*सरकारी अस्पताल बना निजी आवास! दमदमा में 3 साल से उप स्वास्थ्य केंद्र पर एक परिवार का कब्जा*
– मुखिया के आदेश पर खड़े हुए बड़े सवाल
– उक्त गांव या आसपास नहीं है कोई भी सरकारी स्वास्थ्य केंद्र
पाकुड़ (महेशपुर) : महेशपुर प्रखंड के दमदमा गांव में सरकारी व्यवस्था की बड़ी लापरवाही सामने आई है। गांव का एकमात्र उप स्वास्थ्य केंद्र, जहां ग्रामीणों को प्राथमिक इलाज मिलना चाहिए था, वह पिछले करीब तीन वर्षों से एक परिवार का निजी आवास बना हुआ है। चौंकाने वाली बात यह है कि पंचायत के मुखिया द्वारा दिए गए बिना किसी तारीख के एक लिखित कागज के आधार पर यह व्यवस्था की गई है। अब इस पूरे मामले ने पंचायत अधिकार, सरकारी नियम और ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
कैसे शुरू हुई कहानी
प्राप्त जानकारी के अनुसार, दमदमा गांव निवासी रीना बीवी के पति का निधन हो जाने के बाद वह रहने के लिए जगह की तलाश में थी। इसी दौरान वह गांव में बने उप स्वास्थ्य केंद्र में रहने लगी। बताया जा रहा है कि यह उप स्वास्थ्य केंद्र करीब 16 वर्ष पूर्व बना था, लेकिन तब से बंद पड़ा है। रीना बीवी ने बाद में दूसरी शादी कर ली। वर्तमान में वह अपने मौजूदा पति आजीबुल शेख के साथ उसी उप स्वास्थ्य केंद्र भवन में रह रही है। भवन के अंदर खाना बनाने से लेकर सोने तक की पूरी व्यवस्था कर ली गई है और घरेलू सामान भी रखा गया है।
मुखिया के बिना तारीख के आदेश पर मिला आश्रय
रीना बीवी का कहना है कि रहने के बाद वह पंचायत के मुखिया अनिल कोड़ा के पास गई थी, जहां से उन्हें एक लिखित कागज दिया गया। उक्त आवेदन की प्रति उपलब्ध है, जिसमें यह उल्लेख है कि रीना बीवी के परिवार द्वारा पूर्व में उक्त जमीन दान में दी गई थी। हालांकि, मुखिया द्वारा दिए गए कागज में यह स्पष्ट नहीं है कि परिवार कब से वहां रह रहा है, कितने समय तक रहने की अनुमति है, या घर निर्माण की स्थिति क्या है। आवेदन में किसी प्रकार की तारीख का उल्लेख भी नहीं है, जिससे पूरे प्रकरण की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे है।
जल्द खाली कराया जाएगा अस्पताल भवन – मुखिया
इस संबंध में जब मुखिया अनिल कोड़ा से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उन्हें जल्द ही भवन खाली करने का आदेश दिया जाएगा। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब मामला तीन साल पुराना बताया जा रहा है, तो अब तक कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
इस बाबत कोई जानकारी ही नहीं है – चिकित्सा पदाधिकारी
इस संदर्भ में महेशपुर चिकित्सा पदाधिकारी सुनील कुमार किस्कू से बात किया गया, तो उन्होंने कहा कि इसकी उन्हें जानकारी नहीं है। यहाँ पर यह सोचनीय है कि जो डॉ महेशपुर में वर्षों से पदस्थापित हैं, उन्हें इस मामले की जानकारी ही नहीं है, जो काफी चिंताजनक है।
घर तैयार या गुमराह करने की कोशिश
रीना बीवी का दावा है कि अब उनका घर बनकर तैयार हो गया है और वे जल्द ही उप स्वास्थ्य केंद्र खाली कर देंगी। हालांकि यह भी आशंका जताई जा रही है कि कहीं दूसरे के घर को अपना बताकर प्रशासन और ग्रामीणों को गुमराह तो नहीं किया जा रहा है। इस संबंध में आधिकारिक सत्यापन अब तक नहीं हुआ है।
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*बड़ा सवाल : क्या मुखिया को है यह अधिकार*
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बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी पंचायत प्रतिनिधि को सरकारी स्वास्थ्य भवन में किसी को रहने देने की अनुमति देने का अधिकार है । यदि भवन बंद भी पड़ा था, तब भी वह सरकारी संपत्ति है। ऐसे में बिना सक्षम प्रशासनिक आदेश के किसी परिवार को वहां रहने देना नियमों के विरुद्ध माना जा सकता है।
जांच की उठी मांग
ग्रामीणों के बीच इस मामले को लेकर चर्चा तेज है। लोगों का कहना है कि यदि उप स्वास्थ्य केंद्र वर्षों से बंद है तो उसे चालू कराने की पहल होनी चाहिए थी, न कि उसे निजी आवास में बदल दिया जाए। मामले की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार पदाधिकारियों पर कारवाई की मांग उठने लगी है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस पूरे प्रकरण पर क्या रुख अपनाता है। क्या सरकारी भवन खाली कराया जाएगा या फिर यह मामला कागजों तक ही सिमट कर रह जाएगा।
गांव में नहीं है कोई स्वास्थ्य सुविधा
बताते चलें कि दमदमा गांव और आसपास के टोले में वर्तमान में कोई भी संचालित स्वास्थ्य केंद्र नहीं है। छोटी मोटी बीमारी, गर्भवती महिलाओं की जांच, टीकाकरण या आपात स्थिति में ग्रामीणों को कई किलोमीटर दूर दूसरे गांव या प्रखंड मुख्यालय जाना पड़ता है। बरसात के दिनों में रास्ता खराब होने से मरीजों को भारी परेशानी होती है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि उप स्वास्थ्य केंद्र चालू होता तो गांव को बड़ी राहत मिलती। ऐसे में जिस भवन को स्वास्थ्य सेवा का केंद्र बनना था, उसे निजी आवास में तब्दील हो जाना काफी खेदजनक है।
क्या कहते हैं सरकारी नियम
सरकारी भवन (विशेषकर स्वास्थ्य विभाग की संपत्ति) का उपयोग केवल निर्धारित सरकारी कार्यों के लिए किया जा सकता है। बिना सक्षम प्राधिकारी (जैसे सिविल सर्जन, स्वास्थ्य विभाग या अंचल प्रशासन) की अनुमति के किसी भी व्यक्ति को आवासीय उपयोग की अनुमति देना नियमों के विरुद्ध है। पंचायत प्रतिनिधि को सरकारी स्वास्थ्य भवन को निजी आवास के रूप में आवंटित करने का अधिकार नहीं होता है। सरकारी संपत्ति पर अनधिकृत कब्जा या उपयोग प्रशासनिक और कानूनी कार्रवाई के दायरे में आता है। यदि जमीन दान में दी गई थी, तब भी भवन निर्माण के बाद वह स्वास्थ्य विभाग की संपत्ति है।