत्र के लिए जिसे जिंदा रखने की जिम्मेदारी हम सब की है।

*सत्यमेव जयते*

शिलान्यास के साथ उद्घाटन भी , लेकिन राजनैतिक सीमाओँ के उसपार समाज सेवा का एक बार फिर दिखा वही जुनून , शिशु मंदिर विद्यालय के नवनिर्मित भवन का लुत्फुल हक़ ने किया उद्घाटन।

साहिबगंज जिले के कोटालपोखर में संचालित सरस्वती शिशु मंदिर के नव निर्मित भवन का उद्घाटन पाकुड़ के विख्यात समाजसेवी लुत्फल हक़ ने फीता काटकर किया। समाजसेवी लुत्फल हक के सहयोग से तीन कमरें का वर्ग कक्ष एवं एक कमरे का प्रधानचार्य कार्यालय का निर्माण कराया गया है। उल्लेखनीय है कि सरस्वती शिशु मंदिर पिछले तीस वर्षों से कोटालपोखर में संचालित है। उक्त विद्यालय से सैंकड़ों बच्चों ने शिक्षा ग्रहण कर वर्तमान में देश के विभिन्न राज्यों में देश सेवा कर रहे है। परंतु दुर्भाग्य है कि आज तक उक्त विद्यालय में भवन का निर्माण नहीं हो सका था। प्रधानचार्य तुलसी मंडल, भावेश साह, जितेंद्र सिंह, मुनीलाल शर्मा, विकास भगत के अथक प्रयास और समाजसेवी लुत्फल हक के सहयोग से नए भवन की आधारशीला रखी गई थी। एक वर्ष में भवन बनकर तैयार हो गया।वहीं लुत्फल हक ने कहा कि बच्चों के हित के लिए उक्त भवन का रंग रोगन भी कराया जायेगा। ताकि भवन सुंदर दिखे।उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्र में संचालित यह विद्यालय शिक्षा के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों को छुए, इसके लिए हर संभव सहयोग करता रहेगा। मौके पर उप मुखिया प्रतिनिधि विनोद भगत, तारा पोदो, मदन पांडेय, शंकर साहा, बरहरवा के प्रधानाचार्य प्रमोद आचार्य, गौरव आचार्य आदि मौजूद थे।

सरस्वती शिशु मंदिर का क्या है इतिहास

सरस्वती शिशु मंदिर, विद्या भारती संगठन के द्वारा संचालित होते हैं। विद्या भारती, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) से प्रेरित एक शिक्षण संस्थान है, जो भारत भर में सरस्वती शिशु मंदिर और अन्य शैक्षणिक संस्थानों का संचालन करती है। पहला सरस्वती शिशु मंदिर 1952 में गोरखपुर में स्थापित किया गया था। सरस्वती शिशु मंदिरों का मुख्य उद्देश्य शिक्षा के साथ-साथ बच्चों में नैतिक और सामाजिक मूल्यों का विकास करना है। यह संगठन भारत की सांस्कृतिक और पारंपरिक मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए भी जाना जाता है।

जाली लॉटरी, नॉट और आधार कार्ड छापने के बाद जाली आधार कार्ड पर जमीनों की हेरा फेरी भी एक दिन पाकुड़ को करेगा बदनाम।

पाकुड़ पुलिस ने जाली नोट छापने और चलाने वाले गिरोह का भंडाफोड़ किया। मामले की सूचना पुलिस को मिली थी। नवपदस्थापित पुलिस कप्तान की सक्रियता और अनुसंधान पर तकनीकी नज़र ने अनुसंधानक को मदद मिली और नोट छापने वाली अंतरजिला गैंग पकड़ा गया। जाली नोट कबसे छप रहा था , कितने नोट अब तक खपाये गये आदि सवालों पर पुलिस अनुसंधान कर रही होगी , लेकिन रथ मेले के दौरान जाली नोट के साथ पकड़ी गई महिला ने शायद पुलिस का ध्यान इस गम्भीर अपराध की ओर खींचा होगा , नतीजा सामने आ गया।

लेकिन इससे पहले ग्रामीण सहित कई इलाकों में अवैध रूप से आधार कार्ड बनाने के मामले भी आ चुके हैं। पुलिसिया कार्रवाई के साथ प्रशासनिक कार्रवाई भी हुई थी , और प्रज्ञा केंद्रों से आधार कार्ड के काम वापस ले लिये गये थे।
उधर बिहार में मतदाता पुनरीक्षण कार्यक्रम चल रहा है। रोज इस पर राजनैतिक बहस पक्ष विपक्ष में चल रहा है। मतदाता पुनरीक्षण में 11 कागज़ात में से किसी एक को प्रस्तुत करने की सूचि चुनाव आयोग ने दी है , लेकिन आधार कार्ड को मान्यता नहीं दी गई है। बहस में इसे भी मुद्दा या यूँ कहें प्रमुख मुद्दा पुनरीक्षण का विरोध करने वाले बना रहे हैं, लेकिन चुनाव आयोग आधार कार्ड को न मानने पर अड़ा हुआ है। ऐसा क्यूँ ये सोचने पर मुझे मजबूर होना पड़ा। अंदर ही अंदर बहुत सोचा। विरोध करने वाले राजनैतिक दलों और चुनाव आयोग की ज़िद पर मंथन किया , तो बहुत कुछ समझ में आया कि जमीनी हकीकत पर शायद चुनाव आयोग ठीक है। क्योंकि इन दिनों पूरे देश में हजारों विदेशी नागरिक प्रशासन को ऐसे मिले जिनके पास आधार कार्ड थे , लेकिन वे घुसपैठिये निकले। पर ये आधार कार्ड उन्हें कैसे मिलते हैं , इसके कारण ढूँढने की ज़रूरत है।

जाली आधार कार्ड क्या क्या गुल खिला सकते हैं , इसपर गौर और गम्भीर तरीके से अनुसंधान ज़रूरी है।
एक उदाहरण को समझने की ज़रूरत है।
मान लिया जाय कि मैं अगर अपना आधार कार्ड बनाने जाऊँ , तो मेरे फिंगर प्रिंट और रेटिना की रीडिंग लेते ही स्पस्ट हो जाएगा कि मेरा आधार पहले से बना हुआ है।

अब अगर कोई विदेशी घुसपैठिया मेरे ही नाम से आधार कार्ड बनाने गया , तो नाम कमोबेश कुछ स्पेलिंग के अलावे अलग फिंगरप्रिंट और अलग रेटिना के आधार कार्ड बनवाने में सफल हो जाएगा। जैसे मेरा नाम कृपा सिन्धु तिवारी है , और वो कृपासिंधु तिवारी के नाम से आधार आसानी से बना सकता है।

अब जिस समय बिना आधार के ऑफ लाइन जमीन रजिस्ट्रेशन होती थी, उस जमीन को बृहत मिलीभगत से आराम से मेरे नाम की जमीन दूसरे को ऑन लाईन बेच देगा। और हम अनभिज्ञ रह जाएंगे।

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दूसरी बात यह कि मैनें किसी अपनी दूसरी जमीन जो मैनें ख़रीदा है , और मोटेशन के लिए अंचल कार्यालय में आवेदन दिया। मेरे आवेदन को तकनीकी फॉल्ट के नाम पर अस्वीकृत कर , मेरे ही नाम पर अवैध आधार वाले नाम के आदमी का मोटेशन उसी आवेदन नम्बर पर किसी और को विक्री दिखा कर कर दिया जाता है। सवाल पूछने पर ईरर का हवाला दिया जाता है । ऐसा इरर एक नहीं कई दिखता है , तो इसे क्या समझा जा सकता है !

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पाकुड़ जिले में जमीन के घपलों की है अजब गजब कहानी

पहली बात तो एक ओरिजनल आदमी वेवजह परेशान रहा।
दूसरा कि किसी सम्भावित घुसपैठिया को आधार के साथ इस बात का भी प्रमाण उपलब्ध करा दिया गया कि वो यहाँ का मूल निवासी है और अपनी किसी मजबूरी में जमीन बेच दी। जबकि उसको आधार कार्ड केंद्र से रजिस्ट्रेशन कार्यालय तक क्या हुआ कुछ पता नही , बल्कि इन सबके लिए उससे वसूली भी हुई।
वो बेचारा ही बना रहा , साथ ही कई बेचारे बने , लेकिन जमीन सहित कई चारा सरकारी चरवाहा चरा कर गटक गया।
ऐसे उदाहरण सैकड़ों होंगे ।
अब शिविर लगा कर खैर। आज नहीं तो कल जाँच तो होगी। आख़िर झूठ एक दिन उभर कर महकने ही लगता है। इसीलिए ऐसे मामले बिहार में पकड़े जा रहे हैं, और वोटर लिस्ट से नाम कट रहा है, तो हल्ला मचा हुआ है।

सरकारी वरीय अधिकारी करे तो क्या करें , वे सभी जगह और टेबुल पर स्वयं काम तो नहीं कर सकते, लेकिन नीचे कर्मचारी अपने छोटे मोटे स्वार्थ के लिए बड़ी समस्या और अपराध का कारण बना जाते हैं।

जो राज्य और देश के लिए बाद में खतरा भी बन जाते हैं।
पाकुड़ में सैकड़ों उदाहरण ऐसे अनुसंधान में मिल जाएंगे , जिसमें घुसपैठियों का न सिर्फ आधार कार्ड अवैध रूप बना है बल्कि उन्हें उपयोग कर जमीन की हेराफेरी बड़े पैमाने पर हुई है , और उसी हेराफेरी के आधार पर घुसपैठियों को जमीन बेचने के आधार पर आधार कार्ड भी बन जाता है , तथा वे यहाँ के मूल निवासी भी कागजी तौर पर सावित किये जाने का आधार तैयार कर दिया जाता है , फिर उसी के कारण उनका वोटर कार्ड , राशन कार्ड आदि सभी बन जाता है।

सबूत के तौर पर ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं। ऐसे में पाकुड़ का भगवान ही मालिक है और सरकारी कर्मचारी से लेकर वरीय अधिकारि तक जमीन के मालिक बन बैठे हैं। चूँकि सब चीजें उन्हीं कर्मचारियों और अधिकारियों के जिम्मे है , इसलिए इसका खुलासा मुश्किल हो जाता है। और अगर कोई खुलासे का दुस्साहस मेरे तरह करे , तो झूठे आरोप में जेल जाने तथा प्रताड़ित होने या जान गवांने के लिए तैयार रहे।

अच्छा ऐरर पर सवाल उठाते ही उसे गलत तरीके से ठीक भी दिखा दिया जाता है। लेकिन इस डिजिटल युग में सब कुछ रिकवर हो सकता है इसे लोग भूल जाते हैं।
ऐसे कर्मचारियों पर देश की सुरक्षा से खेल करने के लिए गम्भीर जाँच कर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।

जो भी हो अभी तो बिहार के लिए हल्ला मचा है , लेकिन जब पाकुड़ का ऐसा मामला कोर्ट तक पहुँचेगा तब क्या होगा ? यह देखना बाँकी है। क्योंकि यहाँ सिर्फ अवैध आधार की बात नहीं है , यहाँ तो ज़मीनों के घोटाले का मामला भी जमीनी हकीकत बन चुका है।

गणपति महोत्सव की तैयारी को लेकर पूजा समिति की बैठक संपन्न।

रेलवे मैदान पाकुड़ में 27 से 30 अगस्त तक मनाया जाएगा गणपति महोत्सव।

अनिकेत बनाए गए समिति के अध्यक्ष।

27 वां गणपति महोत्सव धूमधाम से मनाने हेतु सार्वजनिक गणेश पूजा समिति रेलवे मैदान पाकुड़ की बैठक राणा शुक्ला के अध्यक्षता में पाकुड़ रेलवे स्टेशन परिसर स्थित महावीर मंदिर के सत्संग भवन में आयोजित किया गया।बैठक में प्रमुख रूप से गणेश पूजा के संस्थापक हिसाबी राय,संजय कुमार ओझा,अखिलेश कुमार चौबे,अनिकेत गोस्वामी सहित गणेश पूजा के दर्जनों कार्यकर्ता मौजूद थे। बैठक में 27 वां गणपति महोत्सव को रूप में मनाने को लेकर कार्यकर्ताओं में काफी उत्साह था।इस वर्ष पूजा 27 अगस्त से प्रारंभ होकर 30 अगस्त तक चलेगी गणपति महोत्सव को सफल बनाने के लिए एक कार्यसमिति बनाई गई,जिसमें अध्यक्ष अनिकेत गोस्वामी कार्यकारी अध्यक्ष मुन्ना रविदास,उपाध्यक्ष नितिन कुमार मंडल, अमित साहा,सचिव अजित मंडल,संयुक्त सचिव संजय कुमार राय,सह सचिव आदित्य सिंह,निर्भय सिंह कोषाध्यक्ष तन्मय पोद्दार एवं व्यवस्था प्रमुख अंकित मंडल को बनाया गया, वहीं पूजा कार्यसमिति सदस्य मनीष कुमार सिंह,रतुल दे,भक्ति पूजन प्रसाद, संजय मंडल,ओम प्रकाश नाथ, विशाल साहा,अमन भगत, अंशु राज,जितेश रजक,बूबाई रजक, अंकित शर्मा,बिट्टू राय,राका कुमार राय,रणजीत राम,ज्वाला सिंह, रौशन अग्रवाल, कृष्णा घोष तथा मार्गदर्शक मंडली में तीर्था शंकर शुक्ला,मोनी सिंह,कुंवर राय,अविनाश पंडित,जवाहर सिंह,अजय राय,कैलाश मध्यान,सुशील साहा,लाल्टू भौमिक,विजय कुमार राय को बनाया गया।आगे अध्यक्ष अनिकेत गोस्वामी ने बताया कि 27 वें गणपति महोत्सव में गणपति बप्पा की चार दिवसीय पूजनोत्सव का आयोजन किया जाएगा।वहीं विगत के वर्षों से पूजा मंडप,विद्युत व साज सज्जा इस वर्ष और बड़े पैमाने पर एवं मनमोहक बनवाई जा रही है। 26 अगस्त को संध्या प्रहर कपाट खुलने के साथ ही बाबा का आमंत्रण सहित पूजा प्रारंभ होगी। 27 अगस्त को प्रथम दिन कलश स्थापना व गणपति बप्पा की प्रतिमा को स्थापित कर पूजा आरंभ होगी संध्या आरती के पश्चात संध्या भजन संध्या का आयोजन किया जाएगा।द्वितीय दिन 28 अगस्त को सुबह पूजा व संध्या आरती के उपरांत बच्चों का सांस्कृतिक कार्यक्रम नृत्य प्रतियोगिता का विधिवत उद्घाटन कार्यक्रम को प्रारंभ किया जाएगा, 29 अगस्त को सुबह पूजा संध्या आरती के उपरांत सांस्कृतिक कार्यक्रम व नित्य प्रतियोगिता का समापन व पुरस्कार वितरण किया जाएगा वही 30 अगस्त अंतिम दिन को पूजा के उपरांत घट विसर्जन वह दोपहर में डांडिया और मटका फोड़ के उपरांत संध्या समय प्रतिमा विर्सजन किया जाएगा। इस वर्ष समिति के द्वारा निर्णय लिया गया की नित्य प्रतियोगिता के अलावे चित्रकला एवं अन्य विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन भी करेगी।
बैठक में सुशील शाह शंकर लाल शाह कैलाश मध्यान अविनाश पंडित मोनी सिंह रणजीत राम अमर कुमार मल्होत्रा रामकुमार यादव केशव मंडल विकास शाह राजा कुमार राय जितेश रजक अंकित शर्मा अंकित मंडल अभिषेक पासवान बुबाई रजक अभिषेक शाह ओमप्रकाश नाथ भक्ति कुमार बिट्टू राय मोहम्मद शब्बीर हुसैन अजय ठाकुर युवराज उपाध्याय अंशु ठाकुर रतुल दे संजय मंडल अमन भगत ज्वाला सिंह रोशन अग्रवाल कृष्ण घोष आदि मौजूद थे।