स्थानीय लोगों को ही DMFT सहित सभी Vacancy में प्राथमिकता मिलनी चाहिए क्योंकि पाकुड़ जिला झारखण्ड का अनुसूचित जिला है।
पाकुड़ जिला में DMFT मद से कितने कर्मी कार्यरत हैं। उनकी मासिक परिलब्धि (मानदेय) कितनी है। कर्मी कितने दिनों से कार्यरत हैं और इनका चयन का आधार क्या है। योजना चयन या निरीक्षण में इनकी भूमिका क्या है?
हाथकाठी हिरणपुर में बिना आवादी वाले जगह पर चार जलमीनार बन गये ,अब वहीं आसपास आदिवासियों की नन सेलेबल जमीन पर अवैध आवादी बसाई जा रही है। क्या इस पर सवाल नहीं उठाये जा सकते हैं।
इन सबका निरीक्षण और जाँच होगा भैया !
इन्हीं सब बातों पर बिना प्रभावित हुए ध्यान दिया जाय तो कारवाई के पर्याप्त प्रमाण मिल जाएंगे।
लेकिन क्या ऐसा हो पायेगा ?
यही ज्वलन्त सवाल है।
अगर इस सवाल का जवाब ढूँढने कोई निकले तो उसे कोई जवाब नहीं मिलेगा। इस DMFT फंड पर पूर्व उपायुक्त के समय मे न जाने कितने सवाल उठे ,लेकिन सवाल निरुत्तर और ऐसे में कारवाई विहीन रह गए।
पटना से आयातित कर्मी इसमें काम करेंगे लाख रुपये से ऊपर के वे वेतनभोगी होंगे , और स्थानीय युवा सड़क पर बेरोजगार भटकेंगे तो अषन्तोष तो स्वाभाविक रूप से उपजेगा। यहाँ हर विभाग में हर अनहोनी करनी चलता रहेगा , कोई कुछ कहे तो फिर वे प्रताड़ित किये जायेंगे।
उपयोगी , जानकर और सक्षम अधिकारी तथा कर्मचारियों को सेंटिंग पोष्ट पर उनकी उपयोगिता को बर्बाद करेंगे और बिहार में पाँच सितारा होटल के भगीदार कर्मचारी अच्छी जगह पर अनुपयोगी होकर मौज करेंगे।
ऐसे ही अनुपयोगी चमचों के चँगुल और कॉकस में घिर कर हमारे लोकप्रिय व्यवहारिक मिलनसार और सभी के लिए सुलभ पूर्व विधायक और मंत्री आज जेल में हैं। ऐसे ही लोगों से घिरे रहने की वजह से पूर्व मुख्यमंत्री कोड़ा साहब का राजनैतिक केरियर बर्बाद हुआ , लेकिन किसी स्तर पर कोई सीख नहीं लेते , और अच्छे लोग अपनी नादानी की वजह से भुगतते हैं।
आश्चर्य और विडंबना यह है , कि उपायुक्त तक के लिखित आदेश की अवहेलना करने का दुस्साहस वाले बन बैठे हैं।
राजनेताओं के हाथों का खिलोना बनने वाले सरकारी लोगों को आज पश्चिम बंगाल में झाँकना चाहिए ,लेकिन…
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पूर्व डीसी के द्वारा लिपिक, सहायक का स्थानांतरण आदेश जारी करने के बाद भी स्थानांतरित लिपिक, सहायक अधिकतर अपने पूर्व जगह पर जमे रहना ऐसे में क्या समझा जाए, कई तो एक ही जगह पांच से दस साल से जमे है। क्या इनपर करवाई नहीं बनती है , या नहीं।
उस चिट्ठी का क्या हुआ। चतुर्थवर्गीय कमर्चारियों को सालाना वर्दीभत्ता मिलता है, क्या उसपर अमल होता है। स्वयं जिला मुखिया के कार्यालय कक्ष में इस आदेश का उल्लंघन होता दिखा है। हजारों चित्रों और वीडियो में इसका प्रमाण दिख जाएगा।
सब आदेश की अवहेलना होती है।
आख़िर किस मजबूरी में ?
क्यूँ ऐसा अंधेर मचा हुआ है ?
कुछ करें साहबाना , बचायें सरकारी और प्रशासनिक सम्मान को , निवेदन है।
और यहाँ के हम बीचवाले कब तक ताली बजाते हुए वाह वाह करेंगे ? लोग हम पर भी सवाल उठाते हैं झांकिये अपने भी गिरहवाँ में।
पल दो पल के शायर आएँगे और जाएँगे , लेकिन हम तो चले ही गये हैं।
हे भगवान ! ये शहर आपका है और आप ही यहाँ रह जाएंगे। विरासत में क्या दे जाएँगे अपनी पीढ़ी को !
सोचिये जरा , अब भी समय है।😥