वीरता और शौर्य के प्रतीक बाबू कुंवर सिंह के विजयोत्सव दिवस पर कोटिश: नमन
गुरुवार को बाबू वीर कुंवर सिंह के बिजयोत्सव पर उनके तस्वीर पर माल्यार्पण व श्रद्धासुमन अर्पित किया गया ।कालखंड (1777-1858) बिहार के जगदीशपुर के एक महान राजपूत जमींदार और 1857 की प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख महान योद्धा बाबू वीर कुंवर सिंह थे। 80 वर्ष की आयु में उन्होंने अंग्रेजी सेना के खिलाफ युद्ध का नेतृत्व किया, गोरिल्ला युद्ध (छापामार युद्ध) नीति अपनाई, गंगा पार करते हुए अंग्रेजों की गोलख बांह में लग गई बस क्या था वे तुरंत तलवार से अपनी बांह काटकर कर गंगा में विसर्जित कर दिए।
वीर कुंवर सिंह का जीवन बहुत भव्यता व संघर्ष भरा रहा ,वे स्वाभिमानी व व्यक्तित्व के स्वामी थे ।
उनका जन्म 13 नवंबर 1777 को बिहार के भोजपुर जिले के जगदीशपुर गाँव में हुआ था। उनके पिता बाबू साहबजादा सिंह और माता पंचरत्न कुंवर थीं।
1857 की क्रांति में उन्होंने बिहार में अंग्रेजी सेना को कड़ी टक्कर दी, विशेषकर आरा और जगदीशपुर के क्षेत्रों में।
वे छापामार (गोरिल्ला) युद्ध में कुशल थे। उन्होंने आरा को अंग्रेजों से मुक्त कराया था और आजमगढ़, बलिया, गाजीपुर, और गोरखपुर जैसे क्षेत्रों में अंग्रेजों को धूल चटाई।
जब वे गंगा पार कर रहे थे, तब अंग्रेजों की गोली से उनका बायां हाथ घायल हो गया। संक्रमण फैलने के डर से उन्होंने तलवार से अपना हाथ काटकर गंगा को अर्पित कर दिया।
23 अप्रैल 1858 को उन्होंने जगदीशपुर किले पर पुनः विजय प्राप्त की, लेकिन 26 अप्रैल 1858 को वे वीरगति को प्राप्त हुए।
इन्हें “बिहार का शेर” और बाबू साहब के नाम से भी जाना जाता है।
80 वर्ष की उम्र में भी वे युद्ध के मैदान में पूरी वीरता के साथ लड़े, जो उन्हें 1857 के नायकों में अद्वितीय बनाता है।
उनकी वीरता को सम्मानित करने के लिए भारत सरकार ने 23 अप्रैल को विजय उत्सव के रूप में चिन्हित किया है। बाबू वीर कुंवर सिंह के बिजयोत्सव पर कोटिश: नमन !
उक्त अवसर पर भागीरथ तिवारी, कैलाश झा, संजय कुमार शुक्ला, प्रवीण कुमार सिंह , अरुण कुमार सिंह , सोहन कुमार सिंह रामदेव मंडल सहित अन्य उपस्थित थे ।