Wednesday, February 4, 2026
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World Press Freedom Day 2022, प्रेस फ्रीडम डे, प्रेस की स्वतंत्रता को दर्शाता है

World Press Freedom Day 2022 विश्‍व प्रेस स्‍वतंत्रता दिवस पर अगर हम भारत में प्रेस की स्वतंत्रता पर विवेचना करें, तो इसके कई पहलुओं में झाँकना होगा।
विश्व की प्रतिष्ठित संस्था के आंकड़ों को यदि हम खंगालें तो प्रेस की स्वतंत्रता के नाम पर भारत 180 देशों में काफ़ी पिछड़ा हुआ है।

अन्य पड़ोसी देशों की तुलना में भी भारत की स्थिति संतोषजनक आंकड़ों में नहीं दिखती। लेकिन अगर जमीनी स्तर पर हम इसे अपने अनुभव के अनुसार टटोलते हैं, तो प्रेस की स्वतंत्रता के हिसाब से व्यक्तिगत मुझे ऐसा नही दिखता। स्वतंत्र प्रेस पर कोई स्पेसिफिक कानून तो नही है। लेकिन भारत मे कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड़ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। ऐसे में यहाँ जो स्पष्ट तौर पर दिखता है, कि कोई भी व्यक्ति लाइव टीभी पर बैठकर सरकार, सरकारी अमलों तथा यहाँ तक कि सरकार के मुखिया की भी आलोचना कर आरोप लगाते हैं। कोई भी चैनल या अखबार एवं मीडिया माध्यम उसे बेख़ौफ़ परोस भी रहे हैं। ऐसे में प्रेस की स्वतंत्रता पर उठने वाले सवाल एवं आंकड़ों पर मुझे आपत्ति दिखती है।

कानूनन धाराओं एवं उप धाराओं के अनुसार भारत में अभिव्यक्ति की बिना किसी अवरोध के पूर्ण रूप से स्वतंत्रता कम से कम मुझे दिखती है। अगर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर झूठ परोसा जाय तो अगर उस पर किसी भी स्तर पर आपत्ति दर्ज होती है, तो इसकी निंदा नहीं होनी चाहिए। हाँ भारत मे पत्रकारिता, राजनीति की तरह ही विभिन्न रूपों और पहलुओं से स्वार्थजनित हो गईं है। ऐसे में राजनैतिक प्रभाव में अगर पत्रकारिता के स्तर के पतन की बात कही जाय तो अतिश्योक्ति नही होगी। इसके लिए पत्रकार के साथ मीडिया हाउस तथा पत्रकारिता के बाजारीकरण मुख्य रूप से उत्तरदायी है। इस पर विचार और बहस की जरूरत है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पत्रकारिता की होड़ में अनुपयुक्त लोगों का इसमें विभिन्न रूपों से जुड़ जाना काफ़ी दुखद और चिंताजनक है। पत्रकारिता का ग्रामीण इलाकों में पतन से स्वाभाविक रूप से इस पेशे में ख़तरा को पैदा करता है। ऐसे सड़क पर चलते, ड्राईभ करते , घर में बैठे लोगों पर भी काफ़ी ख़तरे होते हैं। जरूरी नहीं कि उन पर हमला हो किसी भी तरह की दुर्घटना का भी अंदेशा बना रहता है। ऐसे में आम नागरिकों की आवाज़ बनने और उठाने वाले पत्रकारों पर भी काफ़ी ख़तरे हैं। अगर उन ख़तरों से आपको परहेज है, तो इस पेशे में मत आएं।

मैंनें कई आलेख और रिपोर्ट पढ़े। जिस तरह भारत में पत्रकारिता एवं इससे जुड़े मामलों का मूल्यांकन किया गया है, उसपर मैं सहमत नहीं हूँ। कानून, मानवीय मूल्यों, देश की सुरक्षा तथा किसी भी तरह के स्वार्थ से विरत रह कर भारत में पत्रकारिता अत्यंत स्वतंत्र तथा सुरक्षित है।

अक्षय तृतीया 2022.. क्या करें. क्या न करें. धन प्राप्ति के लिए करें ये उपाय

तृतीया हर हिन्दू कलेंडर के माह में दो बार क्रमशः शुक्ल और कृष्ण पक्ष में आते हैं। साधारणतया इस तिथि को महिलाएं शिवपूजन तथा अपने पति के लिए उपवास रखती हैं। लेकिनअक्षय तृतीया या वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को कहते हैं। और इस दिन भगवान विष्णु तथा लक्ष्मी की पूजा के साथ विष्णु के छठे अवतार Prshuram की भी पूजा करते हैं।

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माना जाता है कि इस दिन जो भी शुभ कार्य किए जाते हैँ उनका अक्षय फल मिलता है। इस कारण इसे अक्षय तृतीया कहते हैँ। इस दिन बिना कोई पंचांग देखे कोई भी शुभ और मांगलिक काम किया जा सकता है।
अक्षय तृतीया में क्या करें- इस दिन कोई भी शुभ और मांगलिक कार्य किया जा सकता है। जैसे- विवाह, गृह-प्रवेश, जमीन-जायदाद खरीदना, वस्त्र-आभूषण खरीदना आदि। इस दिन सारा दिन शुभ मुहुर्त ही रहता है। इस दिन किए गए जप, तप और दान का कई गुणा अधिक फल मिलता है। इस दिन किया गया जप, तप, हवन और दान अक्षय हो जाता है। इस दिन गंगा स्नान जरूर करे। गंगा स्नान न कर पाने पर, स्नान के पानी मे एक चम्मच गंगाजल मिला दें।यह भी उपलब्ध न हो तो गोक्षरन अर्क एक बूँद मिला कर स्नान करने से सभी पापों से मुक्ति मिलने की मान्यता है।

शुभ-मुहूर्त-:

अक्षय तृतीया 3 मई 2022
अक्षय तृतीया प्रारंभ 3 मई को सुबह 5:18 से
अक्षय तृतीया तिथि समाप्त 4 मई 2022 को सुबह 7:32 बजे तक
अक्षय तृतीया पूजा मुहूर्त सुबह 5:39 बजे से 12:18 तक
सोना खरीदने का शुभ समय – 05:38 से 6:15 तक
रोहिणी नक्षत्र 3 मई सुबह 12:33 से 4 मई को सुबह 3:19 तक

पूजा विधि-:

घर के मंदिर में ईशान कोण में लाल कपड़ा बिछाकर भगवान लक्ष्मीनारायण के की मूर्ति स्थापित कर विधिवत पूजन करें कांसे, सोने , चांदी या मिट्टी के दिये में गाय के घी का दीपक जलाएं,सुगंधित धूप जलाए,गोलोचन से तिलक करें, अक्षत,रोली,सिंदूर,इत्र,अबीर गुलाल आदि 16 चीजों से देवी का षोडशोपचार पूजन करें फिर भगवान लक्ष्मी-नारायण को चावल की खीर का भोग लगाकर भोग को प्रसाद के रुप में बांटे।
अक्षय तृतीया के दिन भगवान लक्ष्मी-नारायण को प्रसन्न करने के लिए इस मंत्र का जाप 108 बार करें मंत्र
जो व्यक्ति दीक्षित हैं, वे लक्ष्मीनारायणायय के बीज मन्त्रों का जप करें। बीज मंत्र सभी जगह नही बताए या लिखे जाने की परंपरा नहीं है। अपने गुरु या पुरोहित से पूछकर जान लें।
या फिर सभी लोग ॐ लक्ष्मीनारायणायय नमः का जप करें।

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पूजन में इन बातों का रखें विशेष ध्यान

मां लक्ष्मी की तस्वीर पर सुहाग का सामान अर्पण करें। घर के मंदिर में मां लक्ष्मी के पास 11 गोमती चक्र रखें। लक्ष्मी जी के चाँदी के चरण पादुका मंदिर में रखे। दक्षिणावर्ती शंख में जल भरकर भगवान विष्णु का अभिषेक करें और साथ ही दूध दही अर्पण करें। इस दिन दान करने के लिए बहुत ही खास दिन माना जाता है। चावलों की खीर बनाकर मां लक्ष्मी को भोग लगाकर प्रसाद में बांटे।

अक्षय तृतीया के दिन करें यह दान

गौ ,भूमि,तिल ,स्वर्ण,घी ,वस्त्र,धान्य गुड़,चांदी नमक,शहद ,मटकी,
खरबूजा एवं कन्या दान

क्या करे , क्या न करें

अक्षय तृतीया को उपवास करें। पूरा दिन न कर पाएं तो एक बार ही खाएं। भोजन में नमक का उपयोग न करें।
सात्विक चिंतन-मनन करें। किसी का बुरा न सोचें, चाहें तथा न करें। ब्रम्हचर्य का पालन करें तथा मिथ्यावादन कदापि न करें।

Parshuram Jayanti : 2022 परशुराम जयंती की कथा, परशुराम जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं

3 मई को परशुराम जयंती (parshuram jayanti) है। अक्षय तृतीया वैसाख मास के शुक्ल पक्ष को परशुराम की जयंती मनाई जाती है। महावीर हनुमानजी की तरह परशुराम भी चिरंजीवी हैं। हनुमान जहाँ शिवांश रूद्रावतार हैं, वहीं परशुराम विष्णु के छठे अवतार हैं।

समय समय पर अवतारों ने अवतरित हो कर मानव जीवन को सकारात्मक रूप से जीने का संदेश दिया है। भगवान राम की तरह परशुराम ने भी शास्त्र और शस्त्र की आवश्यकता के अनुसार उपयोग का संदेश दिया है। लेकिन राम जहाँ शांति के प्रतीक के तौर पर माने जाते हैं, वहीं परशुराम उग्रता के प्रतीक हैं। पर परशुराम की उग्रता मानक मूल्यों का अतिरेक कतई नहीं है।

जादोपटिया : कलाकार की कृतियाँ , जो बन गईं भिक्षापात्र

परशुराम की जयंती अक्षय तृतीया को इसका भी प्रतीक है, कि ये अक्षय ज्ञान वाले ब्राह्मणों पूज्य हैं। इस दिन किये गए अच्छे कर्म, दान, जप ,पूजा और स्वर्ण की खरीदारी अक्षय होता है। अक्षय तृतीया पर पशुराम की पूजा कर अक्षय पुण्य और आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त की जाने की परंपरा रही है। यह युगादि तिथि यानी सतयुग व त्रेतायुग की प्रारम्भ तिथि है।

श्रीविष्णु का नर-नारायण, हयग्रीव और परशुरामजी के रूप में अवतरण व महाभारत युद्ध का अंत इसी तिथि को हुआ था। इस दिन बिना कोई शुभ मुहूर्त देखे कोई भी शुभ कार्य प्रारम्भ या सम्पन्न किया जा सकता है। जैसे – विवाह, गृह – प्रवेश या वस्त्र -आभूषण, घर, वाहन, भूखंड आदि की खरीददारी, कृषिकार्य का प्रारम्भ आदि सुख-समृद्धि प्रदायक है।
अस्यां तिथौ क्षयमुर्पति हुतं न दत्तं।
तेनाक्षयेति कथिता मुनिभिस्तृतीया।
उद्दिश्य दैवतपितृन्क्रियते मनुष्यै:।
तत् च अक्षयं भवति भारत सर्वमेव ।। “–
मदनरत्न

श्रीकृष्ण, श्रीराम और जटायु, भीष्म की इच्छा मृत्यु पर उनके कर्मों का असर तथा सीख।

अर्थ : भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठरसे कहते हैं, हे राजन इस तिथि पर किए गए दान व हवन का क्षय नहीं होता है; इसलिए हमारे ऋषि-मुनियों ने इसे ‘अक्षय तृतीया’ कहा है। इस तिथि पर भगवान की कृपादृष्टि पाने एवं पितरों की गति के लिए की गई विधियां अक्षय-अविनाशी होती हैं। परशुराम जयंती के दिन प्रातः स्नान करना चाहिए। स्नान गंगा, समुद्र या किसी पवित्र नदी में उत्तम माना गया है। आज के नगरीय अपार्टमेंट के जीवन मे आप स्नान के जल में गंगा जल मिलाकर अपने आराध्य की आराधना कर सकते हैं।
एक बात का स्मरण रहे कि दान सुपात्र को ही करें।

परशुराम जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं

शहरों में कराहती कल का नटखट बचपन, सुनी पड़ी सिसकियाँ लेता बृद्ध वर्तमान

भौतिकता की दौड़ खा गई है बचपन की यादों तक को , वीरान पड़े हैं बचपन की शोर मचाती वो गलियां , जिन पर दोस्तों के साथ दौड़ लगाते खेलते-कूदते हमारी एक अंगड़ाई ने हमें यौवन दिया , और हम खो गए ज़िम्मेदारियों में। पूरा का पूरा हमारा वो बचपन का कुनबा अब सोसल साइट्स पर ही दिखता है। अब हाथ पकड़ तो कभी कांधों पर हाथ रख घूमता हमारा जहां मानो कोई अनजान शक्ति लूट गया हो!

वो कंचे की गोलयों की खनखनाहट वाली हमारी जेबों में अब क्रेडिट कार्ड के जखीरों वाले बटुवों (पर्स) ने छीन लिए हैं। हमारे गुल्ली डंडो वाले फील्ड के खाली पड़े मैदान में उग आई झाड़ियों ने कब्जा जमा रखा है। वो पिट्टओ खेलने की भागदौड़ अब बदल गई है, जिंदगी की अन्य नीरस पहलुओं की भागदौड़ में।
भाग हम आज भी रहे हैं लेकिन उसके उद्देश्य , वज़ह और जगह बदल गए हैं।
इन वजहों में वो निर्दोषता नही , इन वजहों में भी एक स्वार्थजनित वज़ह हैं।
आश्चर्य है ! उन बेवजह की गलियों में दौड़ते बचपन में वजह सिर्फ़ बेवजह होतीं थीं, लेकिन आज वजहों में भी वज़ह की भीड़ है।
जब भी अपने पुराने शहर, गाँव या मुहल्ले की गलियों में जाता हूँ, तो वहाँ बेगाने से लगता हूँ। पुरानी गलियों के पुरानी इमारतों से वो रौनक ग़ायब है, वहाँ का कलरव वो शोर-गुल जिससे गुलज़ार रहता था मुहल्ला , रोशन रहती थीं गलियाँ , वह सभी उजड़े घोसले से दिखते हैं।
उन घोसलों से इक खमोश सिसकियाँ ख़ामोशी से कान नहीं दिमाग़ को सुनाई पड़ती हैं। इन घोसलों से आँख खुलते ही नए आए पँखों को फड़फड़ाते उड़ गए हैं बच्चे, जिनसे गलियाँ गुलज़ार रहा करतीं थीं।
उन नए पँख वालों ने बसा और बना लिया है अबके नया घोसला , जो शहरों के अपार्टमेंट्स में है। वहाँ कोई खुला मैदान नहीं, कोई बच्चों के निर्दोष बचपन से गुलजार गलियाँ नहीं। वहाँ का बचपन लेपटॉप, डेस्कटॉप और मोबाइल स्क्रीन पर ठहर गया है। शहर कराह रहा है, बोझ बहुत है वहाँ ।
ओर वहाँ गाँव मुहल्ले की सुनसान बीरान पड़ी गलियों के पुराने घोसलों में बुढ़ापा सिसकियाँ ले रहा है। खिड़कियों से बूढ़ी गहरी धसीं आँखें , तो कभी दरों दरवाजों पर कोई साया दूर तलक गलियों में किसी की राह तकती नज़र आती है।
इधर सिसकियाँ है, तो उधर कराह,
इधर सूनापन है, तो उधर भीड़ और तपिश,
इधर पिता की छाँव है,
माँ के आँचल की ममता और शीतलता है,
तो उधर बॉस का ऑफिसियल कड़क निगरानी है,
घर पर ठंडक देने के लिए ए सी तो है,
लेकिन यहाँ माँ की आँचल की सकून देनेवाली शीतलता सूनी पड़ी है।
मैं अपने बचपन के कुनबे में अकेला बेरोजगार-बेगार, बेगैरत अपाहिज बोझ बना रहा गया।
इसलिए इन सूनी पड़ी गलियों की सिसकियों से लेकर शहर तक की भागती दौड़ती सड़कों पर बोझ तले दबी कराह तक को टटोलता रहता हूँ।
दोनों ही जगह मुझे एक बेदर्द दर्द दिखता है, जिसे दोनों जगह की महत्वाकांक्षाओं ने जन्म दिया है।
इन पुरानी गलियों को ग्रेंड मोम – पा बोलने वाले नाती-पोतों की चाहत थीं , तो गलियों में गुल्ली डंडो से खेलते बचपन को युवा होते ही शहरों की चकाचौंध , शहरी अंग्रेजी बोलती गोरियों और मम्मी पापा कहलाने की लालसा ने एक ओर अकेलापन, सुनी आँचल और वीरान गलियों में सिसकते मकान रह गए , तो दूसरी ओर शहर की भीड़ में कराहती भागमभाग और स्क्रीनों पर सिमटी नई पीढ़ी मिली।

राजनीति के खेल में हमेशा पिस जाती है आम जनता, तथाकथित पालनहार चट कर जाते रेवड़ियाँ

ऐसे राजनीति आम जनता , राज्य और देश के लिए एक किये जाने का दावा हर राजनेता और पार्टी करती है। अगर ईमानदारी से ये देखा या सोचा जाय ,तो ऐसा ही होना चाहिये , लेकिन राजनीति में ये सारे चीज काफ़ी पीछे छूट गया है।

राजनेता आज राजनीति सिर्फ़ स्वयं की सेवा या परिवार सेवा को ही ध्यान में रख तात्कालिक फ़ायदे को ध्यान में रख कर रहे हैं, इसके लिए कुछ भी करने के लिए वे तैयार दिखते हैं।
जनता , समाज ,राज्य और देश जाए …… बस अपना स्वार्थ सिद्ध होना चाहिए।
अभी स्थानीय समस्याओं को दरकिनार कर, अगर हम बिजली आपूर्ति पर ही सोचें तो , देखते हैं कि अगर उपभोक्ता मतलब सिर्फ़ आम जनता उपभोक्ता ही नही, बल्कि सरकारी संस्थानों जैसे उपभोक्ता अगर समय पर वितरण निगमों को सही समय पर भुगतान कर दे तो , वे बिजली उत्पादन करनेवाले संस्थाओं को भी समय पर भुगतान कर दे, ऐसे में कोल आपूर्ति कम्पनियों को भी समय पर भुगतान मिल जाएगा, तथा आपूर्ति सामान्य रहेगी।
लेकिन ऐसा होता ही नहीं, मतलब साफ़ है कि इन सारी समस्याओं का एकमात्र कारण स्वयं सरकारें ही हैं। अब जब मैंनें सरकार का यहाँ बहुवचन में प्रयोग किया तो समझदार , समझ ही सकते हैं कि मेरा इशारा कहाँ तक है।
राजनीति केंद्र को दोषी ठहराने में व्यस्त है , भुगतान कैसे सुनिश्चित हो इसपर मौन रहकर आम जनता को भरमाने में लगी है।
खैर इधर झारखंड सरकार पर सत्ताधारी पार्टी और उसके मुखिया के अनुभवहीन मूर्ख सलाहकारों ने स्वयं मुख्यमंत्री को ही एक तरफ से कानूनी दाव पेंच में फंसा दिया है , लोभ पालने तथा और थोड़ा और की मंशा पालने वाले सरकारी सर्वेसर्वा बुरी तरह फँसा नज़र आ रहा है। ऐसे में गठबंधन के दूसरे भागीदार कहीं पूरे राज्य में अगले चुनाव में काबिज़ न हो जाय , इसकी जुगत में गठबंधन के सभी पार्टियां अपनी अपनी तरह से रोटियाँ सेंकने में लगी हैं, उधर विपक्ष भी सकारात्मक न दिखकर अगली सरकार अपनी बने की जुगत में राजनीति कर रही है।
नतीजा आम जनता पिस रही है।
आम जनता भी न सुधरने की कसमें खाकर मज़हब , जाती , नमाज़ और हनुमान चालीसा की राजनैतिक साज़िशों में फँसी है।
कुल मिलाकर आम जनता अपने जनतांत्रिक मूल्यों को न समझने की ज़िद पर नेताओं के लिए चारागाह बन गया है। उन्हें ये समझ में नहीं आ रहा कि यहाँ हर नारे और बयानों पर वे छले जा रहे हैं, और रेवड़ियाँ उनके तथाकथित पालनहार चट किये जा रहे हैं।

उपलब्धियों का रहा अप्रेल, के के एम कॉलेज के लिए, नीरज हुए सम्मानित

पाकुड़ के के एम कॉलेज के लिए अप्रैल का महीना उपलब्धियों का महीना सावित हो रहा है। पहले कॉलेज के प्राचार्य डॉ लोहरा को राष्ट्र गौरव से सम्मानित किया गया, तो दूसरी और स्वयं सिद्धो कान्हू मुर्मू के कुलपति सोना झरिया मिंज ने मुख्य सहायक नीरज कुमार यादव को सम्मानित किया।
उल्लेखनीय है, कि पिछले सप्ताह देवघर में शिक्षकेत्तर कर्मचारियों का राज्यस्तरीय महाधिवेशन हुआ था, जिसमें सिद्धो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय के कर्मचारी संघ के संयुक्त सचिव के रूप में नीरज यादव को मनोनीत किया गया।
सांगठनिक रूप से क्षेत्रीय स्तर पर नीरज के चयन से, और स्वयं कुलपति द्वारा सम्मानित किये जाने से कॉलेज एवं पकुड़वासी सहित छात्र छात्राओं तथा शैक्षणिक अधिकारियों में प्रसन्नता का माहौल है। नीरज यादव को इधर बधाईयों का तांता लगा हुआ है।

प्राचार्य लोहरा ने मनवाया अपने कार्यों से लोहा , होंगे राष्ट्र गौरव से सम्मानित

डॉ०एस०पी० लोहरा राष्ट्र गौरव अवार्ड से होंगे सम्मानित
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ग्राम-गुतरु,प्रखण्ड-बुढ़मू,राँची (झारखण्ड)निवासी तथा वर्तमान में के०के०एम०कॉलेज पाकुड़(एस०के०एम०यू०दुमका)के प्रभारी प्राचार्य डॉ०शिवप्रसाद लोहरा को भव्या फाउंडेशन जयपुर की ओर से शिक्षा,साहित्य और समाजसेवा के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस एंड नेशनल अवार्ड सेरेमनी -राष्ट्र गौरव अवार्ड -2022 के एक भव्य समारोह में राष्ट्र गौरव अवार्ड से सम्मानित किया जायेगा,विशेष समारोह में इस अवार्ड को प्राप्त करने के लिए देश -विदेश से चयनित कई नामचीन हस्तियां शामिल होंगे,डॉ०लोहरा ने इस अवार्ड के लिए चयनित किये जाने पर भव्या फाउंडेशन जयपुर के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि निश्चित ही मुझे इस अवार्ड से जीवन के हर एक अच्छे क्षेत्रों में सकारात्मक योगदान हेतु अधिक उत्साह और मनोबल प्राप्त हुआ है,अपने आत्मसंतोष के लिए कर्तव्य भावना से अपने साथ दूसरे जरूरतमंदों के लिए भी कुछ अच्छा काम करके उनके चेहरे पर मुस्कान लाने का प्रयास कर अपने दिल में सुकून महसूस करना चाहेंगे,उन्होंने इस बड़ी उपलब्धि का श्रेय ईश्वर,अपने माता-पिता ,गुरुजन एवं शुभचिंतकों को दिया है ।

पंचायत चुनाव में मत का करें दान , वोट की कीमत लगाने वालों को नकारे

झारखंड में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की प्रक्रिया चल रही है, फ़िलवक्त नामांकन की प्रक्रिया शबाब पर है।

एक और चीज़ अपने शबाब पर अपने है, वो है चुनावी चर्चा।
गाँव, गली,कपाल चाय-पान की दुकान और ऐसी हर जगह जहाँ लोग किसी न किसी कारण जुट रहे हैं, यहाँ तक कि शादी-ब्याह के घरों तक में बस पंचायत चुनाव पर ही चर्चा ए आम है।
कहीं नाराज़गी तो कहीं पक्ष के तर्क खुलकर इन चर्चाओं की महफ़िल में परोसे जा रहे हैं।
एक वर्ग और सुसुप्तावस्था में सक्रिय है , जो मौसमी तौर पर चुनावी दावे करते हैं , लेकिन ये दावे , वो दावे करने वालों नेताओं से करते हैं , कि अग़र उन्हें खुश रखा गया तो उनके हाथ में इतने वोट हैं, जो उन्हें ख़ुश रखने वाले को दिला सकते हैं। उनके पास सभी स्वयंभू आँकड़े होते हैं, जिसे वे तर्कों के साथ परोसते हैं।
खैर ये मौसमी रोजगार वाले लोग हैं जो कुछ ऐसे समय मे अपनी रोटी सेंक जाते हैं, और फिर जीतने वाले लोग अपने पूरे कार्यकाल में सिर्फ़ रोटियाँ ही सेंकते हैं।
इस पूरे खेल में जो पीसे और सेंके जाते हैं, वो इस पूरी प्रक्रिया के सबसे मजबूत और महत्वपूर्ण कड़ी मतदाता हैं, और यही मजबूत कड़ी अन्ततः सबसे मजबूर नज़र आती हैं।
इसलिए अपनी क़ीमती वोटों को क़ीमत के एवज में नहीं बाँटना चाहिए।
लेकिन कई बार मैंनें देखा-अहसासा है , कि कई जगह वोट बेचनेवालों को इसकी क़ीमत कार्यालयों के चक्कर लगाते ही देना पड़ता है, चाहे वो कार्यालय सरकारी हो या फ़िर जीते हुए नेताजी का।
पत्रकारिता के साथ मैं आदतन समाजसेवा के 15-16 वर्ष बिताने के बाद चुनावी राजनीति को समझने के लिए तकरीबन डेढ़-दो दशक पहले चुनावी मैदान में ताल ठोक बैठा हूँ ।
मैंनें सुन रखा था, कि मत ख़रीदे भी जाते हैं। मैं इसे समझ नहीं पाता था, आख़िर कैसे ! अगर कोई बिकने के बाज़ार में दिखे तब तो ख़रीदना सम्भव होगा, लेकिन यहाँ तो कोई बाज़ार मुझे दिखता ही नहीं था।
इस बाज़ार से परिचय ज़रुरी था , मेरी जिज्ञासा की हठ ने मुझे चुनावी मैदान में उतार दिया। मेरे उतरने भर की देरी थी वोट मैनेज करनेवाले दावेदार मुझ तक पहुँचने लगे।
पूरी प्रक्रिया, पूरी होते होते मैं पूरी बात-बाज़ार और बहुत कुछ पूरी तरह समझ और मस्तिष्क में पिरो गया।
यहाँ ग़ज़ब तरीका है बेचने और खरीदने का।
इसमें नेता वोट , बीचवाले वोटों के दावेदार नोट और मतदाता सिर्फ़ आश्वासन के घूँट समेटते हैं , मुर्गे और बकरे जान गंवाते हैं।
पूरी प्रक्रिया के दौरान सरकारी अफसरों , अमलों और पुलिस वालों को न चैन की घड़ी और भोजन तक का समय नही मिलता।
लेकिन इधर नेताओं और उन्हें नेता बनाने वालों की ख़ूब छनती हैं।
शराब की बोतलों और मुर्गे-बकरों की बोटियों पर वोटों के बाज़ार का माहौल तैयार होता है और फिर मतदान के पहले की अंतिम रात ही फैसला नतीजों में बदल चुका होता है जो मतपेटियों में जाने भर की औपचारिकता पूरी करने के लिए अंतिम रात की सुबह होती है।
बाज़ार सजने को आतुर है, प्रक्रियाएं चल रही है, शासन-प्रशासन रेस है , चुनाव आयोग क्रियाशील है।
अब मतदाताओं की बारी है, गाँव की सरकार बनेगी , काम करने वाले लोगों को चुनकर अपनी सरकार बनाइये ।
किसी लोभ-मोह में बिना फँसे, पूरे सरकारी तंत्र की मेहनत को साकार करते हुए मत का दान करने का संकल्प लें, ये लोकतंत्र का संस्कार है , इस पर दाग न लगे।

आत्मघाती पत्रकारिता पर कब संभलेंगे हम ?

*आत्मघाती पत्रकारिता से बचने का उपाय तत्काल खोजना आवश्यक है*

  • पल्लव
    जिंदगी बरबाद करने का हक नहीं: पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि का बयान बेहद गंभीर बहस की मांग करता है। तीन दिन पहले अपने चार पन्ने के बयान में दिशा ने पत्रकारिता को जमकर कोसा है। दिशा रवि ने साफ कहा, ‘मीडिया ने मुझे मुजरिम बना दिया। मेरे अधिकारों का हनन हुआ, मेरी तस्वीरें पूरे मीडिया में फैल गईं, मुझे मुजरिम करार दे दिया गया-कोर्ट के द्वारा नहीं, टीआरपी की चाह वाले टीवी स्क्रीन पर। मेरे बारे में काल्पनिक बातें गढ़ी गईं’।

दिशा रवि ने आगे लिखा है, ’विचार नहीं मरते। सच हमेशा बाहर आता है। चाहे वह कितना ही समय ले ले। लेकिन मीडिया को ऐसा नहीं करना चाहिए था। न्याय का प्राकृतिक सिद्धांत भी यही कहता है कि सौ मुजरिम चाहे छूट जाएं, लेकिन किसी निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए।’

दिशा के मामले में जो भी होगा, वह अदालत तय करेगी। पर पत्रकारिता के तमाम अवतारों में उसे अपराधी करार दे दिया गया। मीडिया ट्रायल करके किसी नौजवान की जिंदगी बरबाद करने का किसको हक है? क्या किसी सभ्य लोकतांत्रिक समाज में पत्रकारिता को इतनी गैर जिम्मेदारी की छूट दी जानी चाहिए?

न्यायालय की छवि दरकती है: सप्ताह भर भी नहीं हुआ जब भारत के मुख्य न्यायाधीश एस.ए बोबड़े ने भी ऐसी ही एक टिप्पणी की थी। दुष्कर्म के एक मामले की रिपोर्टिंग पर उनकी राय थी कि मीडिया ने गलत रिपोर्टिंग की। एक किशोरी से न्यायालय ने आरोपित को ब्याह रचाने का कोई सुझाव ही नहीं दिया था। पत्रकारों ने उसे गलत अंदाज में परोसा। न्यायालय ने मामले के तथ्यों, दस्तावेजों और सुबूतों के आधार पर पूछा था कि क्या आप पीड़िता से विवाह कर रहे हैं? अदालत में प्रमाण थे कि दोनों पक्ष आपस में शादी की बात कर रहे हैं। माननीय मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इस तरह की रिपोर्टिंग से न्यायालय और न्यायाधीशों की छवि तथा प्रतिष्ठा पर आंच आती है। जनमानस में इस लोकतांत्रिक शीर्ष संस्था के बारे में भ्रम फलता है। यह उचित नहीं है। यदि सर्वोच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाघीश को यह टिप्पणी करनी पड़ जाए तो लोकतंत्र के इस स्वयंभू चौथे स्तंभ के लिए चुल्लू भर पानी में डूब मरने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। जानता हूं कि यह तनिक कठोर टिप्पणी है, मगर जिंदगी में एक अवसर आता है जब संयम की परीक्षा में उत्तीर्ण होने की इच्छा भी दम तोड़ देती है।

टूट रहे हैं जम्हूरियत के पाए: मैंने इस स्तंभ में पिछले वर्षों में लगातार इस बात को उठाया है कि यह बात हिन्दुस्तान के मीडिया को समझनी होगी कि गैरजिम्मेदार पत्रकारिता की भी सीमा होती है। आप अनंत काल तक पतन के गड्ढे में नीचे नहीं गिर सकते। जब आप उसकी तलहटी में पहुंचेंगे तो सिवाय दम तोड़ने के कुछ नहीं बचेगा। यदि बिरादरी की ओर से यह तर्क भी दिया जाए कि जब जम्हूरियत के सारे पाए टूट रहे हैं, दरक रहे हैं तो पत्रकारिता के उसूलों की रक्षा कैसे की जा सकती है तो निवेदन है कि यही तो परीक्षा-काल है। गांधी एक विलक्षण और बेजोड़ संपादक थे। उन्हें भी क्रोध आता था। वे विचलित भी होते थे, लेकिन कोई मुसीबत, आफत या संकट उन्हें अपने रास्ते से डिगा नहीं सका। आज बड़े-बड़े अखबारनवीस राह से भटके दिखाई देते हैं। आज नहीं तो कल उन्हें हकीकत का सामना करना ही होगा। लेकिन तब तक वे पेशे का बेड़ा गर्क कर चुके होंगे। इसलिए आत्मघाती पत्रकारिता से बचने का उपाय तत्काल खोजना आवश्यक है। प्रत्यास्थता के चरम बिंदु पर पहुंचने से पहले ही संभल जाएं तो बेहतर है ।

एक ऐसा शहर पाकुड़ , जिनकी गलियों में कराहती है रविंद्र और नज़रुल की संस्कृति

पाकुड़ बिहार एकत्रित के समय से बंगाल की संस्कृति से प्रभावित रहा है।, उस समय कहने को तो पाकुड़ बिहार में था, लेकिन पाकुड़ की गलियों में बंगाल की संस्कृति की महक जीती थी। संध्या होते ही हर घर से संख और उलू की आवाज के बाद हारमोनियम और तबले की संगत पर रविंद्र संगीत तथा नज़रुल गीति के बोल सुनाई पड़ते थे।

आज भी पाकुड़ की हर गलियों, सड़क चोंक-चौराहों एवं हर ग्रामीण सड़क पर बंगाल की संस्कृति ही जीती नज़र आती है।
यह बात और है, कि उस समय बंगाल की संस्कृति की सौंधी महक के साथ गुदड़ी में ही सही रविंद्र और नज़रुल गीति की महक पाकुड़ को महकाती थी, लेकिन आज बंगाल की बेलगाम कानून व्यवस्था की दुर्गंध तथा बारूद की गंध के साथ , बालू और अवैध कोयले की खनन तथा परिवहन दुर्गंध यहाँ गमकती है।
पाकुड़ की ये बंगाल की गमक और धमक लिए संस्कृति अब जंगल पहाड़ों तक पर अवैध कोयला खनन के रूप में पहुँच गया है।
शायद ही यहाँ की कोई सड़क और गली तक इस तरह के अवैध परिवहन से अछूता रह गया हो। हर सड़क गली यहाँ दिन रात इसकी वानगी बताती कहती नज़र आ जाती है।
और तो और यहाँ की पुलिस और प्रशासन भी इन अवैध करनेवालों के सामने बंगाल की तर्ज़ पर भी बेबस नज़र आती है। थानों के सामने और प्रशासन के नाक के नीचे से अवैध कारोबारी आँखों से काजल तक चुरा ले जाते हैं, और राजनैतिक संरक्षण की छांव और पोषण के साथ स्वार्थजनित उदासीनता पुलिस तथा प्रशासन को बेबस बनाये रखता है।
बम बनाते हुए विष्फोट हो या अवैध खनिजों और लकड़ी सहित वनोत्पादों का अवैध दोहनों के शोर में रविंद्र संगीत और नज़रुल गीति की आत्मा के क्रंदन की सिसकियाँ किसी भी संवेदनशील व्यक्ति की संवेदना को लहूलुहान होने से नहीं रोक सकता इन दिनों।
” पाकुड़ की सांस्कृतिक गलियाँ इन दिनों बस यही दर्द से कराहती हुई कहती नज़र आतीं है–
  कि ” कैसी चली है अबके हवा तेरे शहर में,
          बंदे भी बन गए हैं ख़ुदा तेरे शहर में “