तीन दिनों से रेल विकास की मांग को लेकर रैक लोडिंग कार्य बंद,करोड़ों का हो रहा नुकसान
पटना व दिल्ली की सीधी ट्रेनें शुरू करने और शताब्दी एक्सप्रेस व वंदे भारत ट्रेन के ठहराव की मांग को लेकर आंदोलन किया जा रहा है
ब्रिटिश शासन काल में 19 वीं शताब्दी के लगभग उत्तरार्ध में पाकुड़ साहेबगंज लूप रेल लाइन की स्थापना उस समय की गई थी, जब ब्रिटिशों की राजधानी कोलकाता हुआ करता था। चूँकि भागलपुर ब्रिटिशों का एक ऐसा केंद्र था जो इस पूरे पुरवोत्तर भारत पर नज़र रखी जाती थी , और ब्रिटिश शासन का ये बहुत महत्वपूर्ण केंद्र था।
स्वाभाविक रूप से ब्रिटिश सैनिक एवं अधिकारियों के मुभमेन्ट के लिए यह रेल लाइन काफी महत्वपूर्ण तथा एक तरह से ब्रिटिश शासन की लाइफ लाइन थी। उसी समय पाकुड़ क्षेत्र के उत्तम क़्वालिटी के पत्थरों पर ब्रिटिश नज़र पड़ी , जिसने उच्चतम ताप को बर्दाश्त करने वाले इन पत्थरों को ढोने के लिए इस रेलवे लाइन का उपयोग होने लगा जो आज भी जारी है।
रेलवे लाइनों पर पहले हेंड मेड तथा सोध के बाद मसीन मेड एक निश्चित आकार के पत्थर भी इसी क्षेत्र से आपूर्ति होने लगी।
रेलवे ने इन शताब्दियों में पाकुड़ से पत्थरों के द्वारा अरबों खरबों कमाया , लेकिन आज़ादी के बाद भी तमाम सरकारों के रेल मंत्रालय ने रेल सुविधा एवं यात्री सुविधाओं के नाम पर उपेक्षा के साथ छला। लगातार छले जाने में रेल सुविधाओं को बढ़ाने की बात तो छोड़ दें कई ट्रेनों को विभिन्न कारणों से चुरा कर यहाँ की जनता को ठेंगा दिखाया गया। इसके लिए स्थानीय जनप्रतिनिधियों की लगातार उदासीनता भी कम दोषी नहीं है।
ऐसे में स्थानीय व्यपारियों ने ही लोडिंग बंदी का झंडा बुलंद किया। राजनीति के गलियारों के क्षेत्र के कद्दावर नेता पंकज मिश्रा ने अपना समर्थन दे कर लोडिंग बन्दी के आन्दोल को एक धार दे दिया है। लेकिन सवाल उठ रहे हैं कि सिर्फ पत्थर क्यूँ कोयला ढुलाई पर भी लगे रोक
आन्दोल को विस्तार से नीचे जाने–
पाकुड़ के मालपहाड़ी व तिलभिट्टा रेलवे रैक प्वाइंट पर पिछले तीन दिनों से रेल विकास की मांग को लेकर पत्थर व्यवसायियों ने रैक लोडिंग का कार्य पूरी तरह ठप कर दिया हैं.यह आंदोलन झामुमो के केंद्रीय प्रवक्ता पंकज मिश्रा के आह्वान पर किया गया.आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण रहा.रैक लोडिंग बंद होने से तीन दिनों में लगभग दो करोड़ का नुकसान रेलवे को होने का अनुमान लगाया जा रहा हैं.वहीं रैक लोडिंग करने वाले दिहाड़ी मजदूरों को काम किए बिना ही घर लौटना पड़ रहा हैं. बताया गया कि यहां दोनों साइडिंग एरिया से प्रतिदिन औसतन करीब 6 से 10 रैक लोड होते हैं,जिससे रेलवे को भारी राजस्व प्राप्त होता है.वहीं आंदोलन के चलते 35 इंडेंट (रैक मांग) को वापस ले लिया गया है.उल्लेखनीय है कि पांच जनवरी को साहिबगंज में झामुमो नेता पंकज मिश्रा की अध्यक्षता में साहेबगंज और पाकुड़ जिले के पत्थर व्यापारियों के साथ बैठक आयोजित की गई थी,जिसमें रेलवे रैक प्वाइंट से पत्थर ढुलाई करने वाले पाकुड़ और साहिबगंज के सभी पत्थर व्यवसायी शामिल हुए थे.बैठक में रेलवे पर आरोप लगाया गया कि भारी राजस्व देने के बावजूद पाकुड़ और साहिबगंज को रेल विकास के मामले में लगातार उपेक्षित रखा जा रहा है.व्यवसायियों ने पाकुड़ के लिए पटना और दिल्ली की सीधी ट्रेनें शुरू करने, शताब्दी एक्सप्रेस,वंदे भारत सहित प्रमुख ट्रेनों के ठहराव की मांग उठायी है.पत्थर एसोसिएशन का कहना है कि मांगें पूरी नहीं होने तक रैक लोडिंग कार्य बंद रहेगा.यदि रेलवे प्रशासन ने शीघ्र पहल नहीं की,तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा.पाकुड़ पत्थर एसोसिएशन से मिली जानकारी के अनुसार संगठन ने रेलवे में विकास की मांग को लेकर रैक लोडिंग कार्य बंद करने का निर्णय लिया है. शुक्रवार से रैक लोडिंग कार्य पूरी तरह बंद हैं.वहीं आगे भी रैक लोडिंग कार्य फिलहाल बंद रहेगा. संगठन के अगले निर्णय के बाद ही रैक लोडिंग पर विचार किया जाएगा.इधर इस मामले में गुड्स शेड सुप्रीटेंडें (ज़ीएसएस) पाकुड़ अमित कुमार से पूछने पर बताया की पिछले तीन दिनों से मालपहाड़ी और तिलभिटा रेलवे साइडिंग एरिया से रैक लोड पूरी तरह ठप हैं. प्रतिदिन 60 लाख से ऊपर सिर्फ रेलवे को नुकसान हो रहा हैं.अभी तक हड़ताल समाप्त होने की कोई सुचना प्राप्त नहीं हुई हैं.
पाकुड़ के प्रबुद्ध नागरिकों ने हड़ताल पर उठा रहे सवाल…
पाकुड़ शहर के प्रबुद्ध नागरिकों ने पत्थर रैक लोडिंग ठप किए जाने पर कई गंभीर सवाल उठाये हैं. सोशल मीडिया फेसबुक,इंस्टाग्राम और एक्स पर रेक लोडिंग ठप को लेकर पोस्ट और कमेंट्स किए जा रहे हैं. बताया सिर्फ पत्थर लोडिंग रोकने से कुछ नहीं होने वाला हैं.अगर रोकना हैं तो कोयला लोडिंग को बन्द करना होगा तभी मांगे पूरी होगी.बताया पाकुड़ रेलवे साइडिंग से प्रतिदिन कोयले का रेक लोडिंग होकर बाहर भेजे जा रहे हैं.जिससे अरबों का फायदा केंद्र सरकार और रेलवे को हो रहा उसे क्यों बंद नहीं किया गया.जबकि स्थानीय लोग पत्थर कारोबार से जुड़े हैं.भयादोहन और सॉफ्ट टारगेट लोकल व्यापारियों को कर दिया जाता हैं.अगर हिम्मत हैं तो कोयला को ठप करके दिखाए.बहरहाल पत्थर रेक लोडिंग पूरी तरह ठप हैं, अब देखना होगा आगे रेलवे विभाग क्या एक्शन लेती हैं. क्या रेलवे दबाव में आएगा? या फिर एकबार स्थानीय व्यापारियों को दोहन का शिकार से गुजरना होगा यह तो वक्त बताएगा.
कोरोना काल से बंद पैसिंजर ट्रेन कब से चालू होगा
दिल्ली पटना तो बड़े बड़े लोग जाएंगे